November 5, 2026
[t4b-ticker]

जज तक पहुंच की कोशिश पर हाईकोर्ट सख्त, न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने सुनवाई से किया खुद को अलग

0
HIGH COURT

कोडीन कफ सिरप मामले में 75 आरोपियों की जमानत याचिकाएं दूसरी पीठ को भेजने का निर्देश

यह हाईकोर्ट के इतिहास का काला दिन: न्यायमूर्ति कृष्ण पहल

NEWS1UP

विशेष संवाददाता

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट में कोडीन युक्त कफ सिरप मामले की सुनवाई के दौरान न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता से जुड़ा एक बेहद गंभीर घटनाक्रम सामने आया है। मुख्य आरोपी भोला जायसवाल समेत 75 आरोपियों की नियमित जमानत याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कथित रूप से अपने तक निजी माध्यमों से पहुंच बनाने के प्रयास पर गहरी आपत्ति जताते हुए स्वयं को पूरे मामले की सुनवाई से अलग कर लिया। अपने आदेश में उन्होंने इस घटना को “इलाहाबाद हाईकोर्ट के इतिहास का काला दिन” बताया।

फैसला सुरक्षित होने से पहले पहुंच बनाने का आरोप

अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि फैसला सुरक्षित किए जाने से पहले वादकारी पक्ष की ओर से पीठासीन न्यायाधीश तक निजी माध्यमों से संपर्क स्थापित करने का कथित प्रयास किया गया। न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने इसे न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता पर गंभीर प्रहार बताते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में दिया गया कोई भी निर्णय, चाहे वह कितना भी निष्पक्ष क्यों न हो, उसकी विश्वसनीयता पर अनावश्यक प्रश्नचिह्न लग सकता है।

न्याय केवल निष्पक्ष होना नहीं, निष्पक्ष दिखना भी चाहिए

अपने आदेश में न्यायालय ने दो-टूक कहा कि न्याय केवल किया जाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज को यह स्पष्ट रूप से दिखाई भी देना चाहिए कि न्याय पूरी तरह निष्पक्ष और किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त होकर किया गया है। यदि न्यायाधीश तक निजी पहुंच बनाने की कोशिश होती है तो यह न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करती है।

मुख्य न्यायाधीश को भेजा पूरा मामला

न्यायपालिका की गरिमा और निष्पक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने सभी 75 जमानत याचिकाओं को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, ताकि इनकी सुनवाई किसी अन्य पीठ द्वारा की जा सके। साथ ही आदेश दिया गया कि भविष्य में इन मामलों को उनकी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध न किया जाए।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने कहा कि किसी लंबित मुकदमे में न्यायाधीश तक निजी संपर्क स्थापित करने का प्रयास न केवल न्यायिक आचरण और अधिवक्ता नैतिकता के विरुद्ध है, बल्कि यह संविधान द्वारा संरक्षित न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी सीधा आघात है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है और उसे प्रभावित करने का कोई भी प्रयास अत्यंत गंभीर माना जाएगा।

पहले भी नहीं मिली थी राहत

गौरतलब है कि इस मामले के आरोपियों ने पहले प्राथमिकी रद्द कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट और उसकी लखनऊ खंडपीठ का रुख किया था, लेकिन दोनों स्थानों पर उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद अग्रिम जमानत याचिकाएं भी खारिज कर दी गई थीं। वर्तमान में गिरफ्तार आरोपियों की नियमित जमानत याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी, जिसके दौरान यह अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed