इतिहास यूँ ही नहीं बनता! यूपी पुलिस की सब-इंस्पेक्टर अस्मिता डे ने लिखी भारत की नई प्रेरक गाथा!!
ग्लासगो में भारत का तिरंगा सबसे ऊंचा लहराया तो उसके पीछे सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि वर्षों का संघर्ष, अभाव, अनुशासन और अटूट विश्वास खड़ा था। त्रिपुरा की साधारण बेटी और गाजियाबाद में यूपी पुलिस की सब-इंस्पेक्टर अस्मिता डे ने जूडो में भारत को पहला कॉमनवेल्थ स्वर्ण दिलाकर इतिहास रच दिया। अब उनकी निगाहें ओलंपिक पोडियम पर हैं।
NEWS1UP EXCLUSIVE
भूमेश शर्मा
ग्लासगो के जूडो एरिना में सांसें थम-सी गई थीं। महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग का फाइनल अपने निर्णायक क्षण में था। सामने कनाडा की मजबूत खिलाड़ी हेइडी क्वाच थीं और दूसरी ओर भारत की युवा जूडोका अस्मिता डे। मुकाबला बराबरी का था। हर दांव के साथ तनाव बढ़ रहा था। फिर मुकाबला ‘गोल्डन स्कोर’ तक पहुंचा। एक पल… एक दांव… और अगले ही क्षण रेफरी ने भारत की ओर इशारा कर दिया। पूरा स्टेडियम तालियों से गूंज उठा।
भारतीय तिरंगा सबसे ऊंचा लहराने लगा। इतिहास बन चुका था। अस्मिता डे जूडो में कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन चुकी थीं। लेकिन उस स्वर्ण पदक की चमक के पीछे वर्षों की तपस्या छिपी थी।

उस पिता की जीत, जिसने कभी सपनों को गरीबी के आगे झुकने नहीं दिया
हजारों किलोमीटर दूर त्रिपुरा के बेलोनिया कस्बे में एक छोटी-सी साइकिल रिपेयर की दुकान है। यहीं से शुरू हुई उस कहानी की पहली पंक्ति, जिसे आज पूरा देश पढ़ रहा है। अस्मिता के पिता अर्जुन कुमार डे रोज साइकिलों के पंचर बनाते, टूटे पहिए जोड़ते और उसी मेहनत से परिवार का जीवन चलाते रहे। घर में साधन कम थे, लेकिन बेटी के सपनों पर कभी ताला नहीं लगाया गया। यही वह पूंजी थी, जिसने अस्मिता को दुनिया का सबसे बड़ा आत्मविश्वास दिया।
जब मंजिल ने खुद रास्ता बदल दिया
22 मार्च 2003 को जन्मी अस्मिता ने कभी जूडो खिलाड़ी बनने की योजना नहीं बनाई थी। उनका पहला प्यार दौड़ था। वह 800 मीटर की धावक थीं और जिला स्तर तक पहुंच चुकी थीं। लेकिन जिंदगी ने उनके लिए कुछ और ही लिख रखा था। एक कोच ने उन्हें जूडो मैट पर आने की सलाह दी। शायद उस दिन किसी को अंदाजा नहीं था कि यही फैसला आगे चलकर भारतीय खेल इतिहास का नया अध्याय बन जाएगा। कभी शौक के तौर पर शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे उनका जीवन बन गया।
प्रतिभा को मिले सही गुरु, तो सपने उड़ान भरते हैं
बेलोनिया विद्यापीठ कोचिंग सेंटर में कोच बीना देबनाथ ने अस्मिता की प्रतिभा को पहचाना। इसके बाद त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल में माणिक लाल देब ने उनके खेल को निखारा। उनकी मेहनत रंग लाई। खेलो इंडिया प्रतियोगिताओं में लगातार शानदार प्रदर्शन के बाद वर्ष 2018 में उन्हें भोपाल स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के रीजनल सेंटर में प्रशिक्षण का अवसर मिला।
