POCSO मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त!
ऐतिहासिक फैसलों ने बच्चों की सुरक्षा को नई दिशा दी
NEWS1UP
विशेष संवाददाता
नई दिल्ली। देश में बच्चों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराधों ने न्यायपालिका को बार-बार यह याद दिलाया है कि ऐसे मामलों में अदालतों का रुख केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय भी होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर निचली अदालतों और कभी-कभी उच्च न्यायालयों द्वारा की गई असंवेदनशील व रूढ़िवादी टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए साफ कहा है कि पीड़ित की गरिमा और मानसिक स्थिति का सम्मान न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।

POCSO कानून: बच्चों की सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम
बढ़ते यौन अपराधों के मद्देनज़र वर्ष 2012 में लागू हुए Protection of Children from Sexual Offences Act (POCSO) ने बच्चों की सुरक्षा को कानूनी मजबूती प्रदान की। इस कानून के तहत यौन अपराधों पर कठोर दंड का प्रावधान है और आरोपी को किसी भी तकनीकी आधार पर राहत देने की गुंजाइश न्यूनतम है।
ऐतिहासिक फैसले जिन्होंने POCSO की व्याख्या को बदला
मुंबई हाई कोर्ट का “स्किन-टू-स्किन” निर्णय और सुप्रीम कोर्ट की कड़ी प्रतिक्रिया
मुंबई हाई कोर्ट ने अपने विवादित फैसले में कहा था कि कपड़ों के ऊपर से छूना POCSO के तहत “यौन हमला” नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें ‘त्वचा-से-त्वचा संपर्क’ नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को तत्काल रद्द करते हुए टिप्पणी की कि-
“POCSO की व्याख्या संकीर्ण नजरिये से नहीं की जा सकती, कपड़ों के ऊपर से की गई छेड़छाड़ भी यौन हमला ही है।”
अदालत ने दोहराया कि कानून का उद्देश्य बच्चे की सुरक्षा है, न कि आरोपी को तकनीकी खामियों का फायदा देना।
बाल विवाह और वैवाहिक बलात्कार पर ऐतिहासिक टिप्पणी
एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 15 से 18 वर्ष की नाबालिग पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाना POCSO के तहत रेप माना जाएगा। यह फैसला वैवाहिक संबंधों के नाम पर होने वाले यौन शोषण पर रोक लगाने की दिशा में बड़ा कदम माना गया।
संवेदनशील न्याय प्रक्रिया की अनिवार्यता
अलख आलोक श्रीवास्तव की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के लिए कोर्ट प्रक्रियाओं को और अधिक संवेदनशील बनाने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि POCSO मामलों की जांच और सुनवाई तेज़ की जाए, पीड़ित की पहचान हर हाल में गोपनीय रखी जाए। अदालत की प्रक्रिया बच्चों के अनुकूल हो तथा पीड़ित को आरोपी के आमने-सामने न लाया जाए। कोर्ट ने कहा कि पुलिस, डॉक्टर और न्यायाधीशों के लिए विशेष प्रशिक्षण आवश्यक है।
मानसिक आयु नहीं, शारीरिक आयु का आधार
एक मामले में यह सवाल उठा कि क्या मानसिक रूप से नाबालिग दिखने वाली वयस्क महिला को POCSO के तहत “बच्चा” माना जा सकता है ?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया-
“कानूनी परिभाषा में बच्चा वही है जिसकी जैविक (शारीरिक) आयु 18 वर्ष से कम हो। मानसिक आयु की अवधारणा को POCSO में शामिल नहीं किया जा सकता।”
FIR में देरी को अपराध पर संदेह का आधार नहीं
कोर्ट ने कहा कि सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक दबाव के कारण कई परिवार शिकायत दर्ज कराने में देर करते हैं। इसलिए POCSO मामलों में देरी को झूठी FIR का आधार नहीं माना जाना चाहिए।
पीड़ित की पहचान का कड़ा संरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया, सोशल प्लेटफ़ॉर्म या किसी व्यक्ति द्वारा पीड़ित बच्चे की पहचान उजागर करने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया। कानून के तहत यह एक दंडनीय अपराध है।
नाबालिग की सहमति का कोई महत्व नहीं
अदालत ने दोहराया कि 18 वर्ष से कम आयु में कानूनी सहमति संभव नहीं है। नाबालिग द्वारा सहमति जैसा कोई भी व्यवहार कानून में स्वीकार्य नहीं है।
पूर्वाग्रहपूर्ण टिप्पणियाँ अस्वीकार्य
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि पीड़ित के पहनावे, चरित्र या व्यवहार पर टिप्पणी नहीं की जा सकती, यौन अपराधों के मामलों में रूढ़िवादी या पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण अस्वीकार्य है और न्यायाधीशों को लैंगिक-संवेदनशीलता को प्राथमिकता देनी चाहिए।
