इलाहाबाद हाईकोर्ट की यूपी पुलिस को दो टूक: कानून से ऊपर कोई नहीं!
प्रतीकात्मक इमेज
गौतमबुद्ध नगर में अवैध हिरासत पर अदालत सख्त
बोली, पुलिस खुद को कानून से ऊपर समझती है!
एसीपी और जांच अधिकारी की सर्विस बुक में दर्ज होगी न्यायालय की नाराजगी
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
प्रयागराज। कानून के रखवाले ही अगर कानून की तय प्रक्रिया को ताक पर रख दें, तो आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी? गौतमबुद्ध नगर के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए साफ कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस खुद को कानून से ऊपर समझती है। अदालत ने हिरासत और गिरफ्तारी से जुड़े दस्तावेजों में ऐसी गड़बड़ियां पाईं, जिन्होंने पूरी कार्रवाई की वैधता पर सवाल खड़े कर दिए।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने 7 अक्टूबर 2026 को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दीपक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य, पर फैसला सुनाते हुए दीपक की हिरासत को अवैध घोषित कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि दीपक किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। मामले में अदालत की नाराजगी केवल पुलिस की कार्रवाई तक सीमित नहीं रही। उसने संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और पुलिस प्रशिक्षण में सुधार के लिए भी निर्देश दिए।
FIR से पहले हिरासत, बाद में गिरफ्तारी

मामला 23 अगस्त 2026 को गौतमबुद्ध नगर में दो गुटों के बीच हुई हिंसक झड़प से जुड़ा है। दीपक और चार अन्य लोगों को शाम 7:34 बजे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126, 135 और 170 के तहत हिरासत में लिया गया। इसके बाद रात 9:39 बजे लिखित शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई। दीपक को अगले दिन 24 अगस्त को दोपहर 2:57 बजे इसी एफआईआर में औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया गया।
अदालत ने कहा कि अपराध हो जाने की स्थिति में पुलिस के पास कानून के तहत गिरफ्तारी का विकल्प था, लेकिन उसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी था। मामले में हिरासत की शुरुआत से ही कानूनी प्रक्रिया की खामियां सामने आईं।
पांच जगह तारीखों की गड़बड़ी, दस्तावेजों पर गंभीर संदेह
मामले का सबसे गंभीर पहलू गिरफ्तारी और तलाशी से जुड़े दस्तावेजों में मिली विसंगतियां थीं। जांच अधिकारी अनुज कुमार के हस्ताक्षर वाले कागजात में एक ओर 23 अगस्त की तारीख दर्ज थी, जबकि गिरफ्तारी की तारीख 24 अगस्त लिखी गई थी। व्यक्तिगत तलाशी और जब्ती से जुड़े दस्तावेजों में भी 23 अगस्त की तारीख दर्ज थी।
जांच अधिकारी ने इन विसंगतियों को तारीख लिखने में हुई गलती बताया। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि यह महज गलती थी, तो उसे तत्काल सुधारकर प्रमाणित क्यों नहीं किया गया। आदेश के अनुसार, पांच स्थानों पर तारीखों की गड़बड़ी थी, लेकिन उन्हें ठीक नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया गंभीर आशंका जताई कि दस्तावेज बाद के चरण में तैयार किए गए हो सकते हैं। अदालत ने यह आशंका भी व्यक्त की कि दीपक के हस्ताक्षर पहले खाली कागज पर लिए गए हों और बाद में उसमें गिरफ्तारी के आधार भरे गए हों।
बंधपत्र में राशि खाली, नोटिस पर दूसरे अधिकारी के हस्ताक्षर
निवारक कार्रवाई से जुड़े दस्तावेजों की जांच में भी अदालत को गंभीर खामियां मिलीं। बंधपत्र में राशि का कॉलम खाली था। उस पर यह दर्ज करने के लिए जरूरी हस्ताक्षर, तारीख और समय भी नहीं थे कि संबंधित सहायक पुलिस आयुक्त ने बंधपत्र स्वीकार किया था या खारिज किया था।
वहीं, BNSS की धारा 130 के तहत जारी नोटिस सहायक पुलिस आयुक्त-प्रथम के नाम से था, लेकिन उस पर सहायक पुलिस आयुक्त-द्वितीय कमलेश कांत के हस्ताक्षर थे। अदालत ने कहा कि आवश्यक नोटिस संबंधित व्यक्ति के खिलाफ बाध्यकारी कार्रवाई से पहले दिया जाना चाहिए था, न कि हिरासत में लेने के बाद।
हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी के दस्तावेजों में वकील की सहायता लेने के अधिकार की जानकारी से जुड़े पहलू पर भी सवाल उठाए। गिरफ्तारी मेमो में इसकी जानकारी देने का उल्लेख था, लेकिन संबंधित जनरल डायरी प्रविष्टि में इस अधिकार के बारे में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिला। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 22(1) और BNSS की धारा 38 के तहत मिले संरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
तनावपूर्ण हालात का हवाला, लेकिन अदालत ने नहीं मानी दलील
राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि घटना के समय तनावपूर्ण माहौल था और बड़ी संख्या में लोग मौके पर जुटे थे। पुलिस ने सद्भावना में कार्रवाई कर स्थिति बिगड़ने से रोकने की कोशिश की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि तनावपूर्ण परिस्थितियां पुलिस को कानून के पालन से छूट नहीं देतीं। नागरिकों की स्वतंत्रता से जुड़े प्रावधान केवल औपचारिकताएं नहीं हैं, बल्कि संवैधानिक संरक्षण का हिस्सा हैं। पुलिस को गिरफ्तारी और हिरासत के प्रत्येक चरण में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा।
डीजीपी को निर्देश, दो अधिकारियों की सर्विस बुक में दर्ज होगी नाराजगी
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि पुलिसकर्मियों के लिए बेहतर प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार किए जाएं, ताकि उन्हें गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया और नागरिकों की स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके।
अदालत ने चेतावनी दी कि संदिग्धों को थाने बुलाकर लंबे समय तक हिरासत में रखने और बाद में छोड़ देने जैसी कार्रवाई को आगे से केवल प्रक्रिया की जानकारी न होने के आधार पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ऐसी कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण माना जाएगा, जब तक पुलिस इसके विपरीत निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश न करे।
अदालत ने एसीपी कमलेश कांत और जांच अधिकारी अनुज कुमार के मामले में उनके कामकाज पर अपनी नाराजगी दोनों अधिकारियों की सर्विस बुक में दर्ज करने का निर्देश भी दिया। आदेश की प्रति डीजीपी और संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजने को कहा गया।
हाईकोर्ट ने संबंधित मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी टिप्पणी की। अदालत के मुताबिक, पुलिस की ओर से पेश दस्तावेजों की पर्याप्त जांच नहीं की गई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कानून का अक्षरशः पालन हुआ है।
