गुलमोहर ग्रीन्स मामला: विवेचक इंस्पेक्टर निलंबित, अंतिम रिपोर्ट मंजूर करने वाले वरिष्ठ अधिकारी की भी होगी जांच
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मौके का निरीक्षण किए बिना और बिल्डर से पूछताछ के बगैर दाखिल कर दी अंतिम रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने नए सिरे से जांच के भी दिए निर्देश
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
प्रयागराज/गाजियाबाद। गुलमोहर ग्रीन्स सोसाइटी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस विवेचना पर गंभीर सवाल उठाते हुए विवेचक इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह को निलंबित करने और उनके खिलाफ विभागीय जांच कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी देने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल उठाए। पुलिस अधीक्षक के हलफनामे में संबंधित अधिकारी का नाम स्पष्ट नहीं होने पर हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त को उसकी पहचान करने और राज्य सरकार को उसके विरुद्ध विभागीय जांच शुरू कराने का निर्देश दिया।
आदेश के अनुच्छेद 245 में अदालत ने उल्लेख किया है कि अभिजीत आर. शंकर (IPS), जो वर्तमान में देवरिया जिले में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं, ने अपने हलफनामे में बताया कि वह 4 जनवरी 2022 से 29 जुलाई 2022 तक गाजियाबाद में क्षेत्राधिकारी के पद पर तैनात थे। विवेचक ने 21 जून 2022 को अंतिम रिपोर्ट उनके समक्ष मंजूरी के लिए प्रस्तुत की थी। हालांकि, शंकर ने अपने हलफनामे में स्पष्ट नहीं किया कि अंतिम रिपोर्ट को वास्तव में उन्होंने ही आगे भेजा था या नहीं। इस पर हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारी की पहचान करने और उसके विरुद्ध विभागीय जांच कराने का निर्देश दिया।

गंभीर आरोप, लेकिन मौके का निरीक्षण तक नहीं
मामले में जीडीए के प्रवर्तन जोन-7 के अवर अभियंता ने 10 अप्रैल 2018 को बिल्डर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए पत्र भेजा था। इसके बाद 11 अप्रैल को थाना साहिबाबाद में मुकदमा अपराध संख्या 0749/2018 दर्ज हुआ। इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत आरोप शामिल थे।
एफआईआर में आरोप था कि बिल्डर ने कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना फ्लैटों का कब्जा दिया और स्वीकृत नक्शे के अनुसार हरित क्षेत्र के लिए छोड़े जाने वाले कॉमन एरिया को बेच दिया।
हाईकोर्ट ने पाया कि विवेचक ने कथित बिक्री की पुष्टि के लिए मौके का निरीक्षण नहीं किया और न ही बिल्डर के कार्यालय जाकर पूछताछ की या उसका बयान दर्ज करने का प्रयास किया। अदालत के अनुसार, जांच अधिकारी ने केवल सोसाइटी के जनरल मैनेजर संजीव शर्मा का बयान दर्ज किया, जिनका कथित अपराध से कोई संबंध नहीं था।
आरोपी पक्ष की दलील के बाद दाखिल कर दी अंतिम रिपोर्ट
फैसले के मुताबिक, 15 मई 2022 को संजीव शर्मा आरोपी की ओर से उपस्थित हुए और बताया कि जीडीए ने लगभग 9.66 करोड़ रुपये की कंपाउंडिंग फीस निर्धारित की है तथा उनके अनुसार मामले में धोखाधड़ी या जालसाजी नहीं बनती। इसके बाद विवेचक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मामले में आपराधिकता नहीं है।
13 जून 2022 को शिकायतकर्ता के पूरक बयान में जमीन की बिक्री, स्वीकृत नक्शे और जीडीए को हुए कथित राजस्व नुकसान से संबंधित बातें दर्ज हुईं। इसके बावजूद विवेचक ने 21 जून 2022 को अंतिम रिपोर्ट मंजूरी के लिए तत्कालीन क्षेत्राधिकारी को भेज दी। यह रिपोर्ट 24 अगस्त 2022 को सक्षम न्यायालय में दाखिल की गई।
हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि गंभीर आरोपों के बावजूद आवश्यक जांच किए बिना अंतिम रिपोर्ट कैसे दाखिल कर दी गई और उसे मंजूरी देने वाले अधिकारी की पहचान स्पष्ट क्यों नहीं हुई।
इंस्पेक्टर के साथ वरिष्ठ अधिकारी की जवाबदेही भी तय होगी
हाईकोर्ट ने विवेचक सुरेंद्र सिंह की जांच को उचित और निष्पक्ष नहीं पाया। अदालत ने उन्हें निलंबित करने तथा सक्षम प्राधिकारी को कर्तव्य में लापरवाही के संबंध में जांच कराने का निर्देश दिया।
फैसले के अनुच्छेद 271 में अदालत ने अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी देने वाले अधिकारी का नाम स्पष्ट न किए जाने पर आश्चर्य जताया। पुलिस कमिश्नर को उस अधिकारी की पहचान करने और राज्य सरकार को उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू कराने का निर्देश दिया गया।
वहीं, फैसले के अनुच्छेद 244 के तहत पुलिस आयुक्त को एफआईआर में लगाए गए आरोपों की नए सिरे से जांच एसीपी स्तर या उससे ऊपर के अधिकारी से कराने का निर्देश दिया गया।
अब जांच और जवाबदेही पर निगाह
हाईकोर्ट के निर्देशों ने मामले में विवेचक की भूमिका के साथ-साथ अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी देने वाले वरिष्ठ अधिकारी की जवाबदेही को भी केंद्र में ला दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अधिकारी की पहचान कर विभागीय जांच कैसे आगे बढ़ती है और नई विवेचना में कॉमन एरिया की कथित बिक्री तथा कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना कब्जा देने के आरोपों पर क्या तथ्य सामने आते हैं।
