गाजियाबाद की मिट्टी से उठी उड़ान, सात समंदर पार गूंजा ‘सबा’ का नाम!!
होली चाइल्ड स्कूल से इलिनॉय विधानसभा तक का सफर
बचपन से सार्वजनिक मुद्दों में थी दिलचस्पी, अमेरिका जाकर समाजसेवा को बनाया राजनीतिक पहचान का आधार
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। स्कूल-कॉलेज के दिनों में वाद-विवाद और भाषण प्रतियोगिताओं में सक्रिय रहने वाली गाजियाबाद की एक बेटी ने सात समंदर पार अमेरिकी राजनीति में इतिहास रच दिया है। यह कहानी है सबा हैदर की, जिन्होंने इलिनॉय राज्य की 84वीं विधानसभा सीट जीतकर राज्य की जनरल असेंबली में पहुंचने वाली पहली दक्षिण एशियाई महिला होने का गौरव हासिल किया है। उनकी इस उपलब्धि की खास बात यह है कि उनके व्यक्तित्व में नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन के प्रति रुचि के बीज गाजियाबाद में ही पड़े थे।
मां ने बचपन में ही पहचान लिया था नेतृत्व का गुण
सबा की मां चांदनी के मुताबिक, बेटी को बचपन से ही सामाजिक और सार्वजनिक विषयों में दिलचस्पी थी। स्कूल-कॉलेज की वाद-विवाद और भाषण प्रतियोगिताओं में वह बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। अपनी बात को तर्क के साथ रखना और सार्वजनिक मुद्दों पर संवाद करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। यही रुचि आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की बुनियाद बनी।

सबा के परिवार की जड़ें बुलंदशहर जिले के औरंगाबाद कस्बे से जुड़ी हैं। पिता सैयद अली हैदर के काम के सिलसिले में परिवार गाजियाबाद आकर बस गया। सबा ने होली चाइल्ड स्कूल से स्कूली शिक्षा हासिल की और राम चमेली चड्ढा विश्वास गर्ल्स कॉलेज से बीएससी में अपनी कक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से वन्यजीव विज्ञान में एमएससी की और गोल्ड मेडल हासिल किया।
शादी के बाद अमेरिका पहुंचीं, समुदाय से जुड़कर बनाई पहचान
वर्ष 2006 में अली काजमी से विवाह के बाद 2007 में सबा अमेरिका चली गईं। उनके पति कंप्यूटर साइंस इंजीनियर हैं और परिवार का संबंध भी बुलंदशहर से है। नए देश में उन्होंने अपनी पहचान नए सिरे से बनाई। प्रमाणित योग प्रशिक्षक बनीं और विद्यार्थियों से लेकर कॉरपोरेट पेशेवरों तक को योग सिखाया। शिकागो स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के योग कार्यक्रमों में भी भागीदारी की। लेकिन उनका दायरा योग प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने स्थानीय समुदाय से जुड़कर सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई।
सबा के शब्दों में,
जब से मैं यहां आई हूं, मैंने अपनी जिंदगी उस कम्युनिटी को वापस देने में लगाई है जिसने मुझे और मेरे परिवार को इलिनॉय को अपना घर बनाने में मदद की। यही सामुदायिक जुड़ाव आगे चलकर उनकी राजनीतिक ताकत बना।
पहली हार के बाद दोबारा मैदान में उतरीं
सबा ने वर्ष 2022 में पहली बार ड्यूपेज काउंटी बोर्ड का चुनाव लड़ा, लेकिन करीब एक हजार वोटों से हार गईं। इसके बावजूद उन्होंने लोगों के बीच सक्रियता बनाए रखी। वर्ष 2024 में दोबारा चुनाव लड़ा और रिपब्लिकन उम्मीदवार पैटी गस्टिन को करीब 8,521 वोटों से हराकर काउंटी बोर्ड की सदस्य चुनी गईं।

इस दौरान उन्होंने पर्यावरण और रणनीतिक योजना समितियों की अध्यक्षता की। पब्लिक हेल्थ बोर्ड और इंडियन प्रेयरी एजुकेशनल फाउंडेशन से भी जुड़ी रहीं। स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर काम करने का यह अनुभव उनके राजनीतिक सफर का अहम पड़ाव बना।
15 महीने की जनसंपर्क मुहिम ने दिलाई ऐतिहासिक जीत
इलिनॉय विधानसभा चुनाव में सबा ने करीब 15 महीने तक अपने चुनाव क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों में जाकर मतदाताओं से संवाद किया। किफायती स्वास्थ्य सेवाएं, बेहतर शिक्षा और बढ़ती जीवनयापन लागत उनके प्रमुख चुनावी मुद्दे रहे।
3 नवंबर को हुए अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार सबा ने रिपब्लिकन प्रत्याशी ब्रायन स्कोपा को पराजित किया। रिपोर्टेड चुनावी आंकड़ों के मुताबिक उन्हें 20,756 वोट (70.9 प्रतिशत) मिले, जबकि स्कोपा को 8,520 वोट (29.1 प्रतिशत) प्राप्त हुए। इस जीत के साथ उन्होंने इलिनॉय की राजनीति में नया इतिहास दर्ज किया।
गाजियाबाद की शिक्षा, अमेरिका में नेतृत्व की पहचान
सबा हैदर की उपलब्धि को महज एक चुनावी जीत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह गाजियाबाद में पली-बढ़ी उस छात्रा की कहानी है, जिसने शिक्षा से अपनी बुनियाद मजबूत की, विदेश में समुदाय के बीच जगह बनाई और सामाजिक सक्रियता को राजनीतिक नेतृत्व में बदला।
उनका सफर बताता है कि नेतृत्व की क्षमता किसी राजनीतिक विरासत या पद की मोहताज नहीं होती। इसकी शुरुआत समाज को समझने, अपनी बात रखने और लोगों के बीच काम करने से होती है। गाजियाबाद में विकसित हुए यही गुण अमेरिका में उनकी पहचान का आधार बने।
आज सबा की सफलता उन युवाओं और खासकर बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो अपनी प्रतिभा को किसी भौगोलिक सीमा में बांधकर नहीं देखना चाहते। गाजियाबाद से शुरू हुआ यह सफर अमेरिका की विधानसभा तक पहुंचा है। सबा हैदर की जीत इस बात की मिसाल है कि शिक्षा, संकल्प और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव मिलकर किसी साधारण शुरुआत को असाधारण उपलब्धि में बदल सकते हैं।
