जज को फोन, हाईकोर्ट सख्त: क्या प्रशासनिक दबाव अदालत तक पहुंच गया ?
गोंडा के 29 साल पुराने भूमि विवाद में मंडलायुक्त पर न्यायिक अधिकारी को कथित तौर पर प्रभावित करने का आरोप
हाईकोर्ट ने मामले को आपराधिक अवमानना के योग्य माना
NEWS1UP EXCLUSIVE
लखनऊ/गोंडा। अदालत में लंबित मुकदमे का फैसला कानून और साक्ष्यों से होना चाहिए, लेकिन गोंडा के करीब तीन दशक पुराने भूमि विवाद ने इससे भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या प्रशासनिक पद की ताकत न्यायिक अधिकारी तक पहुंच सकती है ? जिस मुकदमे की सुनवाई एक सिविल जज कर रही थीं, उसमें मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल द्वारा कथित तौर पर फोन किए जाने और दबाव बनाने के आरोप सामने आए। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ पहुंचा तो अदालत ने इसे सामान्य प्रशासनिक संवाद मानने के बजाय न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर प्रश्न माना।

एक फोन कॉल से बड़ा हुआ मामला
हाईकोर्ट के सामने सबसे अहम सवाल यह नहीं रहा कि फोन पर क्या बात हुई, बल्कि यह बना कि लंबित मुकदमे की सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी से प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी को सीधे संपर्क की जरूरत क्यों पड़ी ?
न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की पीठ ने प्रथमदृष्टया माना कि बातचीत का कथित तरीका न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने के प्रयास की ओर इशारा करता है। अदालत ने मामले को आपराधिक अवमानना के तहत विचार किए जाने योग्य माना और आगे की आवश्यक प्रक्रिया के लिए निर्देश दिए।
NEWS1UP का सवाल: अदालत और प्रशासन के बीच यह दूरी क्यों जरूरी है ?
प्रशासन के पास शासन और कार्यपालिका की शक्ति है, जबकि अदालत का अधिकार कानून के आधार पर स्वतंत्र निर्णय देने में है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में दोनों के बीच यही संस्थागत दूरी न्याय की निष्पक्षता की गारंटी है।
लेकिन अगर किसी लंबित मुकदमे में प्रशासनिक पद पर बैठा अधिकारी सीधे पीठासीन न्यायिक अधिकारी तक पहुंचता है, तो सवाल सिर्फ एक फोन कॉल का नहीं रह जाता। सवाल यह बन जाता है कि अदालत की चौखट पर पद की ताकत की कोई जगह है या नहीं।
गोंडा का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद 1997 से चला आ रहा है। यानी करीब 29 साल से पक्षकार न्यायिक प्रक्रिया के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में मुकदमे की निष्पक्ष सुनवाई से जुड़ा कोई भी सवाल पूरे न्यायिक तंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।
जमीन का विवाद अदालत में है, लेकिन अब सवाल न्याय की स्वतंत्रता का है।
