जब हर पंक्ति पर तालियाँ बजीं: दिल्ली-99 सोसाइटी में देर रात तक गूंजा सरस कवि सम्मेलन!

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वैश्विक हिंदी परिवार और दिल्ली-99 सोसाइटी के

संयुक्त तत्वावधान में भव्य आयोजन

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। वैश्विक हिंदी परिवार एवं दिल्ली–99 सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में भौपुरा स्थित दिल्ली–99 सोसाइटी के क्लब हाउस में ‘सरस कवि सम्मेलन’ का भव्य आयोजन किया गया। रविवार देर रात तक चले इस साहित्यिक आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए कवि, कवयित्रियों और शायरों ने श्रृंगार, हास्य, वीर, व्यंग्य और करुण रस की प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ ओज के सुप्रसिद्ध कवि सत्यवान यादव एवं वैश्विक हिंदी परिवार के मानक निदेशक विनयशील चतुर्वेदी द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। सोसाइटी की दो नन्ही बालिकाओं ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

काव्य-संध्या की सशक्त शुरुआत कवयित्री अपर्णा भटनागर ने अपने मधुर गीत

“प्रियतम प्रेम तुम्हारा मेरा, सागर सजल अनंत हो, जैसे बंधन बाधाओं से बहती पवन स्वतंत्र हो” से की, जिसने प्रेम और स्वतंत्रता के भावों को गहराई दी।

प्रसिद्द गीतकार विनयशील चतुर्वेदी ने शायराना अंदाज़ में देशभक्ति की कविता कुछ इन अल्फ़ाज़ों में पढ़ी-

मेरी आँख में ए मेरे वतन, तेरी चाहतों का ख़ुमार है, मेरी हर तलाश में तू ही तू , मेरे दिल का तू ही दयार है!!

कवि नागेंद्र शिशोदिया की पंक्तियाँ- 

“लोभी जग नीरस लगे और लगे जंजाल, मुझको बस प्यारी लगे कवियों की चौपाल” ने साहित्यिक आत्मीयता को स्वर दिया।

कवयित्री नीता परिणीता की ग़ज़ल- 

“कोई शिकवा न शिकायत, नहीं गिला करना, तुम मेरे बाद मेरे फ़न की हिफ़ाज़त करना” ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

बी.एस. भरद्वाज ने अपनी दार्शनिक रचना-

“मौन का अभ्यास कर, वाणी यदि तत्पर नहीं है, कौन कहता मौन से हिलता कोई पत्थर नहीं है” से गहन चिंतन का संदेश दिया।

रेणुका आर्या की संवेदनशील पंक्तियाँ- 

“बेपरवाह सा दिखता था, क्यूँ अपना सा लगता है, बेग़ाने शहर की भीड़ में कोई तो मुझसा दिखता है” ने एकांत और अपनत्व का भाव उकेरा।

ब्रजेश तरुवर ने ईश्वर-भक्ति से सराबोर रचना- 

“सुर भी देता है, ताल देता है, लफ़्ज़ भी वही ढाल देता है…” से श्रद्धा का भाव जाग्रत किया।

लखनऊ से आए ओज के सुप्रसिद्ध कवि सत्यवान यादव की पंक्तियों-

कोई सौगात भी है गवारा नहीं, रीझता मन किसी पर हमारा नही । आपको कुछ भी प्रिय हो धरा पर मगर, हमको भारत सा है कुछ भी प्यारा नहीं ।। ने श्रोताओं के अंदर जोश भर दिया।

सौरभ कुमार मिश्र की पंक्तियाँ-

“जब याद हमारी आए तो थोड़ा हँस लेना, थोड़ा रो लेना” ने स्मृतियों और भावनाओं को स्पर्श किया।”

सर्वेश कुमार रस्तोगी की शृंगारिक रचना-

“उड़ न जाए सर से दुपट्टा तेरा कहीं, दोस्तों की आँख में लगाम नहीं है” ने श्रोताओं को मुस्कराने पर विवश किया।

