हमतुम रोड पर भूख हड़ताल का भी ‘हंगर गेम’! समर्थन नहीं मिला तो आंदोलन से पहले ही उतर गया पर्दा
NEWS1UP June 1, 2026 0
1 जून से प्रस्तावित भूख हड़ताल जनसमर्थन के अभाव में नहीं हो सकी, अब निवासियों के बीच उठ रहे हैं कई सवाल
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विशेष संवाददाता
गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन की बहुचर्चित हमतुम रोड एक बार फिर सुर्खियों में है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार चर्चा सड़क की बदहाली से ज्यादा उसके नाम पर की गई भूख हड़ताल की घोषणा और उसके अचानक ठंडे पड़ जाने को लेकर हो रही है। सड़क जितनी अपने गड्ढों, जलभराव, धूल और निर्माण को लेकर लगने वाले कयासों के लिए जानी जाती है, उतनी ही अब उस पर राजनीति, लोकप्रियता और प्रतीकात्मक आंदोलनों की रोटियां सेंकने के आरोपों को लेकर भी चर्चा में आ गई है।
हमतुम रोड पर स्थित सात आवासीय सोसायटियों के कुछ निवासियों द्वारा 1 जून से भूख हड़ताल शुरू करने का ऐलान किया गया था। सोशल मीडिया पर इसकी व्यापक चर्चा हुई, समर्थन की अपीलें जारी हुईं और कई लोगों ने इसे सड़क निर्माण के लिए निर्णायक संघर्ष बताया। लेकिन तय तारीख आने पर सोशल मीडिया के माध्यम से ही सूचना दी गई कि पर्याप्त जनसमर्थन नहीं मिलने के कारण भूख हड़ताल आयोजित नहीं की जा सकी।
हड़ताल हुई कहाँ और कब ?
इसके बाद पूरे राजनगर एक्सटेंशन में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। खासकर हमतुम रोड से प्रभावित सोसायटियों के निवासी पूछ रहे हैं कि यदि भूख हड़ताल हो रही थी तो आखिर कहां और किस समय ? और यदि समर्थन नहीं मिला तो क्या आंदोलन की घोषणा करने से पहले जनसमर्थन का कोई वास्तविक आकलन किया गया था ?
कई लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि जिस आंदोलन को क्षेत्र के लिए निर्णायक बताया जा रहा था, वह शुरू होने से पहले ही समर्थन के अभाव में कैसे समाप्त हो गया।
यह पहला मौका नहीं, पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घोषणाएं
दरअसल यह पहला अवसर नहीं है जब सड़क निर्माण के लिए भूख हड़ताल का ऐलान किया गया हो। इससे पहले भी कई बार ऐसे कार्यक्रम घोषित किए गए, लेकिन बाद में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के आश्वासनों का हवाला देते हुए उन्हें स्थगित कर दिया गया।
यही वजह है कि इस बार भी कई निवासियों ने पूरे घटनाक्रम को संदेह की नजर से देखा और सवाल उठाने शुरू कर दिए।
क्या केवल दबाव बनाने की रणनीति थी घोषणा ?
कुछ निवासियों का मानना है कि आंदोलन की घोषणा ऐसे समय की गई जब प्राधिकरण के स्तर पर सड़क निर्माण को लेकर गतिविधियां चल रही थीं। ऐसे में यदि निर्माण कार्य शुरू हो जाता तो आंदोलन के दबाव को उसका श्रेय दिया जा सकता था और यदि नहीं हुआ तो समर्थन न मिलने का कारण बताकर पीछे हटने का रास्ता भी खुला रहता।
कहीं वास्तविक संघर्ष का मनोबल तो नहीं टूट रहा ?

इस पूरे घटनाक्रम ने एक गंभीर सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। सड़क निर्माण के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहे वे बुजुर्ग, महिलाएं और युवा, जिन्होंने धरना-प्रदर्शन से लेकर ज्ञापन तक हर लोकतांत्रिक माध्यम अपनाया, उनके मनोबल पर ऐसे अधूरे या असफल आयोजनों का क्या असर पड़ता है ?
स्थानीय लोगों का कहना है कि बार-बार की बड़ी घोषणाएं और फिर उनका बिना परिणाम के समाप्त हो जाना वास्तविक जनसंघर्ष की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है।
सड़क से ज्यादा चर्चा अब आंदोलन की
फिलहाल हमतुम रोड पर सड़क से ज्यादा चर्चा भूख हड़ताल की हो रही है। सड़क कब बनेगी, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन इतना जरूर है कि आंदोलन की घोषणा और उसके धरातल पर उतरने के बीच का फासला इस बार सड़क के गड्ढों से भी ज्यादा गहरा दिखाई दिया।
जनआंदोलन की असली ताकत भरोसा और भागीदारी
सड़क निर्माण की मांग पूरी तरह जायज है और क्षेत्र के हजारों परिवारों की आवश्यकता से जुड़ी हुई है। लेकिन किसी भी जनआंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता, पारदर्शिता और जनभागीदारी होती है। इसलिए घोषणाओं से ज्यादा जरूरी है कि संघर्ष जमीन पर दिखाई दे और उसमें आम निवासी स्वयं को सहभागी महसूस करें।
