गुलमोहर ग्रीन्स पर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: दो टावर ध्वस्त होंगे, दो अन्य टावरों की ऊपरी मंजिलें टूटेंगी! बिल्डर और अधिकारियों पर कार्रवाई के आदेश!!
बिल्डर की तीसरी कंपाउंडिंग निरस्त, 25 लाख रुपये का जुर्माना
GDA उपाध्यक्ष के खिलाफ एक महीने में जांच के आदेश, कॉमन एरिया बेचने पर FIR के निर्देश
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भूमेश शर्मा
प्रयागराज/गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश में हाईराइज सोसाइटियों के निर्माण, कंपाउंडिंग और फ्लैट खरीदारों के अधिकारों से जुड़े विवादों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के मोहन नगर स्थित गुलमोहर ग्रीन्स रेजिडेंशियल सोसाइटी मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने बिल्डर को राहत देने वाले तीसरे कंपाउंडिंग आदेश को निरस्त करते हुए चार टावरों की अतिरिक्त मंजिलें और दो टावर पूरी तरह ध्वस्त करने का आदेश दिया है। साथ ही, बिल्डर पर 25 लाख रुपये का वाद-व्यय लगाने, कॉमन एरिया की कथित अवैध बिक्री की जांच कराने तथा संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के भी निर्देश दिए हैं।

27 अक्टूबर 2026 को दिए गए इस फैसले में अदालत ने फ्लैटों का कंप्लीशन सर्टिफिकेट प्राप्त किए बिना कब्जा देने, निर्माण नियमों के उल्लंघन और गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। फैसले का संदेश स्पष्ट है कि कंपाउंडिंग की प्रक्रिया का इस्तेमाल बार-बार नियमों को दरकिनार करने या अवैध निर्माण को वैधता देने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
दो टावर पूरी तरह ध्वस्त होंगे, चार टावरों की नौवीं-दसवीं मंजिलें भी टूटेंगी
न्यायमूर्ति सराल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने गुलमोहर ग्रीन्स मामले से संबंधित दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए गाजियाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा 18 दिसंबर 2024 को स्वीकृत तीसरे कंपाउंडिंग आदेश को निरस्त कर दिया।
अदालत ने प्राधिकरण को निर्देश दिया कि टावर संख्या 16, 17, 18 और 19 की नौवीं एवं दसवीं मंजिलों को तथा टावर संख्या 27 और 28 को पूरी तरह दो महीने के भीतर ध्वस्त किया जाए। ध्वस्तीकरण पर होने वाला खर्च बिल्डर से भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूल किया जा सकेगा। अदालत ने जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को भी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के दौरान विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा एवं सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
यह आदेश ऐसे निर्माण के संबंध में है जिसे तीसरे कंपाउंडिंग आदेश के जरिए मंजूरी दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश को कानून की कसौटी पर कायम नहीं रखा जा सकता।

भारतीय वायुसेना की जमीन को एफएआर में शामिल करना भी अवैध
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू भारतीय वायुसेना के स्वामित्व वाली जमीन से जुड़ा है। अदालत के अनुसार, खसरा संख्या 1034, 1035, 1051, 1054, 1058, 1060, 1061 और 1063 की कुल 4,560 वर्गमीटर जमीन भारतीय वायुसेना की थी। इसके बावजूद इस क्षेत्रफल को तीसरे कंपाउंडिंग के दौरान फ्लोर एरिया रेशियो (एफएआर) की गणना में शामिल किया गया।
अदालत ने इसे गलत और अवैध माना। उसके अनुसार, जब बिल्डर का उक्त जमीन पर स्वामित्व ही नहीं था, तो उसके क्षेत्रफल को निर्माण के लिए उपलब्ध एफएआर की गणना में शामिल नहीं किया जा सकता था। तीसरे कंपाउंडिंग आदेश को निरस्त करने के पीछे यह भी एक महत्वपूर्ण आधार बना।
कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना फ्लैटों का कब्जा देना गंभीर उल्लंघन
अदालत ने पाया कि बिल्डर ने आवश्यक कंप्लीशन सर्टिफिकेट प्राप्त किए बिना फ्लैट खरीदारों को कब्जा दिया। इस संबंध में फैसले में उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (प्रमोशन ऑफ कंस्ट्रक्शन, ओनरशिप एंड मेंटेनेंस) अधिनियम, 2010 की धारा 4(5) और उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 15A के उल्लंघन का उल्लेख किया गया है।
रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि कंप्लीशन सर्टिफिकेट प्राप्त करने के लिए अग्निशमन विभाग सहित संबंधित विभागों की आवश्यक अनापत्तियां उपलब्ध नहीं थीं। इसके बावजूद फ्लैटों का हस्तांतरण और कब्जा दिया गया।
बिल्डर की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि कंप्लीशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया गया था और उसे अस्वीकार नहीं किया गया, इसलिए उसे स्वीकृत माना जाना चाहिए। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई कि परियोजना शुरू होने के वर्षों बाद भी कंप्लीशन सर्टिफिकेट का मामला लंबित रहा। इस दौरान बड़ी संख्या में परिवार अपने फ्लैटों में रह रहे थे। कई खरीदारों ने अपनी जीवनभर की बचत और कर्ज लेकर घर खरीदे थे। अदालत ने बिल्डर की इस कार्यप्रणाली को गंभीर माना और कहा कि नियमों का उल्लंघन कर अधिकतम आर्थिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति में लोगों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।