हास्य-व्यंग्य का सशक्त रंग डॉ. राजेश श्रीवास्तव की रचना- 

“एक कैरेक्टर सबके अंदर फूफा-जीजा वाला है…” में खूब खिला।

सुप्रिया ‘स्वप्निल’ ने तीखा प्रश्न उठाते हुए कहा- 

“क्यों किसी के मरते ही हम उसे ख़ुदा बना देते हैं ?” जिसने श्रोताओं को आत्मचिंतन के लिए विवश कर दिया।

देशभक्ति और ओज का स्वर कामना मिश्रा की पंक्तियों- 

सहेगा कब तलक ये देश, जयचंदों को बतलाओ” में मुखर हुआ।

दिवाकर चौबे ने ऋतु और प्रकृति का सौंदर्य उकेरते हुए सुनाया- 

आ रहा मधुमास है अब, तन जगा है अब शयन से…”

वरिष्ठ शायर नरेश मलिक की ओजपूर्ण ग़ज़ल- “बिना बात हम कब किसी से भिड़े हैं…” ने आत्मबल और सत्यनिष्ठा का संदेश दिया।

युवा कवि यश शर्मा की संक्षिप्त लेकिन प्रभावी पंक्ति- 

“क़ैद में आज तक परिंदा है, फिर भी उड़ने की आस ज़िंदा है” ने खूब तालियाँ बटोरीं।

डॉ. नित्यानंद शुक्ल ‘नीरव’ की रचना-  “रूत कभी तो सुहानी भी बन जाएगी…”  ने आशा और सकारात्मकता का संचार किया।

अनिल राज की ओजस्वी पंक्तियाँ-

“झुके सामने जिसके सातों सागर…” ने वीर रस को स्वर दिया।

पर्यावरण संरक्षण का संदेश डॉ. उषा श्रीवास्तव ने-

“पेड़ पौधे काट करके जंगलों में आग…” के माध्यम से दिया।

मीनाक्षी यादव ने अयोध्या और भगवा की भावना को स्वर देते हुए सुनाया-

“सरयू के तट पे जो लहराया भगवा तो…”

अरविंद पथिक की वीर रस से ओतप्रोत पंक्तियाँ-

“टांग आए हैं शमी पर शस्त्र अपने…” ने राष्ट्रभाव को प्रबल किया।

जी.एस. पचौरी की प्रेरक सीख-

“खुद से खुद को जीत लिया, तो जग जीत लोगे तुम” कार्यक्रम का आत्मबल बढ़ाने वाला संदेश बनी।

इस अवसर पर मासिक पत्रिका ‘साहित्यिक सप्तक’ के नवीन अंक का लोकार्पण भी हुआ। कार्यकर्ता का संचालन जानेमाने मंच संचालक मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’ ने किया और उन्होंने अंत तक कवियों एवं श्रोताओं को अपने संचालन से बांधे रखा।

श्रृंगार, हास्य, वीर, व्यंग्य और करुण, सभी रसों से परिपूर्ण इस कवि सम्मेलन को विशेष गरिमा प्रदान की सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अशोक मिश्रा के सानिध्य तथा वरिष्ठ कवि नरेश मलिक, गीतकार अशोक कश्यप, साहित्य सप्तक के संपादक अरविंद पथिक, वरिष्ठ कवयित्री इंदु मिश्रा, कवि मनोज अबोध, बृजेश तरुवर एवं शायर असलम बेताब की विशिष्ट उपस्थिति ने।

मानवीय संवेदनाओं, राष्ट्रप्रेम, हास्य के ठहाकों और साहित्यिक गरिमा के साथ यह सरस कवि सम्मेलन श्रोताओं के मन में शब्दों की अमिट छाप छोड़ते हुए अपने भव्य समापन तक पहुँचा।

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