राजी सेठ: हिन्दी साहित्य की एक मौन-नदी

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स्मृति, मौन और संवेदना की अद्वितीय स्वर–सर्जक थीं ‘राजी सेठ’

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 डॉ ज्ञानेश्वरी सिंह ‘सखी’

समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य की दुनिया में राजी सेठ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील कथाकार-उपन्यासकार के रूप में स्थापित हैं। हाल ही में 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, और उनका जाना केवल एक लेखिका का जाना नहीं, बल्कि हिन्दी साहित्य की एक पूरी परंपरा का अवसान है। वे अपने साहित्य के माध्यम से स्त्री-अनुभव, उसकी स्मृति और उसके मौन की एक गहरी दस्तावेज़कर्ता थीं, जिनकी रचनाएँ आज भी पाठकों को भीतर तक प्रभावित करती हैं।

आइए, उनके जीवन और साहित्यिक यात्रा को और गहराई से जानते हैं।

 प्रारंभिक जीवन और शैक्षिक पृष्ठभूमि

राजी सेठ का जन्म 1935 में नौशेरा छावनी (अविभाजित भारत, आज पाकिस्तान में) हुआ था। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और इसके साथ ही तुलनात्मक धर्म और भारतीय दर्शन का भी विशेष अध्ययन किया। यह जानना रोचक है कि उच्च शिक्षा अंग्रेजी में होने के बावजूद उन्होंने अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी को चुना। उन्होंने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में, लगभग चालीस वर्ष की उम्र के आसपास, व्यवस्थित लेखन की शुरुआत की।

उनकी देर से आरंभ हुई इस साहित्यिक यात्रा ने हिन्दी जगत को कई अविस्मरणीय कृतियाँ दीं

 प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ

राजी सेठ की पहचान उनके उपन्यासों और सशक्त कहानियों से बनती है। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं:

 उपन्यास

 निष्कवच
 तत्-सम

ये दोनों ही उपन्यास मुख्य रूप से मध्यवर्गीय जीवन, स्त्री–अस्तित्व की पड़ताल, रिश्तों के बदलते स्वरूप और पात्रों के आंतरिक संघर्षों को बेहद सूक्ष्मता से चित्रित करते हैं।

 कहानी-संग्रह

 अंधे मोड़ से आगे
 तीसरी हथेली
 यात्रा-मुक्त
 दूसरे देशकाल में
 यह कहानी नहीं

उनका कथा-संसार अत्यंत विस्तृत है, जिसमें “खाली लिफ़ाफ़ा” और “किसका इतिहास” जैसे अन्य चर्चित संग्रह भी शामिल हैं। इन संग्रहों के अतिरिक्त, नेशनल बुक ट्रस्ट, भारत (NBT) द्वारा उनकी चुनी हुई कहानियों का एक महत्वपूर्ण संकलन “राजी सेठ की श्रेष्ठ कहानियाँ” नाम से भी प्रकाशित है।

तो आखिर उनकी लेखनी में ऐसी क्या विशेषता थी जो उन्हें अपने समकालीनों से अलग और अद्वितीय बनाती है?

लेखन शैली और रचनात्मक विशेषताएँ

राजी सेठ की रचनात्मकता उनके विशिष्ट शिल्प और गहरी संवेदना में निहित है। उनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

 मनोवैज्ञानिक गहराई: उनकी कहानियाँ बाहरी घटनाओं से अधिक मनुष्य के भीतरी भाव-लोक, मानसिक जटिलताओं और अवचेतन की परतों को खोलती हैं। उनके तुलनात्मक धर्म और भारतीय दर्शन के गहरे अध्ययन की छाप उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखती है, जहाँ वे पात्रों के बाहरी संघर्षों से अधिक उनकी आंतरिक यात्रा, अस्तित्व के प्रश्नों और आध्यात्मिक द्वंद्व को महत्व देती हैं। वे पात्रों के अंतर्मन में उतरकर उनके द्वंद्व को जिस बारीकी से पकड़ती हैं, उसके लिए उन्हें “मानव–मन की कुशल चितेरी” कहा गया है।
 

अद्वितीय शिल्प: वे अपनी कथा भाषा रचने के लिए कोलाज, बिंबात्मक भाषा और काव्यात्मक गद्य का अद्भुत प्रयोग करती थीं। इस शिल्प के माध्यम से उन्होंने कहानी को केवल घटना-वर्णन से उठाकर एक गहरे संवेदनात्मक अनुभव में बदल दिया, जो उस दौर के यथार्थवादी लेखन से एक महत्वपूर्ण प्रस्थान था।

संवेदना की भाषा: उनके साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वहाँ संवाद कम और संवेदना अधिक बोलती है। उन्होंने पात्रों के मौन को भाषा देकर हिन्दी कथा-साहित्य को एक नई शैली और ऊर्जा प्रदान की।

उनके साहित्य के सार को उनकी कहानी ‘खाली लिफ़ाफ़ा’ का यह संवाद खूबसूरती से व्यक्त करता है: 

“लड़कियाँ पहाड़ नहीं, नदियाँ होती हैं, नदियों पर पुल बन जाते हैं”

यह संवाद केवल एक कहानी का अंश नहीं, बल्कि उनके सम्पूर्ण साहित्य का निचोड़ है। यह संवाद स्त्री के मौन को एक सक्रिय, सृजनात्मक शक्ति के रूप में स्थापित करता है, एक ऐसा मौन जो स्वयं आने वाली पीढ़ियों के लिए संवाद का पुल बन जाता है।

साहित्य में उनके इस अद्वितीय योगदान को व्यापक रूप से सम्मानित भी किया गया

सम्मान एवं अन्य महत्वपूर्ण योगदान 

राजी सेठ को उनके साहित्यिक अवदान के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। प्रमुख सम्मानों की सूची इस प्रकार है:

 भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार
 हिंदी अकादमी सम्मान
 टैगोर लिटरेचर अवॉर्ड
 अनंत गोपाल शेवड़े हिंदी कथा पुरस्कार
 वाग्मणि सम्मान
 संसद साहित्य परिषद सम्मान

लेखन के अतिरिक्त, उन्होंने विश्व-साहित्य को हिन्दी पाठकों से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने प्रसिद्ध जर्मन कवि रिल्के के पत्रों और कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया। इसके साथ ही, उन्होंने साहित्यिक पत्रिका “युगसाक्षी” का सह-संपादन भी किया, जो उनके साहित्यिक सरोकारों को दर्शाता है।

इन सभी योगदानों ने मिलकर उनकी एक स्थायी साहित्यिक विरासत का निर्माण किया है।

राजी सेठ हिन्दी साहित्य में स्त्री के मौन, उसकी स्मृति और उसकी गहरी संवेदना की सबसे विश्वसनीय आवाज़ों में से एक थीं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से मानव-मन की उन परतों को छुआ, जहाँ शब्द अक्सर पहुँचने में असमर्थ हो जाते हैं। वे स्वयं एक मौन-नदी की तरह थीं, जो अब भले ही अनंत में विलीन हो गई हो, पर उनकी रचनाएँ साहित्य के सागर में मिलकर आने वाली पीढ़ियों के लिए संवाद और संवेदना का पुल बनी रहेंगी।

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