जीडीए की भूमिका पर गंभीर सवाल, उपाध्यक्ष के खिलाफ जांच के निर्देश

फैसले में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। अदालत के अनुसार, प्राधिकरण को कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं होने और नियमों के उल्लंघन की जानकारी थी। रिकॉर्ड में पूर्व में जारी नोटिसों और वर्ष 2018 में दर्ज मुकदमे का भी उल्लेख है, लेकिन अदालत ने पाया कि प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
इसके बावजूद प्राधिकरण के उपाध्यक्ष ने 18 दिसंबर 2024 को तीसरे कंपाउंडिंग आदेश को मंजूरी दी। अदालत ने इस निर्णय को अवैध ठहराते हुए राज्य सरकार को संबंधित उपाध्यक्ष के विरुद्ध विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया है। यह प्रक्रिया एक महीने के भीतर शुरू करने को कहा गया है।
अदालत की टिप्पणियां इस बात को रेखांकित करती हैं कि विकास प्राधिकरण का दायित्व केवल नक्शे और निर्माण संबंधी आवेदन निपटाना नहीं है, बल्कि कानून का पालन सुनिश्चित करना और फ्लैट खरीदारों की सुरक्षा से जुड़े उल्लंघनों पर कार्रवाई करना भी है।
कॉमन एरिया की बिक्री पर जांच, निर्माण हटाकर सोसाइटी को लौटाने का निर्देश
मामले में सोसाइटी के कॉमन एरिया की बिक्री का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया। अदालत के समक्ष ऐसे 85 व्यक्तियों का उल्लेख आया, जिन्होंने कथित तौर पर कॉमन एरिया खरीदे थे।
अदालत ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित कर संबंधित व्यक्तियों को नोटिस देने और उनका पक्ष सुनने के निर्देश दिए हैं। समिति को यह पता लगाना होगा कि कौन-कौन से कॉमन एरिया बेचे गए और वहां क्या निर्माण हुआ है।
निर्देशों के अनुसार, ऐसे क्षेत्र में पाए जाने वाले अवैध निर्माण को हटाने और कॉमन एरिया को छह महीने के भीतर सोसाइटी को वापस दिलाने की कार्रवाई की जानी है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि बिल्डर संबंधित खरीदारों को प्राप्त बिक्री मूल्य तथा निर्माण लागत वापस करे। निर्माण लागत समिति निर्धारित करेगी और भुगतान की गई राशि पर भुगतान की तारीख से 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
इस निर्देश का महत्व इसलिए भी है क्योंकि कॉमन एरिया केवल किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं, बल्कि सोसाइटी के निवासियों के साझा उपयोग और अधिकारों से जुड़ा होता है। हालांकि, संबंधित व्यक्तियों को नोटिस देकर उनका पक्ष सुनने की प्रक्रिया भी आदेश का हिस्सा है।
बिल्डर के खिलाफ एफआईआर, जांच अतिरिक्त पुलिस आयुक्त स्तर के अधिकारी से
अदालत ने बिल्डर के विरुद्ध धोखाधड़ी, गलत प्रस्तुतीकरण और उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट अधिनियम के उल्लंघन से जुड़े मामले में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश भी दिया है। इसके लिए दो सप्ताह की समयसीमा निर्धारित की गई है। जांच ऐसे अधिकारी से कराने को कहा गया है, जो अतिरिक्त पुलिस आयुक्त के पद से नीचे का न हो।
अदालत ने वर्ष 2018 के केस क्राइम नंबर 0749 से जुड़े मामले की जांच पर भी सवाल उठाए। न्यायालय ने संबंधित निरीक्षक सुरेंद्र सिंह को निलंबित करने और उनके विरुद्ध कर्तव्य में लापरवाही की जांच कराने का आदेश दिया है।
इसके अतिरिक्त, पुलिस आयुक्त, गाजियाबाद को उस अधिकारी की पहचान करने का निर्देश दिया गया है, जिसने उक्त मामले में अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी दी थी। राज्य सरकार को उस अधिकारी के विरुद्ध भी विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया गया है।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि एफआईआर दर्ज करने और जांच के आदेश का अर्थ किसी व्यक्ति को दोषी ठहरा देना नहीं है। संबंधित आरोपों की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद ही दोष तय होगा।
बिल्डर पर 25 लाख रुपये का वाद-व्यय, याचिकाकर्ताओं को भी राहत
अदालत ने बिल्डर को गुलमोहर ग्रीन्स रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के खाते में एक महीने के भीतर 25 लाख रुपये जमा कराने का निर्देश दिया है। इसके अतिरिक्त, रिट याचिका संख्या 21821/2025 के प्रत्येक याचिकाकर्ता को गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की ओर से दो महीने के भीतर 50,000 रुपये वाद-व्यय के रूप में दिए जाने का आदेश दिया गया है।
इस प्रकार अदालत ने निर्माण संबंधी अनियमितताओं पर कार्रवाई के साथ-साथ याचिकाकर्ताओं को आर्थिक राहत देने के भी निर्देश दिए हैं।
पहले और दूसरे कंपाउंडिंग पर अदालत का रुख अलग क्यों ?
