February 12, 2026

देश की अदालतों पर पेंडेंसी का पहाड़: 4.80 करोड़ केस लंबित, 4,855 जजों के पद खाली, यूपी सबसे पीछे!

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राज्यसभा में कानून मंत्री ने किया खुलासा 

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा रिक्तियां

सुप्रीम कोर्ट में भी 90,000 से अधिक मामले लंबित

NEWS1UP

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली। देश की न्याय व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। राज्यसभा में गुरुवार को पेश किए गए ताज़ा आंकड़े न्यायिक ढांचे पर बढ़ते दबाव और संसाधनों की भारी कमी की ओर साफ इशारा करते हैं। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने एक लिखित जवाब में बताया कि देशभर की जिला और अधीनस्थ अदालतों में 4.80 करोड़ से अधिक मामले फिलहाल लंबित हैं, जबकि जों के 4,855 पद खाली पड़े हैं। 

राज्य सभा में जानकारी देते कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल

सुप्रीम कोर्ट में भी बढ़ा बोझ

मंत्री ने जानकारी दी कि शीर्ष अदालत में भी लंबित मामलों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ी है।

  • 90,694 मामले 1 दिसंबर 2025 तक लंबित

  • 2021 में लंबित मामले: 70,239

इन संख्याओं से साफ है कि न्यायिक व्यवस्था पर बोझ कम होने के बजाय निरंतर बढ़ रहा है।

रिक्तियां भरने में देरी: जिम्मेदारी किसकी ?

सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी के प्रश्न का जवाब देते हुए मेघवाल ने स्पष्ट किया कि जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में जजों की नियुक्ति की जिम्मेदारी हाई कोर्ट और संबंधित राज्य सरकारों की है।वहीं, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में नियुक्तियां केंद्र सरकार और न्यायपालिका के सम्मिलित प्रयासों से की जा रही हैं।

उत्तर प्रदेश सबसे पीछे: रिक्तियों और लंबित मामलों में शीर्ष पर

राज्यसभा में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश न्यायिक ढांचे में सबसे अधिक संकट झेल रहा है।

लोअर ज्यूडिशियरी में रिक्तियां (जिला एवं अधीनस्थ अदालतें)

  • उत्तर प्रदेश – 1,055 रिक्तियां (देश में सबसे अधिक)

  • गुजरात – 535

  • मध्य प्रदेश – 384

हाई कोर्ट में भी UP का ही बोलबाला

  • इलाहाबाद हाई कोर्ट में 60 पद खाली, जो देशभर में सबसे अधिक है।

  • यहां 11,66,971 मामले लंबित, किसी भी हाई कोर्ट में सबसे अधिक।

UP की जिला अदालतों की स्थिति

  • 1,13,05,841 मामले लंबित, यह आंकड़ा अपने आप में देश की न्यायिक संरचना पर सबसे बड़ा सवाल है।

अन्य राज्यों की स्थिति

  • महाराष्ट्र की जिला अदालतों में रिक्तियां 2021 से अब तक 250 पर ही अटकी हुई हैं। यह स्थिरता न्यायिक प्रक्रिया में ठहराव और संसाधनों की कमी को दर्शाती है।

न्याय व्यवस्था पर संकट: समाधान कब ?

देश में न्यायिक पदों पर भारी रिक्तियां और लगातार बढ़ते लंबित मामलों ने न्याय तक समय पर पहुंच की संवैधानिक गारंटी पर गंभीर सवाल पैदा कर दिए हैं। कानून मंत्री के बयान से यह स्पष्ट है कि जजों की नियुक्तियों की प्रक्रिया तेज होनी चाहिए, राज्यों और हाई कोर्ट को मिलकर कार्य करना होगा तथा लंबित मामलों को खत्म करने के लिए ठोस सुधारात्मक कदम जरूरी हैं।

जब तक यह नहीं होता, तब तक “न्याय में देरी ही न्याय से इंकार है” वाली कहावत देश की वास्तविकता में और गहराई से उतरती जाएगी।

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