वहीं कोच यशपाल सोलंकी के मार्गदर्शन में उनका खेल राष्ट्रीय सीमाओं से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा। टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) के डेवलपमेंट ग्रुप में शामिल होना इस बात का प्रमाण था कि भारतीय खेल तंत्र को अपनी नई स्टार मिल चुकी है।
हर पदक ने कहा, अभी सफर बाकी है
अस्मिता ने सफलता की सीढ़ियां एक-एक करके चढ़ीं। 2022 में थाईलैंड में आयोजित एशियन कैडेट एवं जूनियर प्रतियोगिता में अंतरराष्ट्रीय पदक जीतकर वह त्रिपुरा की पहली महिला जूडो खिलाड़ी बनीं जिसने यह उपलब्धि हासिल की।
इसके बाद मकाऊ जूनियर एशिया कप में स्वर्ण, कुवैत एशियन ओपन में रजत, मोरक्को अफ्रीकन ओपन में स्वर्ण और एशियन सीनियर चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया कि वह केवल भारत ही नहीं, एशिया और दुनिया की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को चुनौती देने का दम रखती हैं।
उनकी हर जीत एक संदेश दे रही थी-
“भारत की यह बेटी अभी और ऊंची उड़ान भरने वाली है।”
ग्लासगो की रात… जिसने भारत को नई पहचान दी
क्वार्टर फाइनल में स्कॉटलैंड की ईवा इविंग को इप्पोन से हराना, सेमीफाइनल में समर शॉ को मात देना और फिर फाइनल में कनाडा की हेइडी क्वाच का सामना… हर मुकाबले के साथ दबाव बढ़ता गया। फाइनल में एक समय ऐसा भी आया जब लग रहा था कि स्वर्ण हाथ से फिसल सकता है।
लेकिन बड़े खिलाड़ी वही होते हैं जो दबाव में टूटते नहीं, बल्कि और मजबूत होकर लौटते हैं। अस्मिता ने धैर्य बनाए रखा। मुकाबला गोल्डन स्कोर तक पहुंचा और फिर एक शानदार तकनीकी दांव के साथ उन्होंने इतिहास अपने नाम कर लिया। वह सिर्फ मुकाबला नहीं जीत रही थीं… वह भारतीय जूडो का भविष्य लिख रही थीं।
स्वर्ण जीतकर सबसे पहले किसे याद किया ?

इतिहास रचने के बाद भी अस्मिता की विनम्रता नहीं बदली। उन्होंने सबसे पहले उत्तर प्रदेश पुलिस और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा-
“मैं यूपी पुलिस में हूं। मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का धन्यवाद करना चाहती हूं क्योंकि उन्होंने मुझे यूपी पुलिस में नौकरी दी। इस नौकरी से मुझे सहारा मिला। इसी की बदौलत मैं यहां तक पहुंची और गोल्ड मेडल जीत सकी।”
यह बयान केवल धन्यवाद नहीं था। यह इस बात का प्रमाण था कि यदि प्रतिभा को सही अवसर और आर्थिक स्थिरता मिले, तो वह विश्व मंच पर देश का गौरव बन सकती है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी उन्हें बधाई देते हुए कहा कि उनकी उपलब्धि देश की बेटियों के साहस, अनुशासन और संकल्प का प्रतीक है।
अब मंजिल कॉमनवेल्थ नहीं… ओलंपिक है
23 वर्ष की उम्र में कॉमनवेल्थ स्वर्ण जीतना किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि है। लेकिन अस्मिता डे की आंखों में अभी भी एक सपना बाकी है।
वह सपना है-
ओलंपिक पोडियम पर तिरंगे को सबसे ऊपर देखने का।
यदि उनका समर्पण और मेहनत इसी तरह जारी रही तो यह सपना भी हकीकत बन सकता है।
