समय था… कॉल थी… फिर भी बच नहीं सके युवराज!!
प्रतीकात्मक इमेज
सूचना दर्ज हुई, लेकिन मशीनरी रेंगती रही
20 मिनट में कंट्रोल रूम, 50 मिनट में मौके पर फोर्स
बहुत देर हो चुकी थी!
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
नोएडा। सेक्टर-150 की बीती 16 जनवरी की वह रात सिर्फ़ कोहरे से भरी नहीं थी, वह प्रशासनिक अंधेरे से भी ढकी हुई थी। 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता गुरुग्राम से अपने घर ग्रेटर नोएडा लौट रहे थे। रात के लगभग 12 बजे, घने कोहरे और बेहद कम विजिबिलिटी के बीच, एटीएस ले-ग्रैडियोज के पास एक खतरनाक टी-प्वाइंट पर उनकी कार अनियंत्रित हुई और सड़क किनारे बने एक निर्माणाधीन मॉल के पानी से भरे बेसमेंट में जा गिरी।
मिली जानकारी के मुताबिक यह वही मॉल था, जिसे नोएडा प्राधिकरण ने अपने कब्जे में ले रखा था, लेकिन न तो सेफ्टी वॉल थी, न बैरिकेडिंग, न रिफ्लेक्टर, न चेतावनी बोर्ड। कार पानी में गिरी, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। युवराज जिंदा थे, और सबसे अहम, युवराज के पास समय था।

12 बजकर 20 मिनट: बेटे की आख़िरी उम्मीद
कार के डूबते ही युवराज ने खुद को बाहर निकालने की कोशिश की। नाकाम होने पर उन्होंने रात करीब 12:20 बजे अपने पिता राजकुमार मेहता को फोन किया। बेटे की आवाज़ थी, डरी हुई, कांपती हुई, लेकिन ज़िंदा। पिता बदहवास हो उठे। बिना एक पल गंवाए उन्होंने डायल 112 पर फोन किया। 12:25 बजे सूचना दर्ज हो जाती है। यह वह बिंदु है, जहाँ किसी आधुनिक, “स्मार्ट सिटी” कहलाने वाले सिस्टम को काम करना चाहिए था।
सूचना थी… सिस्टम सुस्त था
सूचना दर्ज होने के बावजूद कंट्रोल रूम से ज़मीनी कार्रवाई बेहद सुस्त रही। समय 12:41 यानी करीब 20 मिनट बाद, कंट्रोल रूम प्रभारी तक कॉल पहुंचती है। 12 बजकर 50 मिनट पर घटना के लगभग 50 मिनट बाद पुलिस और दमकलकर्मी मौके पर पहुंचते हैं। उस दौरान चश्मदीदों के मुताबिक युवराज पानी में डूबी कार की छत पर मोबाइल टॉर्च जलाकर “बचाओ-बचाओ” की गुहार लगा रहे थे।
वह पल सिर्फ़ युवराज की ज़िंदगी की जंग नहीं था, वह प्रशासन की परीक्षा थी। और उस परीक्षा में सिस्टम फेल हो गया।

डर, अव्यवस्था और संसाधनों की कमी
रेस्क्यू टीम मौके पर तो थी, लेकिन तैयार नहीं थी। पानी से भरे बेसमेंट में उतरने के लिए न पर्याप्त संसाधन थे, न स्पष्ट कमांड। 1:15 पर SDRF पहुंचती है, लेकिन पानी में उतरने में असमर्थ रहती है। 1 बजकर 45 मिनट पर युवराज कार समेत पूरी तरह पानी में डूब जाते हैं। रात 2 बजे NDRF सर्च शुरू करती है और सुबह 4 बजे युवराज को बाहर निकाला जाता है। अस्पताल पहुंचाया जाता है, लेकिन तब तक सब खत्म हो चुका था।
विकास के दावे बनाम ज़मीनी हकीकत
जिस प्लॉट में यह हादसा हुआ, वह नोएडा प्राधिकरण के कब्जे में था। इसके बावजूद वहां कोई सेफ्टी वॉल नहीं, खतरनाक मोड़ पर कोई बैरिकेडिंग नहीं तथा कोई रिफ्लेक्टर या चेतावनी संकेत नहीं थे।
युवराज के पिता राजकुमार मेहता का सवाल सीधा है कि-
“अगर यह जगह इतनी खतरनाक थी, तो पुलिस और प्राधिकरण ने पहले से इंतज़ाम क्यों नहीं किए?”
यह सवाल सिर्फ़ एक पिता का नहीं है। यह उन तमाम नागरिकों का भी सवाल है, जिन्हें बताया जाता है कि शासन आपकी उंगलियों पर है, 112 तुरंत मदद करता है, स्मार्ट सिटी सुरक्षित होती है।
यह हादसा नहीं, जवाबदेही की मौत है
युवराज की मौत इसलिए नहीं हुई कि कोहरा था, और न ही युवराज की मौत इसलिए हुई कि कार फिसल गई थी, युवराज की मौत इसलिए हुई क्योंकि खतरे को पहले से नजरअंदाज किया गया, सूचना मिलने के बाद भी तत्परता नहीं दिखाई गई और मौके पर पहुंचकर भी निर्णय और संसाधन नहीं थे।
यह एक ऐसी मौत है, जिसमें समय भी था, कॉल भी थी, सिस्टम भी था, पर संवेदनशीलता और जवाबदेही नहीं थी।
आज सवाल यह नहीं है कि युवराज कैसे मरे। सवाल यह है कि जब सब कुछ होने के बावजूद एक युवक को बचाया नहीं जा सका, तो शासन-प्रशासन के “तेज़, सक्षम और जन-सुलभ” होने के दावे किस काम के हैं ?
युवराज तो चला गया। लेकिन उसके पिता की आंखों में डूबता बेटा और समाज के सामने डूबता सिस्टम, अब भी जवाब मांग रहा है।
