[t4b-ticker]

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश: लिफ्ट हादसे अब केवल ‘दुर्घटना’ नहीं, जवाबदेही का मामला

0
SCL

Ai image

सुरक्षा से समझौता हुआ तो बिल्डर, एओए, आरडब्ल्यूए और मेंटेनेंस एजेंसी, सभी पर तय होनी चाहिए जिम्मेदारी!!

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

नई दिल्ली। देशभर में तेजी से बढ़ रही बहुमंजिला आवासीय सोसायटियों के बीच लिफ्ट सुरक्षा एक गंभीर सार्वजनिक चिंता बन चुकी है। आए दिन सामने आने वाली लिफ्ट खराबी, अचानक रुकने, झटके लगने, लोगों के घंटों फंसे रहने और कई मामलों में जानलेवा हादसों के बीच सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश लेकर आया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि लिफ्ट में सुरक्षा कोई सुविधा नहीं, बल्कि प्रत्येक उपयोगकर्ता का मूलभूत अधिकार है।

वर्ष 2003 में दिल्ली स्थित रॉ (RAW) मुख्यालय में हुए लिफ्ट हादसे में वरिष्ठ अधिकारी विपिन हांडा की मृत्यु के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) द्वारा दिए गए 3.01 करोड़ रुपये से अधिक के मुआवजे के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि जिस संस्था ने लिफ्ट के रखरखाव की जिम्मेदारी ली है, उस पर उपयोगकर्ताओं के प्रति सर्वोच्च स्तर की सावधानी बरतने का दायित्व है।

यह फैसला भले ही सरकारी भवन से जुड़ा हो, लेकिन इसके पीछे स्थापित कानूनी सिद्धांत देश की हजारों बहुमंजिला आवासीय भवनों के लिए भी उतने ही प्रासंगिक माने जाने चाहिए।

सुरक्षा हर लिफ्ट की बुनियादी गारंटी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि यदि किसी लिफ्ट में तकनीकी खराबी की जानकारी पहले से थी और संबंधित एजेंसी ने समय रहते उसे दूर नहीं किया अथवा लिफ्ट को सुरक्षित बनाने के पर्याप्त उपाय नहीं किए, तो इसे “सेवा में कमी (Deficiency in Service)” माना जाएगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल खराबी पहचान लेना पर्याप्त नहीं है। जब तक उसे पूरी तरह दूर न कर दिया जाए, तब तक उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना संबंधित एजेंसी की जिम्मेदारी है।

हाईराइज सोसायटियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला ?

आज अधिकांश महानगरों और एनसीआर की बहुमंजिला सोसायटियों में प्रतिदिन असंख्य लोग लिफ्टों का उपयोग करते हैं। कई स्थानों पर निवासी लगातार शिकायत करते हैं कि- 

लिफ्ट अचानक बंद हो जाती है

बीच मंजिल में फंस जाती है

दरवाजे ठीक से बंद नहीं होते

झटके महसूस होते हैं

अलार्म एवं इंटरकॉम प्रणाली काम नहीं करती

वार्षिक निरीक्षण और सुरक्षा परीक्षण समय पर नहीं होते

लिफ्ट सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन शिकायतों का रिकॉर्ड होने के बावजूद सुधार नहीं किया जाता और बाद में कोई दुर्घटना हो जाती है, तो सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय संबंधित पक्षों की जिम्मेदारी तय करने में महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

केवल लिफ्ट कंपनी ही नहीं, सभी की तय हो सकती है जवाबदेही

इस मामले में NCDRC ने मुआवजे की जिम्मेदारी तीन पक्षों में बांटी थी-

लिफ्ट कंपनी (Otis) – 70 प्रतिशत

मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज (MES) – 25 प्रतिशत

रॉ (भवन उपयोगकर्ता संस्था) – 5 प्रतिशत

सुप्रीम कोर्ट ने इस जिम्मेदारी के विभाजन को भी उचित माना।

यह सिद्धांत बहुमंजिला सोसायटियों के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी आवासीय परिसर में लिफ्ट हादसा होता है तो जांच के दौरान केवल निर्माता कंपनी ही नहीं, बल्कि-

बिल्डर,

एओए (Apartment Owners Association),

आरडब्ल्यूए,

फैसिलिटी मैनेजमेंट कंपनी,

एएमसी (Annual Maintenance Contract) एजेंसी,

तथा अन्य संबंधित पक्षों की भूमिका और जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।

सिर्फ कागजी मेंटेनेंस पर्याप्त नहीं

हाईराइज सोसायटियों में अक्सर दावा किया जाता है कि लिफ्ट की नियमित सर्विसिंग होती है। लेकिन सवाल यह है कि-

क्या प्रत्येक तकनीकी शिकायत का रिकॉर्ड रखा जाता है ?

क्या हर खराबी का स्थायी समाधान किया जाता है ?

क्या सुरक्षा उपकरण नियमित रूप से जांचे जाते हैं ?

क्या आपातकालीन रेस्क्यू प्रक्रिया प्रभावी है ?

क्या बिजली जाने या वोल्टेज में उतार-चढ़ाव की स्थिति में लिफ्ट पूरी तरह सुरक्षित रहती है ?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं, तो दुर्घटना की स्थिति में केवल “मेंटेनेंस चल रही थी” कहना पर्याप्त बचाव नहीं माना जा सकता।

हाईराइज संस्कृति के साथ बढ़ी जिम्मेदारी

देश के महानगरों में लगातार ऊंची इमारतों का निर्माण हो रहा है। असंख्य परिवार प्रतिदिन कई बार लिफ्ट का उपयोग करते हैं। ऐसे में लिफ्ट केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवनरक्षक सार्वजनिक अवसंरचना का हिस्सा बन चुकी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भवन की संरचनात्मक सुरक्षा जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक लिफ्ट की यांत्रिक और विद्युत सुरक्षा भी है। छोटी-सी तकनीकी लापरवाही भी जानलेवा साबित हो सकती है।

अब समय जवाबदेही का

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि लिफ्ट दुर्घटनाओं को अब सामान्य तकनीकी खराबी मानकर टाला नहीं जा सकता। यदि किसी एजेंसी को संभावित खतरे की जानकारी होने के बावजूद समय पर सुधार नहीं किया गया, तो वह कानूनी उत्तरदायित्व से बच नहीं सकती।

देश की हजारों बहुमंजिला आवासीय सोसायटियों के लिए यह फैसला एक चेतावनी भी है और मार्गदर्शन भी कि लिफ्ट सुरक्षा कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक दायित्व है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed

error: Content is protected !!