November 5, 2026
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‘अंतरिक्ष ग्रीन्स’ विवाद पर कोर्ट की मुहर: AOA पूरी तरह वैध, सभी आरोप खारिज

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45 लोगों के आरोप खारिज, चुनाव प्रक्रिया पर लगी मुहर, अब सोसाइटी खाते को अनफ्रीज़ करने की मांग तेज

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। कौशांबी स्थित अंतरिक्ष ग्रीन्स सोसाइटी में लंबे समय से सुलग रहा विवाद आखिरकार न्यायिक मुहर के साथ थम गया है। उपजिलाधिकारी एवं विहित प्राधिकारी अरुण दीक्षित की कोर्ट ने अपने सख्त और स्पष्ट आदेश में यह घोषित कर दिया है कि 16 अप्रैल 2025 को गठित अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) पूरी तरह वैध, विधिसंगत और नियमों के अनुरूप है, और इसमें किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही विरोधी पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया है। 

न्यायालय के इस निर्णायक आदेश की सत्यापित प्रति मूल अभिलेखों सहित डिप्टी रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसायटीज एवं चिट्स को भेज दी गई है। इस फैसले को केवल अंतरिक्ष ग्रीन्स ही नहीं, बल्कि पूरे गाजियाबाद की सोसाइटी व्यवस्था के लिए एक नजीर (precedent) के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में होने वाले विवादों की दिशा तय कर सकता है।

प्रतीकात्मक इमेज (AI)

खाते अनफ्रीज़ करने की मांग तेज

फैसले के तुरंत बाद AOA सचिव सुधा चौधरी ने अन्य पदाधिकारियों के साथ सक्रियता दिखाते हुए डिप्टी रजिस्ट्रार को पत्र भेजा है, जिसमें सोसाइटी के बैंक खाते को पूर्ण रूप से अनफ्रीज़ करने की मांग की गई है।

उल्लेखनीय है कि बीते वर्ष दर्जनों शिकायतों के आधार पर सोसाइटी का बैंक खाता फ्रीज़ कर दिया गया था। हालांकि बाद में वर्तमान डिप्टी रजिस्ट्रार वैभव कुमार ने आवश्यक खर्चों के लिए सीमित संचालन की अनुमति दी थी। अब न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बाद खाते को पूरी तरह चालू करने का दबाव तेज हो गया है।

वैभव कुमार, डिप्टी रजिस्ट्रार

इस संबंध में डिप्टी रजिस्ट्रार वैभव कुमार ने कहा-

“न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होते ही सोसाइटी के बैंक खाते को नियमानुसार पूर्ण रूप से अनफ्रीज़ करने की प्रक्रिया पूरी कर दी जाएगी।”

चुनाव से शुरू हुआ टकराव

यह मामला वाद संख्या 18431/2025 (सतेंद्र सिंह व अन्य बनाम अध्यक्ष/सचिव, AOA अंतरिक्ष ग्रीन्स) में 28 मार्च को निर्णीत हुआ। दरअसल, 17 अप्रैल 2025 को डिप्टी रजिस्ट्रार के निर्देश पर नियुक्त चुनाव अधिकारी द्वारा सोसाइटी में चुनाव कराए गए थे। निर्धारित समयसीमा तक मात्र 6 वैध नामांकन प्राप्त हुए, जिन्हें निर्विरोध कार्यकारिणी सदस्य घोषित कर प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए।

लेकिन चुनाव परिणाम घोषित होते ही विवाद भड़क उठा। सतेंद्र सिंह समेत अन्य निवासियों ने चुनाव प्रक्रिया पर धांधली, अपारदर्शिता और सुनियोजित अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए। 45 शिकायतकर्ताओं ने दावा किया कि 72 फ्लैट मालिकों को आपराधिक षड्यंत्र के तहत चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखा गया।

इस्तीफों ने बढ़ाया नाटकीय मोड़

विवाद के बीच एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया, चुने गए 6 सदस्यों में से 4 ने क्रमशः इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बचे हुए अध्यक्ष और सचिव ने रिक्त पदों को भरने के लिए नए नामांकन आमंत्रित कर कार्यकारिणी का पुनर्गठन किया, जिससे विवाद और गहरा गया।

न्यायालय का सख्त रुख: आरोपों को किया खारिज

लंबी सुनवाई के बाद न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जिन 72 व्यक्तियों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखा गया, वे नियमों के अनुसार पात्र ही नहीं थे।

न्यायालय ने मॉडल बायलॉज के क्लॉज-4 का हवाला देते हुए कहा कि- 

केवल वही व्यक्ति सदस्य बनने का अधिकार रखता है जो फ्लैट का विधिवत पंजीकृत स्वामी हो

और जिसने निर्धारित 1000 रुपए सदस्यता शुल्क जमा किया हो

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में माना कि चुनाव प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी और उसे अवैध ठहराने के आरोप तथ्यहीन हैं।

कानून की जीत के रूप में देखा जा रहा फैसला

इस पूरे मामले में न्यायालय के आदेश को केवल एक सोसाइटी विवाद का समाधान नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट एक्ट 2010 और मॉडल बायलॉज 2011 की जीत के रूप में भी देखा जा रहा है।

न्यायालय ने अपने आदेश में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि-

“किसी भी अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) के गठन और चुनाव की वैधता का मुख्य आधार यही कानून और निर्धारित बायलॉज हैं, और इनका पालन अनिवार्य है।”

यह टिप्पणी भविष्य के सभी AOA चुनावों के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश मानी जा रही है।

AOA पक्ष के अधिवक्ता गजेंद्र सिंह आर्य ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा-

एडवोकेट, गजेंद्र सिंह आर्य

“यह निर्णय पूरी तरह से कानून और तथ्यों पर आधारित है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि AOA का गठन और चुनाव प्रक्रिया वैध थी। इससे भविष्य में सोसाइटी प्रबंधन को लेकर अनावश्यक विवादों पर रोक लगेगी और पारदर्शिता को मजबूती मिलेगी।”

2014 से 2025 तक ‘मनमानी व्यवस्था’ का खुलासा

एओए सचिव कई चौंकाने वाले पहलू भी सामने लायीं, उनके मुताबिक करीब एक दशक तक सोसाइटी में न तो यूपी अपार्टमेंट एक्ट का पालन हुआ और न ही मॉडल बायलॉज लागू किए गए।

रिकॉर्ड्स से खुलासा हुआ कि-

कई वर्षों तक पति-पत्नी बारी-बारी से AOA बोर्ड में काबिज रहे

जबकि कानून के अनुसार केवल फर्स्ट ओनर ही मतदान और पद के लिए पात्र होता है

ऐसे लोगों को भी बोर्ड में शामिल किया गया जिनका स्वामित्व से कोई संबंध नहीं था

यहां तक कि किरायेदारों के बोर्ड में शामिल होने के आरोप भी सामने आए

यह पूरा घटनाक्रम सोसाइटी प्रबंधन की पारदर्शिता और वैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

निवासियों को राहत, लेकिन बड़ा सवाल बरकरार

न्यायालय के फैसले के बाद सोसाइटी के निवासियों ने राहत की सांस ली है और इसे “न्याय की जीत” बताया जा रहा है।

लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है, 

क्या वर्तमान AOA बोर्ड उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करेगा, जिन्होंने वर्षों तक नियमों की अनदेखी कर सोसाइटी की व्यवस्था को प्रभावित किया ?

फिलहाल AOA पदाधिकारियों ने इस संवेदनशील मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है।

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