हम तुम रोड: सड़क वही, अब “हम” और “तुम” अलग-अलग खड़े हैं !
एक सड़क, सात सोसायटी और बंटती हुई आवाज़ें
NEWS1UP
विशेष संवाददाता
गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन की बहुचर्चित “हम तुम रोड” अब केवल सड़क का मुद्दा नहीं रह गई है। यह धीरे-धीरे उस सामाजिक और प्रशासनिक विडंबना का प्रतीक बनती जा रही है, जहाँ समस्या से लड़ते-लड़ते लोग खुद आपस में लड़ने लगते हैं।
करीब सात हाईराइज सोसायटियों की लाइफ लाइन मानी जाने वाली इस सड़क का सपना कभी 24 मीटर चौड़ी आधुनिक सड़क का था। बिल्डरों ने अपने ब्रॉशरों में इसे शानदार कनेक्टिविटी की पहचान बताया, मास्टर प्लान में भी यही चौड़ाई दर्ज हुई, और लोगों ने अपने जीवनभर की कमाई लगाकर यहाँ घर खरीद लिए।
लेकिन वक्त गुजरता गया और सड़क चौड़ी होने के बजाय सिकुड़ती चली गई। आज हालात ऐसे हैं कि सड़क मुश्किल से 6 मीटर चौड़ी बची है। जगह-जगह गड्ढे, ऊपर से सीवर के पानी का जमाव, मानो सड़क नहीं, प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक उपेक्षा का स्थायी प्रदर्शन हो।
जब सड़क पर पानी से ज़्यादा गुस्सा भर गया

ऊपर से कुछ सोसायटियों का सीवर का पानी सड़क पर ऐसे बहता है, मानो ड्रेनेज व्यवस्था नहीं बल्कि “जल संरक्षण योजना” चल रही हो। सड़क पर जमा पानी और गड्ढों का गठबंधन ऐसा है कि टू-व्हीलर चालक रोज़ घर से निकलते वक्त भगवान को याद करके निकलते हैं।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, वर्षों से सड़क की यही हालत बनी हुई है। दुर्घटनाएँ हुईं, लोग घायल हुए, कई जानें भी गईं, लेकिन समाधान हमेशा फाइलों और बैठकों के बीच कहीं घूमता रहा।
लगातार विरोध और हादसों के बाद आखिरकार गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) ने करीब 19 करोड़ 16 लाख रुपये की लागत से सड़क निर्माण का टेंडर जारी किया। योजना में 24 मीटर चौड़ी सड़क और ड्रेनेज व्यवस्था शामिल थी।
खबर फैलते ही लोगों को लगा कि-
वर्षों से चढ़ी “बीरबल की खिचड़ी” आखिरकार अब उतरने वाली है। लेकिन असली कहानी तो उसके बाद शुरू हुई।
यहीं से शुरू हुई असली “हम तुम” कहानी

23 मई को जब ठेकेदार निर्माण कार्य शुरू करने पहुँचा, तब स्थानीय लोगों को पता चला कि सड़क फिलहाल केवल 6 मीटर चौड़ी बनाई जाएगी और ड्रेनेज व्यवस्था का कोई स्पष्ट इंतज़ाम नहीं है। बस, यहीं से सड़क दो हिस्सों में नहीं, बल्कि लोग दो हिस्सों में बंट गए।
कुछ लोगों का कहना है कि-
“भाई, पहले कुछ तो बन जाने दो। सड़क की हालत ऐसी है कि अब तो गड्ढे भी शायद सड़क को अपना घर मान चुके हैं। कम से कम 6 मीटर ही सही, लोगों को राहत तो मिले।”
दूसरा पक्ष इसे “आधी राहत के नाम पर पूरा नुकसान” मान रहा है।
कुछ का तर्क है कि-
यदि आज 6 मीटर सड़क बन गई, तो भविष्य में 24 मीटर सड़क की लड़ाई हमेशा के लिए ठंडी पड़ जाएगी।
उनका सवाल सीधा है, जब टेंडर 24 मीटर का हुआ था, तो फिर निर्माण 6 मीटर का क्यों ?
अब सड़क कम, बहस ज़्यादा चल रही है
दिलचस्प बात यह है कि जो लोग कल तक एकजुट होकर प्रशासन से सवाल पूछ रहे थे, आज वही लोग सोशल मीडिया ग्रुपों, मीटिंगों और बहसों में एक-दूसरे को समझाने में लगे हैं। कहीं “व्यावहारिक सोच” का तर्क दिया जा रहा है, तो कहीं “अधिकारों से समझौता” न करने की बात हो रही है।
स्थिति ऐसी बन गई है कि अब सड़क पर गाड़ियों से ज़्यादा तर्क टकरा रहे हैं।
उधर प्रशासन के लिए यह स्थिति किसी वरदान से कम नहीं मानी जा रही। क्योंकि हमारे सिस्टम में अक्सर समस्याएँ उतनी मुश्किल नहीं होतीं, जितना आसान लोगों का बंट जाना होता है। जनता जब एक आवाज़ में सवाल पूछती है तो जवाब देना पड़ता है, लेकिन जब जनता खुद दो हिस्सों में बँट जाए तो फाइलें भी आराम से लंबी नींद सोने लगती हैं।
24 मीटर का सपना आखिर गया कहाँ ?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है, जब टेंडर 24 मीटर सड़क का था, तो फिर मौके पर 6 मीटर निर्माण की बात क्यों सामने आई ? ड्रेनेज योजना कहाँ गायब हो गई ? और सबसे बड़ा सवाल यह कि जब बड़े-बड़े हाईवे और एक्सप्रेस-वे ज़मीन अधिग्रहण के मामले सुलझाकर तेजी से बन सकते हैं, तब मात्र तीन किलोमीटर लंबी सड़क वर्षों से अधूरी क्यों है ? आखिर वह कौन-सी प्रशासनिक भूलभुलैया है, जिसमें तीन किलोमीटर सड़क वर्षों से रास्ता तलाश रही है ?
स्थानीय लोगों का कहना है कि-
“हम तुम रोड” अब गाजियाबाद का नया मुहावरा बन चुकी है।
ऐसी सड़क, जो हर साल बनने के करीब पहुँचती है, फिर किसी नए विवाद, नई प्रक्रिया या नई खींचतान में फँस जाती है।
सड़क अभी भी इंतज़ार में है
फिलहाल हालात यह हैं कि सड़क वहीं की वहीं है। गड्ढे अब भी मौजूद हैं, पानी अब भी जमा है, और लोग अब भी समाधान का इंतज़ार कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले लड़ाई सड़क बनवाने की थी, अब लड़ाई इस बात पर भी है कि सड़क कैसी बने।
