डिजिटल अरेस्ट: ग्रेटर नोएडा में 70 साल के इंजीनियर से 1.30 करोड़ की ठगी!
‘डिजिटल अरेस्ट’ और ‘ट्रेडिंग फ्रॉड’ से बुजुर्ग हो रहे बर्बाद!
मुंबई में NIA बनकर डराने वाला गैंग गिरफ्तार
NEWS1UP
विशेष संवाददाता
नोएडा/मुंबई। ग्रेटर नोएडा वेस्ट के 70 वर्षीय दया दास ने सोचा था कि रिटायरमेंट के बाद थोड़ा निवेश कर कुछ मुनाफा कमा लेंगे। लेकिन व्हाट्सऐप पर आया एक मैसेज उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती बन गया। “सीएचसीपी ग्लोबल सिक्योरिटीज” नाम की कथित कंपनी ने उन्हें शेयर ट्रेडिंग से मोटा मुनाफा देने का लालच दिया, और इस झांसे में आकर दया दास अपनी जिंदगी भर की कमाई, करीब 1.30 करोड़ रुपये गंवा बैठे। दया दास साइबर ने थाना सेक्टर 36 में अपनी शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस का कहना है कि शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और जांच शुरू कर दी गई है। यह पता लगाया जा रहा है कि उनकी रकम किन-किन खातों में भेजी गई थी।
व्हाट्सऐप मैसेज से शुरू हुआ खेल
18 अगस्त को दया दास के फोन पर एक व्हाट्सऐप मैसेज आया। शुरुआत में ठगों ने छोटी रकम से “मुनाफा दिखाने” का नाटक किया। दया दास ने जब देखा कि उनके पैसे ऑनलाइन पोर्टल पर “बढ़” रहे हैं, तो भरोसा बढ़ गया। धीरे-धीरे निवेश की रकम भी बढ़ती गई, और एक दिन ऐसा आया जब उन्होंने पोर्टल से अपने पैसे निकालने की कोशिश की, तो सिस्टम ने जवाब देना बंद कर दिया। फोन काट दिया गया, व्हाट्सऐप ग्रुप से निकाल दिया गया, और वहीं से शुरू हुई ठगी की सच्चाई। अब पुलिस इस पूरे फरेब के तार तलाश रही है कि यह रकम किन खातों में भेजी गई और आखिर ठग कौन थे।

मुंबई में ‘डिजिटल अरेस्ट’ गैंग का पर्दाफाश
दूसरी तरफ, मुंबई पुलिस ने हाल ही में एक ऐसे गैंग का भंडाफोड़ किया है जो बुजुर्गों को “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर डरा-धमकाकर ठगता था। गिरफ्तार आरोपियों के नाम हैं, रवि आनंद आंबोरे (35) और विश्वपाल चंद्रकांत जाधव (37)। इन दोनों के बैंक खातों के जरिए देशभर में सात से ज़्यादा साइबर फ्रॉड दर्ज हैं।
‘NIA अधिकारी’ बनकर डराया
यह गैंग खुद को NIA या पुलिस अधिकारी बताकर कॉल करता था। बुजुर्गों को कहा जाता कि उनका नाम मनी लॉन्ड्रिंग केस में आया है, और बैंक अकाउंट की जांच के लिए “डिजिटल अरेस्ट” किया जा रहा है। एक रिटायर्ड बैंक कर्मचारी को तो तीन दिन तक व्हाट्सऐप वीडियो कॉल पर ‘पूछताछ’ के नाम पर बिठाए रखा गया, और अंत में उनसे 50 लाख रुपये “जांच के नाम पर” एक खाते में ट्रांसफर करा लिए गए। मुंबई पुलिस की जांच में सामने आया कि इस रकम का बड़ा हिस्सा ठाणे के उल्हासनगर इलाके के एक खाते में गया था। आरोपी ने माना कि उसने अपने दस्तावेज देकर ये अकाउंट कमीशन के बदले साइबर गैंग को सौंपा था।
डर, भरोसा और ठगी का नया फार्मूला
आजकल साइबर अपराधी अब किसी जटिल तकनीक से नहीं, बल्कि भरोसे और डर से लोगों को फंसा रहे हैं। कभी वे निवेश और मुनाफे का लालच दिखाते हैं, तो कभी कानूनी गिरफ्तारी और मनी लॉन्ड्रिंग का डर।
हर बार शिकार वही होते हैं-
बुजुर्ग लोग
रिटायर्ड कर्मचारी
या वो जो इंटरनेट पर बिना तकनीकी समझ के भरोसा कर बैठते हैं।
कैसे बचें ऐसे साइबर ठगों से ?
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किसी भी अनजान लिंक या व्हाट्सऐप मैसेज से दूर रहें।
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किसी ऐप या वेबसाइट में पैसे ट्रांसफर करने से पहले कंपनी की जांच करें।
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अगर कोई खुद को पुलिस या NIA अधिकारी बताए तो तुरंत 1930 पर कॉल करें।
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डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया असल में होती ही नहीं है।
ऐसे में बड़ा सवाल उठता है, क्या हमारी डिजिटल दुनिया अब इतनी “स्मार्ट” हो गई है कि इंसान की समझ पीछे छूट जाए ? दया दास और मुंबई के बुजुर्ग जैसे मामले सिर्फ ठगी नहीं हैं, ये इस बात के सबूत हैं कि साइबर अपराध अब सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि मनोविज्ञान से खेला जाने वाला खेल बन चुका है।
