चमकीली इमारतें, नकली मुस्कान: चली गई एक और जान!!
10वीं मंज़िल से युवक ने लगाई छलांग
शहर की ऊँचाइयों में बढ़ती आत्महत्याओं ने जगाई चिंता
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। चमकती रोशनी, ऊँची इमारतें, लिफ्टों की आवाजाही, और बालकनियों से दिखने वाले खूबसूरत नज़ारे, हम अक्सर सोचते हैं कि हाई-राइज़ सोसायटियों में ज़िंदगी कितनी सुविधाजनक और बेफ़िक्र होगी। लेकिन इन चमकदार दीवारों के पीछे कभी-कभी ऐसे दर्द छिपे होते हैं, जिनकी आहट तक पास रहने वालों को नहीं मिलती। यह आधुनिक समाज का वही सन्नाटा है, जिसमें कई ज़िंदगियाँ खामोशी से टूटती जा रही हैं।
गाजियाबाद में हाई-राइज़ बिल्डिंग्स में बढ़ती आत्महत्याओं की हालिया घटनाओं ने एक बार फिर यह एहसास कराया है कि दिखने वाली खुशहाल ज़िंदगी के भीतर कभी-कभी ऐसी उथल-पुथल चल रही होती है, जो किसी को दिखाई नहीं देती। इसी सन्नाटे को बीती शुक्रवार रात राजनगर एक्सटेंशन की एक सोसायटी ने महसूस किया, एक ऐसी रात जो अपने पीछे कई सवाल, कई पीड़ाएँ छोड़ गई।

अजनारा इंटेग्रिटी सोसायटी में शुक्रवार रात घटी घटना ने वहाँ मौजूद हर व्यक्ति का दिल दहला दिया। 35 वर्षीय सत्यम, जो अपनी बहन से मिलने आया था, अचानक 10वीं मंज़िल से कूद गया। किस दर्द ने उसे यह कदम उठाने पर मजबूर किया, यह सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है। सोसायटी कर्मियों द्वारा पुलिस को सूचना देने के बाद जाँच शुरू हुई। शुरुआती निष्कर्ष बताते हैं कि सत्यम किसी पारिवारिक तनाव से जूझ रहा था। शायद भीतर कुछ ऐसा था जो वह कह नहीं पा रहा था… शायद उसकी मुस्कान के पीछे कोई अनकही कसक छिपी थी… कौन जानता था कि बहन के घर आया यह युवक अपनी ही ज़िंदगी का आख़िरी पड़ाव भी यहीं बना लेगा।
लोगों ने बचाने की कोशिश की लेकिन…
घटना के तुरंत बाद सोसायटी गार्ड और स्थानीय लोग उसे अस्पताल ले गए। संजय नगर के एक प्राइवेट अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। बहन और परिवार पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा, एक ऐसे क्षण में, जब सुबह सब कुछ सामान्य था, शाम होते-होते ज़िंदगी का सबसे बड़ा सदमा उनके सामने खड़ा था।
बेंगलुरु में नौकरी करता था युवक
सत्यम बेंगलुरु के एक अपार्टमेंट में रहता था और एक निजी कंपनी में कार्यरत था। एक दिन पहले ही वह अपनी बहन डॉ. नूर से मिलने गाजियाबाद आया था। किसी को यह अंदाज़ा भी नहीं था कि यह मुलाक़ात उनके बीच अंतिम होगी।

एसीपी उपासना पांडे के अनुसार, सत्यम ने बालकनी की सेफ़्टी नेट हटाई और फिर छलांग लगा दी। यह निर्णय कितने क्षणों में लिया गया होगा, या शायद कितने दिनों से मन में पल रहा होगा, कहना मुश्किल है। फिलहाल पुलिस घटना के कारणों की जाँच कर रही है।
क्या हम अपने ही लोगों की आवाज़ें सुनना भूल गए हैं ?
इस घटना ने उस बड़ी समस्या की ओर इशारा किया है, जिससे आज का शहरी समाज जूझ रहा है, अकेलापन, मानसिक तनाव, भावनात्मक दूरी और अंतहीन दबाव। इन ऊँची-ऊँची इमारतों में हर फ्लैट में एक परिवार है, लेकिन हर दिल में एक खालीपन भी है। कभी-कभी लोग मुस्कुराते हैं, काम करते हैं, मिलते-जुलते हैं और फिर किसी रात खामोशी से टूट जाते हैं। और यही ख़ामोशी अपने पीछे कई अनुत्तरित सवाल छोड़ जाती है-
क्या हम एक-दूसरे को पर्याप्त सुनते हैं ? क्या हम अपने प्रियजनों के भीतर चल रहे संघर्षों को समझने की कोशिश करते हैं ? क्या समाज की रफ़्तार इतनी तेज़ हो चुकी है कि कोई पीछे छूट रहा हो तो हमें दिखाई ही न दे ?
संवेदनाएँ खोने से पहले उन्हें बचाना होगा
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ प्रेम लता चावला कहती हैं कि-

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परिवार में संवाद बढ़ाना होगा,
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मानसिक तनाव को स्वीकार करने और बताने का साहस बढ़ाना होगा,
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और सोसायटी तथा प्रशासन को मिलकर मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर पहल करनी होगी।
आख़िरकार, इमारतें जितनी ऊँची हों, ज़िंदगी उतनी मज़बूत हो, यह सुनिश्चित करना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
