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‘नारायण’ नाम के स्मरण मात्र से होता है जीव का उद्धार : स्वामी वासुदेवाचार्य “विद्याभास्कर” जी महाराज

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श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस जड़ भरत के आत्मज्ञान, अजामिल के उद्धार एवं भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति का हुआ दिव्य एवं प्रेरणादायक वर्णन

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धर्म-कर्म डेस्क

गाजियाबाद। रामानुज परिवार के तत्वावधान में हिन्दी भवन में मंगलवार को आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के तृतीय दिवस पर श्रद्धालुओं ने भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओत-प्रोत दिव्य कथा का रसपान किया। कथा का वाचन अयोध्या के श्रीमद् जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी वासुदेवाचार्य “विद्याभास्कर” जी महाराज के श्रीमुख से हुआ।

कथा के तृतीय दिवस पूज्य महाराज श्री ने महात्मा जड़ भरत एवं राजा रहूगण संवाद, अजामिल उद्धार तथा भक्त प्रह्लाद चरित्र का अत्यंत मार्मिक एवं प्रेरणादायक वर्णन किया। महाराज श्री ने बताया कि जड़ भरत जी ने राजा रहूगण को आत्मज्ञान, वैराग्य एवं भक्ति का उपदेश देकर जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध कराया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को देहाभिमान, अहंकार और मोह का त्याग कर भगवान की शरण में जाना चाहिए, तभी जीवन सार्थक होता है।

अजामिल प्रसंग का वर्णन करते हुए महाराज श्री ने कहा कि भगवान के “नारायण” नाम में ऐसी दिव्य शक्ति है कि अंतिम समय में भी श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया नाम-स्मरण जीव के उद्धार का कारण बन सकता है। उन्होंने कहा कि कलियुग में भगवान के नाम का जप, सत्संग और श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण ही मानव जीवन को मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाता है।

भक्त प्रह्लाद के चरित्र का वर्णन करते हुए पूज्य महाराज श्री ने कहा कि भगवान की प्राप्ति के लिए अटूट श्रद्धा, दृढ़ विश्वास और निष्काम भक्ति आवश्यक है। प्रह्लाद जी ने अपने जीवन में अनेक कष्ट, अत्याचार और कठिन परीक्षाएँ सहन कीं, लेकिन भगवान श्रीहरि के प्रति उनकी आस्था कभी डगमगाई नहीं। अंततः भगवान श्री नृसिंह ने प्रकट होकर अपने परम भक्त की रक्षा की और अधर्म का विनाश किया। उन्होंने कहा कि सच्चे भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
आज की कथा में पूज्य आचार्य श्री मधुसूदन जी महाराज, पूज्य श्री हरिनारायण जी महाराज एवं पूज्य श्री जगद्गुरु आदिकेशवाचार्य जी महाराज (लखनऊ पीठ) की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की शोभा को और बढ़ा दिया। श्रद्धालुओं ने संत-महात्माओं का आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं को धन्य महसूस किया।

आज के मुख्य यजमान अतिन अग्रवाल एवं उनकी धर्मपत्नी रहीं। दोनों ने वैदिक मंत्रोच्चार एवं विधि-विधान के साथ भगवान श्रीहरि का पूजन-अर्चन कर श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का पुण्य लाभ प्राप्त किया। पूज्य स्वामी वासुदेवाचार्य “विद्याभास्कर” जी महाराज ने मुख्य यजमान दंपति को आशीर्वाद प्रदान करते हुए उनके परिवार के सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक उन्नति की मंगलकामना की।

कथा स्थल पर भगवान श्रीहरि के जयघोष, मधुर भजन-कीर्तन एवं भक्तिमय वातावरण से सम्पूर्ण हिन्दी भवन परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण किया तथा महाआरती में भाग लेकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त किया। आरती के उपरांत सभी श्रद्धालुओं को प्रेमपूर्वक भोजन प्रसादी वितरित की गई।

इस पावन आयोजन के संयोजक अतिन अग्रवाल एवं सह-संयोजक धवल गुप्ता ने सभी श्रद्धालुओं से आगामी दिनों में भी अधिक से अधिक संख्या में सपरिवार उपस्थित होकर श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का श्रवण करने तथा धर्मलाभ प्राप्त करने का आग्रह किया।

आयोजन की व्यवस्थाओं में सुभाष गुप्ता, राजेश गर्ग, धवल गुप्ता, नीरू गर्ग, गौरव बंसल, अमित गुप्ता एवं ललित गुप्ता सहित अनेक कार्यकर्ताओं ने सक्रिय सहयोग प्रदान किया। महाआरती के उपरांत भोजन प्रसाद की व्यवस्था भी सभी स्वयंसेवकों के सहयोग से अत्यंत सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुई।

कथा के समापन पर पूज्य महाराज श्री ने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा-

“हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥”

अर्थात कलियुग में भगवान श्रीहरि के नाम-स्मरण के अतिरिक्त जीव के कल्याण का कोई दूसरा मार्ग नहीं है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से भगवान के नाम का निरंतर जप करने, सत्संग से जुड़े रहने तथा धर्म, सेवा और भक्ति के मार्ग पर चलने का आह्वान किया। श्रद्धालुओं ने कथा का रसपान कर संतों का आशीर्वाद प्राप्त किया और पूरे वातावरण में “नारायण-नारायण” तथा “जय श्रीहरि” के जयघोष गूंज उठे।

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