सुदामा की निष्काम भक्ति, ब्रजवासियों के प्रेम और परीक्षित मोक्ष प्रसंग के साथ भक्ति रस में संपन्न हुआ श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव
स्वामी वासुदेवाचार्य ‘विद्याभास्कर’ जी महाराज बोले,श्रीमद्भागवत कथा केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को मोक्ष की ओर ले जाने वाला दिव्य मार्ग है
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धर्म-कर्म डेस्क
गाजियाबाद। “देखि सुदामा की दीन दसा, करुणा करि करुणानिधि रोए। पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सो पग धोए॥” भक्त और भगवान के अटूट प्रेम, निष्काम भक्ति और करुणा के इस अमर प्रसंग के भावों से सराबोर वातावरण में रामानुज परिवार के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव का शनिवार को भव्य एवं भक्तिमय समापन हो गया। कथा के अंतिम दिवस कथा व्यास पूज्य स्वामी वासुदेवाचार्य ‘विद्याभास्कर’ जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का अत्यंत भावपूर्ण एवं ओजस्वी वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को प्रेम, समर्पण, सेवा और धर्म के शाश्वत संदेश से अभिभूत कर दिया।
16,108 विवाह: नारी सम्मान और धर्म संरक्षण का अद्वितीय उदाहरण
महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण के 16,108 विवाह के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि नरकासुर के बंधन से मुक्त हुई 16,108 राजकुमारियों को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने और उनके आत्मसम्मान की रक्षा के लिए भगवान ने उनसे विवाह किया। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि भगवान सदैव पीड़ितों के सम्मान और धर्म की स्थापना के लिए अवतरित होते हैं।
कुरुक्षेत्र में ब्रजवासियों और श्रीकृष्ण के मिलन ने भावुक किया श्रद्धालुओं को
कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण और ब्रजवासियों के पुनर्मिलन का मार्मिक प्रसंग सुनाते हुए महाराज श्री ने कहा कि सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, वह केवल समय की परीक्षा से और अधिक पवित्र होता जाता है। उन्होंने बताया कि माता यशोदा, नंद बाबा और ब्रज के गोप-गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम प्रेम आज भी भक्ति की सर्वोच्च मिसाल है। कथा के इस प्रसंग पर अनेक श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।

सुदामा चरित्र: जहां मित्रता में ईश्वर स्वयं हो गए भावविभोर
सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए महाराज श्री ने कहा कि भगवान को वैभव नहीं, बल्कि भक्त का निर्मल हृदय प्रिय होता है। सुदामा के प्रेम, विनम्रता और निष्काम समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने बिना मांगे ही उन्हें असीम सुख-समृद्धि प्रदान कर दी। उन्होंने कहा कि जिसके जीवन में विश्वास, विनम्रता और भक्ति है, उसके जीवन का कल्याण निश्चित है।
परीक्षित मोक्ष प्रसंग: कलियुग में भागवत श्रवण ही सबसे सरल साधना
कथा के समापन में राजा परीक्षित के मोक्ष का प्रसंग सुनाते हुए महाराज श्री ने कहा कि वर्तमान कलियुग में श्रीमद्भागवत कथा का श्रद्धा और विश्वास के साथ श्रवण करना ही ईश्वर की कृपा प्राप्त करने तथा आत्मकल्याण का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग है। उन्होंने कहा कि भागवत कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को सत्य, सदाचार और भक्ति की दिशा देने वाली दिव्य चेतना है।
मुख्य यजमानों ने किया पूजन-अर्चन, संतों का मिला दिव्य सान्निध्य
अंतिम दिवस के मुख्य यजमान सोनिया गर्ग एवं कपिल गर्ग रहे। उन्होंने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से भगवान की पूजा-अर्चना कर कथा का पुण्य लाभ प्राप्त किया।
इस अवसर पर पूज्य आचार्य श्री मधुसूदन जी महाराज एवं पूज्य श्री हरिनारायण जी महाराज की गरिमामयी उपस्थिति रही। कथा में सुभाष गुप्ता, राजेश गर्ग, नीरू गर्ग, धवल गुप्ता, गौरव बंसल, अभिलाष पांडे, अतिन अग्रवाल सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया।
कथा महोत्सव के संयोजक अतिन अग्रवाल ने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी श्रद्धालुओं, सेवाभावियों एवं कार्यकर्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भगवान की असीम कृपा और सभी भक्तों के समर्पित सहयोग से यह सात दिवसीय आयोजन अत्यंत सफल, अनुशासित एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा।
महाआरती, प्रसाद वितरण और जयघोषों के साथ हुआ भव्य समापन
समापन अवसर पर संत-महात्माओं के सान्निध्य में भव्य महाआरती संपन्न हुई। इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने प्रसाद एवं भोजन-प्रसादी ग्रहण कर धर्मलाभ प्राप्त किया। कथा के समापन पर पूरा पंडाल “राधे-राधे”, “जय श्रीकृष्ण” और “हरि बोल” के गगनभेदी जयघोषों से गुंजायमान हो उठा। भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास से ओत-प्रोत इस वातावरण ने सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव को अविस्मरणीय बना दिया।
