January 23, 2026

दहेज-मुक्त मिसाल: दो जजों ने संविधान दिवस पर रचा आदर्श विवाह!

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NEWS1UP

संवाददाता

कोटपूतली–बहरोड़। राजस्थान के कोटपूतली–बहरोड़ जिले में संविधान दिवस एक अद्भुत और प्रेरणादायक मिसाल का गवाह बना। इस विशेष अवसर पर बानसूर के हेमंत मेहरा और हनुमानगढ़ की करीना काला ने दहेज और फिजूलखर्ची से दूर, अत्यंत सादगीपूर्ण तरीके से जिला कलेक्टर कार्यालय में विवाह रचाकर समाज को एक सकारात्मक संदेश दिया। दोनों न्यायिक अधिकारी हैं और उन्होंने संविधान को साक्षी मानकर विवाह करने का निर्णय लिया, जो अपने आप में एक अनूठी और सराहनीय पहल है।

आज जब विवाह समारोहों में खर्च और दिखावा बढ़ रहा है, ऐसे समय में दो युवा न्यायिक अधिकारियों ने न केवल दहेज प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि सादगीपूर्ण विवाह कर समाज के सामने नई दिशा भी प्रस्तुत की। संविधान दिवस पर लिया गया यह कदम भारतीय लोकतंत्र, नैतिक मूल्यों और सामाजिक सुधार के प्रति उनकी गहरी आस्था को दर्शाता है।

संविधान सर्वोपरि: इसी विश्वास के साथ चुना विशेष दिन

हेमंत मेहरा सिविल न्यायाधीश के पद पर चौथ का बरवाड़ा (सवाई माधोपुर) में कार्यरत हैं, जबकि करीना काला प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी हैं। दोनों का कहना है कि वे न्यायिक सेवा से जुड़े होने के कारण संविधान को सर्वोच्च मानते हैं। इसी भावना के चलते उन्होंने 26 नवंबर संविधान दिवस को विवाह के लिए चुना, ताकि यह दिन उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण से भी जुड़ जाए।

हेमंत मेहरा एवं करीना काला

जिला कलेक्टर कार्यालय बना सादगीपूर्ण शादी का स्थल

यह विवाह दोनों परिवारों की मौजूदगी में जिला कलेक्टर कार्यालय में सम्पन्न हुआ। जिला कलेक्टर प्रियंका गोस्वामी और एडीएम ओमप्रकाश सहारण विशेष रूप से उपस्थित रहे और नवविवाहितों को आशीर्वाद दिया। बिना शोर-शराबे, बिना दहेज और बिना अनावश्यक खर्च के सम्पन्न हुआ यह विवाह प्रशासनिक महकमे और समाज दोनों के लिए एक प्रेरक उदाहरण बन गया।

युवा जजों की पहल से मिला सामाजिक संदेश

हेमंत मेहरा का जन्म गूंता शाहपुर (बानसूर) में हुआ। वकालत से लेकर न्यायिक सेवा तक उनका सफर मेहनत और ईमानदारी से भरा रहा है। वहीं करीना काला नोहर (हनुमानगढ़) की रहने वाली हैं और आरजेएस परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रशिक्षणरत हैं। दोनों परिवार शिक्षित और सादगी की विचारधारा में विश्वास रखने वाले हैं। यही कारण है कि विवाह में अनावश्यक खर्च को पूरी तरह नकार दिया गया।

उनकी इस पहल ने समाज को एक मजबूत संदेश दिया है कि शादी दिखावे से नहीं, संस्कार और समझ से बड़ी होती है। दहेज नहीं, समानता और सम्मान ही वैवाहिक जीवन की बुनियाद है।

समाज के लिए प्रेरक उदाहरण

आज जब विवाह समारोहों में खर्च और दिखावा बढ़ रहा है, ऐसे समय में दो युवा न्यायिक अधिकारियों ने न केवल दहेज प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि सादगीपूर्ण विवाह कर समाज के सामने नई दिशा भी प्रस्तुत की। संविधान दिवस पर लिया गया यह कदम भारतीय लोकतंत्र, नैतिक मूल्यों और सामाजिक सुधार के प्रति उनकी गहरी आस्था को दर्शाता है।

यह विवाह निश्चित रूप से उन सभी युवाओं और परिवारों के लिए प्रेरणा है जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहते हैं। ऐसी पहल देश के हर कोने में फैलनी चाहिए, तभी दहेज मुक्त, समानता आधारित और प्रगतिशील समाज की परिकल्पना साकार हो सकेगी।

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