इस फैसले की कानूनी बारीकी को समझना भी जरूरी है। अदालत ने परियोजना के पहले और दूसरे कंपाउंडिंग से संबंधित निर्माण में भी गंभीर अनियमितताओं और कानूनी सवालों पर चर्चा की। हालांकि, उन आदेशों के तहत बने फ्लैटों में तीसरे पक्ष के अधिकार पैदा हो चुके थे और याचिकाकर्ताओं ने उन आदेशों को स्पष्ट रूप से चुनौती नहीं दी थी। इसलिए अदालत ने उन फ्लैटों के संबंध में ध्वस्तीकरण का आदेश नहीं दिया।
इसके विपरीत, तीसरे कंपाउंडिंग के अंतर्गत प्रस्तावित निर्माण वाले फ्लैटों की बिक्री नहीं हुई थी और उनसे संबंधित तीसरे पक्ष के अधिकार पैदा नहीं हुए थे। इसी के साथ तीसरे कंपाउंडिंग आदेश की कानूनी खामियों को देखते हुए अदालत ने उसे निरस्त कर दिया और संबंधित निर्माण ध्वस्त करने का निर्देश दिया।
यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि फैसले को इस रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा कि अदालत ने सोसाइटी के सभी कंपाउंडिंग आदेशों को निरस्त कर दिया या सभी अतिरिक्त निर्माणों को ध्वस्त करने का आदेश दिया है।
व्यक्तिगत फ्लैट मालिकों की याचिका भी सुनवाई योग्य
अदालत ने व्यक्तिगत फ्लैट मालिकों की ओर से दायर याचिका की सुनवाई योग्यता पर भी विचार किया। फैसले में यह स्वीकार किया गया कि रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के अस्तित्व मात्र से किसी व्यक्तिगत फ्लैट मालिक का अदालत में अपने प्रभावित अधिकारों के लिए आने का रास्ता बंद नहीं हो जाता। यदि उसके व्यक्तिगत अधिकार प्रभावित होते हैं, तो वह उचित कानूनी उपाय अपना सकता है।
यह टिप्पणी उन आवासीय सोसाइटियों के निवासियों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां प्रबंधन समिति या एसोसिएशन के निर्णयों और व्यक्तिगत फ्लैट मालिकों के अधिकारों के बीच विवाद पैदा होते हैं।
हाईराइज सोसाइटियों के लिए बड़ा संदेश
गुलमोहर ग्रीन्स का यह फैसला केवल एक सोसाइटी तक सीमित नहीं है। यह उन सभी आवासीय परियोजनाओं और विकास प्राधिकरणों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है, जहां निर्माण स्वीकृत नक्शे से अलग किया जाता है, कंपाउंडिंग के जरिए बार-बार अतिरिक्त निर्माण को मंजूरी दिलाने की कोशिश होती है या आवश्यक प्रमाणपत्रों के बिना फ्लैटों का कब्जा दे दिया जाता है।
फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि कंपाउंडिंग की व्यवस्था का उपयोग नियमों को बार-बार तोड़ने और बड़े संरचनात्मक बदलावों को वैध ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता। निर्माण की वैधता, आवश्यक अनुमतियां, कॉमन एरिया और निवासियों की सुरक्षा को नजरअंदाज करके केवल आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देना गंभीर कानूनी परिणामों को जन्म दे सकता है।
अब इस ऐतिहासिक फैसले की असली परीक्षा उसके प्रभावी अनुपालन में होगी, क्या निर्धारित समयसीमा में ध्वस्तीकरण होता है, कॉमन एरिया वापस मिलते हैं, जांच आगे बढ़ती है और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है ? गुलमोहर ग्रीन्स के निवासियों के लिए अदालत के आदेश राहत की उम्मीद हैं, लेकिन उनका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब संबंधित प्राधिकरण और प्रशासन इन्हें समयबद्ध तरीके से लागू करेंगे।
