पुलिस को लगता है कि उनके गलत कामों पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
अवैध हिरासत मामले में 25 हजार रुपये मुआवजे का आदेश
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
प्रयागराज। नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और कड़ा संदेश देते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि पुलिस अधिकारी अक्सर नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन इस सोच के साथ करते हैं कि उनके गलत कार्यों पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा और अधिकांश पीड़ित न्याय के लिए अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाएंगे।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी प्रयागराज के एक व्यक्ति को कथित रूप से गैर-कानूनी तरीके से 24 घंटे तक पुलिस लॉकअप में रखने के मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने प्रथम दृष्टया अधिकारों के उल्लंघन को गंभीर मानते हुए पीड़ित को 25,000 रुपये का अंतरिम मुआवजा देने का आदेश भी दिया है।

अधिकार लागू कराना अदालत की जिम्मेदारी
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने अपने 16 पृष्ठों के आदेश में कहा कि जब कोई नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा और उन्हें लागू कराने के लिए न्यायालय के समक्ष आता है, तो अदालत का कर्तव्य है कि वह संविधान, कानून और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप उन अधिकारों को प्रभावी बनाए।
खंडपीठ ने कहा कि व्यवस्था में ऐसे अधिकारी मौजूद हैं जो यह मानकर चलते हैं कि उनके द्वारा किए गए अधिकार-उल्लंघन के अधिकांश मामलों पर कभी कोई सवाल नहीं उठेगा। हजारों मामलों में शायद ही कोई नागरिक न्याय पाने और जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने के लिए आगे आता है। ऐसे में जब कोई पीड़ित न्यायालय तक पहुंचता है, तो अदालत की संवैधानिक जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।
घरेलू विवाद की शिकायत पर उठा ले गई थी पुलिस
मामले के अनुसार, प्रयागराज निवासी मतंबर मिश्रा 26 नवंबर 2022 को अपने खेतों से घर लौटे थे। आरोप है कि उसी दौरान एक पुलिस चौकी के तत्कालीन प्रभारी उपनिरीक्षक सूर्य प्रकाश दुबे उनके घर पहुंचे और उन्हें बिना किसी स्पष्ट कारण के घर से बाहर घसीटते हुए पुलिस स्टेशन ले गए।
याचिका के अनुसार, उस समय मिश्रा केवल लुंगी और कुर्ता पहने हुए थे। उन्हें न तो गिरफ्तारी का कोई वैध आधार बताया गया और न ही कोई विधिक प्रक्रिया अपनाई गई। इसके बाद उन्हें लगभग 24 घंटे तक पुलिस लॉकअप में बंद रखा गया।
रिश्वत मांगने का भी आरोप
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि हिरासत के दौरान उन्हें छोड़ने के बदले 20,000 रुपये की रिश्वत मांगी गई। आरोप यह भी है कि पूरी कार्रवाई एक पारिवारिक विवाद से जुड़ी शिकायत के आधार पर की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता के भाई की बहू ने घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराई थी।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि शिकायत के आधार पर कोई संज्ञेय अपराध दर्ज नहीं किया गया था, फिर भी पुलिस ने व्यक्ति को हिरासत में लेकर लॉकअप में बंद रखा। यही तथ्य अदालत की गंभीर चिंता का कारण बना।
नागरिक स्वतंत्रता पर हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश
इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी केवल एक व्यक्ति के साथ हुए कथित अन्याय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत गरिमा और पुलिस जवाबदेही से जुड़े व्यापक प्रश्नों को भी सामने लाती है।
अदालत ने संकेत दिया कि कानून का शासन तभी प्रभावी माना जाएगा जब राज्य की एजेंसियां स्वयं कानून के दायरे में कार्य करें और नागरिकों की स्वतंत्रता का सम्मान करें। किसी भी व्यक्ति को विधिक प्रक्रिया के बिना हिरासत में रखना संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।
पुलिस जवाबदेही पर महत्वपूर्ण फैसला
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह आदेश पुलिस कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा और मानवाधिकारों की सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत द्वारा अंतरिम मुआवजा दिए जाने का निर्णय इस बात का संकेत है कि यदि किसी नागरिक के अधिकारों का हनन होता है, तो राज्य और उसके अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
