October 11, 2026
[t4b-ticker]

अरावली पर नीति बनाम प्रकृति की जंग: सुप्रीम कोर्ट को सताया ‘संरचनात्मक खतरे’ का डर!

0
AA F

विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर अस्थायी ब्रेक

इकोलॉजिकल निरंतरता पर कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

NEWS1UP

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली। देश की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शुमार अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसे सिर्फ न्यायिक हस्तक्षेप नहीं बल्कि नीतिगत आत्ममंथन के रूप में देखा जा रहा है। शीर्ष अदालत ने अपने ही पहले स्वीकार किए गए निष्कर्षों और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर फिलहाल रोक लगाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण संरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जल्दबाज़ी से लिया गया कोई भी फैसला दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकता है।

क्यों ज़रूरी हुआ सुप्रीम कोर्ट का यह कदम ?

असल में यह मामला सिर्फ खनन या पहाड़ियों की परिभाषा का नहीं, बल्कि अरावली की संरचनात्मक अखंडता और पारिस्थितिक निरंतरता से जुड़ा है। अदालत को यह आशंका सताने लगी कि तकनीकी परिभाषाओं के सहारे कहीं ऐसा न हो कि संरक्षण का दायरा सिमट जाए और खनन के लिए नए रास्ते खुल जाएं।

इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने न केवल पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के तहत बनी समिति की सिफारिशों को स्थगित किया, बल्कि अपने 20 नवंबर 2025 के आदेश पर भी अस्थायी ब्रेक लगा दिया।

अदालत की चिंता: परिभाषा कहीं खतरा न बन जाए

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने बेहद अहम सवाल उठाए, जो इस पूरे विवाद की जड़ को छूते हैं:-

  • क्या अरावली की पहचान को सिर्फ 500 मीटर के दायरे तक सीमित करना, संरक्षण की मूल भावना से टकराता है ?

  • क्या इस सीमांकन से गैर-अरावली क्षेत्र कृत्रिम रूप से बढ़ रहा है, जहां रेगुलेटेड माइनिंग संभव हो सके ?

  • दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच 100 मीटर या उससे अधिक के गैप में खनन की अनुमति क्या इकोलॉजिकल ‘ब्रेक’ पैदा नहीं करेगी ?

  • 700 मीटर जैसे बड़े गैप में जैव विविधता और जल-भरण क्षेत्र की सुरक्षा कैसे होगी ?

  • यदि नियामकीय ढांचे में कोई गंभीर कमी है, तो क्या पूरे अरावली रेंज का स्ट्रक्चरल मूल्यांकन जरूरी नहीं ?

ये सवाल इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मामला केवल नक्शों और मापदंडों का नहीं, बल्कि प्राकृतिक तंत्र की अविभाज्य श्रृंखला का है।

नया विशेषज्ञ पैनल: निष्पक्षता की तलाश

सुप्रीम कोर्ट ने अब पर्यावरण, भू-विज्ञान और पारिस्थितिकी के डोमेन विशेषज्ञों की एक उच्च-स्तरीय स्वतंत्र समिति बनाने का फैसला किया है। यह पैनल पुरानी रिपोर्ट का दोबारा विश्लेषण करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि किसी भी सिफारिश से संरक्षण क्षेत्र कमजोर न पड़े, खनन गतिविधियों को अप्रत्यक्ष बढ़ावा न मिले और अरावली की पारिस्थितिक निरंतरता बनी रहे।

केंद्र और राज्यों को नोटिस

कोर्ट ने इस प्रक्रिया में केंद्र सरकार के साथ-साथ अरावली से जुड़े चार राज्यों, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात को भी नोटिस जारी किया है। यह कदम बताता है कि अदालत इस मुद्दे को संघीय और क्षेत्रीय जिम्मेदारी के रूप में देख रही है, न कि सिर्फ न्यायिक विवाद के तौर पर।

21 जनवरी 2026: निर्णायक मोड़

अब इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी। तब तक न तो समिति की सिफारिशें लागू होंगी और न ही सुप्रीम कोर्ट के पहले के निष्कर्ष। यह अंतरिम ठहराव दरअसल एक चेतावनी है कि पर्यावरण से जुड़े फैसलों में गति से ज्यादा गहराई और संतुलन जरूरी है।

अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, सुरक्षा कवच है

अरावली रेंज उत्तर भारत के लिए जलवायु संतुलन, भूजल रिचार्ज और रेगिस्तानी विस्तार को रोकने का प्राकृतिक कवच है। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप संकेत देता है कि यदि संरक्षण की परिभाषा ही कमजोर पड़ गई, तो कानून के सहारे भी प्रकृति को बचाना मुश्किल हो जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed

error: Content is protected !!