यूपी में AOA विवादों पर बदल सकता है पूरा सिस्टम: शासन को पहुंचा ड्राफ्ट!
पांच सदस्यीय समिति की सिफारिशों पर बदलाव की तैयारी!
हैंडओवर और कॉमन एरिया के विवादों में विकास प्राधिकरणों की भूमिका हो सकती है अहम, वित्तीय अनियमितताओं पर कार्रवाई की जवाबदेही का सवाल भी महत्वपूर्ण
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
लखनऊ। हाईराइज सोसाइटियों में विवाद बढ़ रहे हैं, मामले अदालतों तक पहुंच रहे हैं, लेकिन विवादों के निस्तारण की जिम्मेदारी किस विभाग की है, इसे लेकर अब भी सवाल बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और लखनऊ समेत कई शहरों में एओए के गठन, चुनाव, कार्यकाल, मताधिकार और चुनाव लड़ने की पात्रता से लेकर बिल्डर से हैंडओवर, कॉमन एरिया तथा मेंटेनेंस शुल्क तक के विवाद आम होते जा रहे हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट एक्ट-2010 के क्रियान्वयन और डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालयों के अधिकार क्षेत्र की समीक्षा को लेकर महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक, पांच सदस्यीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार ड्राफ्ट शासन को सौंपा जा चुका है। अब प्रस्ताव पर आगे की कार्रवाई और कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार है।

अपार्टमेंट एक्ट के कई मामलों को डिप्टी रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर करने की सिफारिश
सूत्रों के मुताबिक, समिति ने अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट एक्ट-2010 से संबंधित कई विषयों को डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालयों के अधिकार क्षेत्र से अलग करने पर जोर दिया है। समिति का तर्क बताया जा रहा है कि अपार्टमेंट एक्ट के अनेक प्रावधानों में डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालयों की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं बनती, इसके बावजूद उनसे जुड़े विवाद इन कार्यालयों तक पहुंचते हैं।
कॉमन एरिया के रखरखाव, मेंटेनेंस शुल्क, बिल्डर से सोसाइटी के हैंडओवर और साझा सुविधाओं से संबंधित विवाद इसी समस्या के उदाहरण हैं। समिति के विचार के मुताबिक, इन मामलों में विकास प्राधिकरणों अथवा अन्य सक्षम प्राधिकारियों की भूमिका स्पष्ट की जानी चाहिए, ताकि शिकायतों का निस्तारण संबंधित कानूनी अधिकार क्षेत्र के भीतर हो सके।
यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो अपार्टमेंट विवादों की सुनवाई और निस्तारण की मौजूदा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव संभव हैं। हालांकि, अंतिम बदलाव किन प्रावधानों पर लागू होंगे, यह प्रस्ताव के स्वीकृत स्वरूप और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
हैंडओवर से लेकर कॉमन एरिया तक, जिम्मेदारी तय करना चुनौती
अपार्टमेंट विवाद केवल एओए के गठन या चुनाव तक सीमित नहीं हैं। कई सोसाइटियों में बिल्डर से रखरखाव की जिम्मेदारी हस्तांतरित होने, कॉमन एरिया और साझा सुविधाओं की स्थिति, मेंटेनेंस शुल्क की वसूली तथा प्रबंधन की जवाबदेही को लेकर भी विवाद होते हैं।
हाईराइज परियोजनाओं की स्वीकृति, निर्माण संबंधी प्रक्रियाओं और पूर्णता प्रमाणपत्र जैसे विषय विकास प्राधिकरणों से जुड़े होते हैं। दूसरी ओर, पंजीकृत संस्था के गठन, चुनाव और प्रशासन से संबंधित प्रश्न अलग कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत आ सकते हैं। ऐसे में प्रत्येक विवाद की प्रकृति के अनुसार सक्षम प्राधिकारी की भूमिका तय करना जरूरी है।
समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब निवासी शिकायत लेकर एक कार्यालय पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें दूसरे प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र का हवाला देकर वापस लौटना पड़ता है। इससे न केवल समय और धन की बर्बादी होती है, बल्कि विवादों के समाधान में भी देरी होती है। प्रस्तावित बदलाव की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या इससे विभागों के बीच जिम्मेदारियां स्पष्ट होंगी और आम फ्लैट मालिकों को प्रभावी राहत मिल सकेगी।
वित्तीय अनियमितताओं पर ऑडिट के बाद कार्रवाई कौन करेगा ?
