मतपत्र पर विरोध के दो शब्द, सत्ता के लिए हजारों सवाल!
प्रतीकात्मक इमेज
53 हजार से अधिक अवैध मत और ‘UGC Roll Back‘ की चर्चा को महज चुनावी आंकड़ा समझना भूल होगी!
शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के रुख में छिपे संभावित असंतोष को भाजपा 2027 से पहले कितना गंभीरता से समझती है ?
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
लोकतंत्र में मतदाता की चुप्पी हमेशा सहमति नहीं होती। कई बार वह बिना नारे लगाए, बिना सड़कों पर उतरे और बिना किसी राजनीतिक मंच का सहारा लिए अपनी असहमति दर्ज करा देता है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों के चुनाव परिणामों के बीच सामने आया 53,615 अमान्य मतों का आंकड़ा और कुछ मतपत्रों पर कथित तौर पर लिखा गया ‘UGC Roll Back‘ इसी सवाल को जन्म दे रहा है। क्या इन मतपत्रों में केवल मतदान की त्रुटियां छिपी हैं या कहीं सत्ता के प्रति असंतोष की आवाज भी दर्ज हुई है?
भाजपा ने भले ही 11 में से छह सीटों पर जीत दर्ज की हो, लेकिन समाजवादी पार्टी की पांच सीटों पर सफलता और कुल मतदान के करीब आठ प्रतिशत मतों का अमान्य होना इस चुनाव को सामान्य जीत-हार से आगे ले जाता है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इन सीटों पर मतदान करने वाले सामान्य मतदाता नहीं, बल्कि शिक्षक और स्नातक थे।
यानी ऐसा वर्ग, जिसे शिक्षित, जागरूक और राजनीतिक घटनाक्रमों को समझने वाला माना जाता है!
ऐसे में 53 हजार से अधिक मतों का अमान्य होना कई सवाल खड़े करता है। क्या इतनी बड़ी संख्या केवल मतदान प्रक्रिया की जानकारी के अभाव या तकनीकी गलतियों का परिणाम थी ? या कुछ मतदाताओं ने जानबूझकर अपनी असहमति दर्ज कराने के लिए मतपत्र को विरोध का माध्यम बनाया ? यदि ‘UGC Roll Back’ लिखे मतपत्रों की चर्चा सही है, तो इसे महज चुनावी तकनीकी चूक मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।
हालांकि, इन सभी अमान्य मतों को किसी राजनीतिक विरोध से जोड़ना या यह मान लेना कि सभी मतपत्रों पर UGC के खिलाफ संदेश लिखा गया था, तथ्यों से परे होगा। ऐसे मतपत्रों की वास्तविक संख्या सामने आना भी जरूरी है। लेकिन इस संभावना की पड़ताल जरूर होनी चाहिए कि शिक्षित मतदाताओं का एक हिस्सा सरकार की नीतियों से असहमत होकर अपना विरोध दर्ज करा रहा है।

भाजपा के लिए चिंता का असली कारण क्या है ?
भाजपा के लिए इस चुनाव का संदेश केवल पांच सीटों पर सपा की जीत तक सीमित नहीं है। असली सवाल उसके उस समर्थक वर्ग को लेकर है, जिसे लंबे समय से पार्टी की राजनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण आधार माना जाता रहा है। शिक्षित, स्नातक और सवर्ण मतदाताओं के बीच UGC जैसे मुद्दों को लेकर यदि नाराजगी पनप रही है, तो यह भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
किसी भी राजनीतिक दल का परंपरागत वोट बैंक स्थायी संपत्ति नहीं होता। मतदाता किसी दल का समर्थक हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह उसकी हर नीति और फैसले से सहमत भी हो।
खासकर शिक्षित वर्ग से यह अपेक्षा करना कि वह राजनीतिक निष्ठा के नाम पर हर मुद्दे पर चुप रहेगा, लोकतांत्रिक समझ की भूल होगी!
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट का परिणाम भी इस चुनाव की गंभीरता बढ़ाता है। यहां जीत-हार का अंतर महज 307 मत रहा, जबकि 2,800 मत अवैध घोषित हुए। हालांकि अमान्य मतों को किसी एक दल के पक्ष या विरोध में जोड़कर परिणाम का नया गणित नहीं बनाया जा सकता, लेकिन इतने कम अंतर के मुकाबले अमान्य मतों की बड़ी संख्या चुनावी व्यवहार के विश्लेषण की जरूरत जरूर बताती है।
2027 से पहले पढ़ना होगा मतदाता का मिजाज
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा के सामने यह समझने की चुनौती है कि क्या उसके समर्थक वर्ग के भीतर कोई वैचारिक या नीतिगत असंतोष आकार ले रहा है? क्या UGC जैसे मुद्दे शिक्षकों, स्नातकों और शिक्षित युवाओं के बीच राजनीतिक नाराजगी का कारण बन रहे हैं? और क्या इस नाराजगी का असर आने वाले चुनावों में भी दिखाई दे सकता है?
राजनीति में सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती हमेशा विपक्ष की ताकत नहीं होती। कई बार अपने ही समर्थकों की खामोश नाराजगी उससे बड़ा सवाल बन जाती है। विपक्ष के विरोध को तो सत्ता राजनीतिक चुनौती मानकर उसका मुकाबला कर सकती है,
लेकिन जब असहमति अपने ही समर्थक वर्ग के भीतर जन्म लेने लगे, तो उसे समझने के लिए आत्ममंथन और संवाद दोनों की जरूरत होती है!
विधान परिषद चुनाव में छह सीटों की जीत भाजपा की उपलब्धि जरूर है, लेकिन 53,615 अमान्य मतों और ‘UGC Roll Back’ की चर्चा से उठे सवालों को इस जीत के शोर में दबा देना राजनीतिक समझदारी नहीं होगी।
आखिर लोकतंत्र में चुनाव केवल सीटें जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि मतदाता के मन को समझने का अवसर भी होते हैं। सत्ता की असली सफलता इस बात में है कि वह अपने समर्थकों की अपेक्षाओं और असहमतियों को कितनी गंभीरता से सुनती है।
क्योंकि मतदाता जब खामोश होता है, तो जरूरी नहीं कि वह सहमत भी हो। और जब वही मतदाता मतपत्र पर अपने विरोध के शब्द लिखने लगे, तो सत्ता को उन शब्दों का अर्थ समझने में देर नहीं करनी चाहिए। कभी-कभी मतपत्र पर लिखे दो शब्द हजारों नारों से अधिक गंभीर राजनीतिक संदेश दे जाते हैं।