अपार्टमेंट सोसाइटियों में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सोसाइटी के रखरखाव, सुरक्षा, लिफ्ट, साफ-सफाई और अन्य साझा सुविधाओं के लिए निवासी नियमित रूप से धन जमा करते हैं। ऐसे में इस धन के इस्तेमाल का हिसाब और संभावित वित्तीय अनियमितताओं पर कार्रवाई की व्यवस्था स्पष्ट होना जरूरी है।
उत्तर प्रदेश रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत लागू प्रावधानों के अनुसार डिप्टी रजिस्ट्रार को ऑडिट कराने का अधिकार है। लेकिन यदि ऑडिट रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताएं सामने आती हैं, तो उस रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई कौन करेगा और किस प्राधिकारी की जवाबदेही होगी, यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि शासन को सौंपी गई समिति की रिपोर्ट में इस मुद्दे को शामिल किया गया है या नहीं। फिलहाल इसकी पुष्टि नहीं है। यदि ड्राफ्ट में ऑडिट कराने के अधिकार और रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की जिम्मेदारी के बीच के अंतर को स्पष्ट करने का प्रावधान शामिल है, तो यह सोसाइटियों में वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद शुरू हुई कवायद

डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालयों की कार्यप्रणाली और अपार्टमेंट विवादों के निस्तारण का मुद्दा पहले ही न्यायिक स्तर पर उठ चुका है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद संबंधित कार्यालयों की समीक्षा का विषय सामने आया था। इसके बाद हाउसिंग एंड अर्बन प्लानिंग विभाग के प्रमुख सचिव के स्तर पर बैठक हुई और रजिस्ट्रार डॉ. अलका वर्मा की ओर से पांच सदस्यीय समिति गठित किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
समिति से मौजूदा व्यवस्था की समस्याओं और उनके समाधान के संबंध में सुझाव मांगे गए थे। अब सूत्रों के मुताबिक, समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार ड्राफ्ट शासन को सौंप दिया गया है। इस तरह मामला समीक्षा और सुझावों से आगे बढ़कर शासन के स्तर पर विचार के चरण में पहुंच चुका है।
हालांकि, ड्राफ्ट के मूल प्रावधान उपलब्ध नहीं होने के कारण यह स्पष्ट नहीं है कि किन मामलों में किस विभाग की जिम्मेदारी बदलने का प्रस्ताव है। इसी तरह ऑडिट रिपोर्ट पर कार्रवाई की जवाबदेही को लेकर समिति ने क्या सिफारिश की है, इसकी भी पुष्टि नहीं है।
बदलाव की असली कसौटी होगी फ्लैट मालिकों को मिलने वाली राहत
अपार्टमेंट विवादों के निस्तारण की व्यवस्था में सुधार का उद्देश्य केवल विभागों के अधिकार क्षेत्र का पुनर्निर्धारण नहीं होना चाहिए। एओए के चुनाव और प्रबंधन से लेकर बिल्डर हैंडओवर, कॉमन एरिया तथा वित्तीय अनियमितताओं तक, हर मामले में यह स्पष्ट होना चाहिए कि शिकायत की सुनवाई कौन करेगा और नियमों का उल्लंघन सामने आने पर कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी होगी।
फ्लैट मालिक अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर घर खरीदते हैं और सोसाइटी की साझा सुविधाओं के लिए नियमित शुल्क भी देते हैं। ऐसे में उन्हें पारदर्शी प्रबंधन, अपने अधिकारों की सुरक्षा और समयबद्ध शिकायत निस्तारण का भरोसा मिलना जरूरी है।
अब निगाहें शासन के अगले कदम पर हैं। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होती है, तो उत्तर प्रदेश में अपार्टमेंट एक्ट-2010 से संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। लेकिन इस कवायद की असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब अधिकार क्षेत्र की अस्पष्टता दूर हो, विभागों की जवाबदेही तय हो और अपार्टमेंट विवादों में उलझे आम नागरिकों को राहत के लिए बार-बार कार्यालयों और अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें।
