जब मन का डॉक्टर ही मन से हार जाए
ऑफिसर सिटी-2 की घटना ने फिर खड़ा किया बड़ा सवाल
क्या हम अपनों की खामोश चीख सुन पा रहे हैं ?
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन की एक बहुमंजिला सोसाइटी ऑफिसर सिटी-2 में रविवार शाम हुई एक दर्दनाक घटना ने पूरे शहर को झकझोर दिया। शहर की जानी-मानी मनोचिकित्सक डॉ. हमीका अग्रवाल ने रविवार की शाम पांचवीं मंजिल से कूदकर खुदकुशी कर ली। उनकी मौत ने केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज को एक ऐसे प्रश्न के सामने खड़ा कर दिया है, जिसका उत्तर ढूंढना अब बेहद जरूरी हो गया है।

बताया जाता है कि करीब डेढ़ वर्ष पहले उनका अपने पति से तलाक हो गया था। इसके बाद वह ऑफिसर सिटी-2 सोसाइटी के फ्लैट संख्या-509 में अकेले रह रही थीं। परिजनों के अनुसार वह पिछले कुछ समय से मानसिक तनाव का सामना कर रही थीं। पुलिस इन तथ्यों सहित मामले के सभी पहलुओं की जांच कर रही है।
जब मुस्कान बांटने वाला ही भीतर से टूट जाए
वह डॉक्टर थीं। लोगों की मानसिक उलझनों को सुनती थीं, उन्हें उम्मीद देती थीं, टूटे हुए मन को संभालने की कोशिश करती थीं। लेकिन अब यही घटना समाज को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या कभी-कभी सबसे अधिक सहारा देने वाला व्यक्ति ही भीतर से सबसे अधिक अकेला होता है ?
अवसाद अब केवल एक बीमारी नहीं, सामाजिक चुनौती बन चुका है
यह घटना तेजी से बदलती जीवनशैली, बढ़ते अकेलेपन, रिश्तों में बढ़ती दूरियों और मानसिक दबाव की उस तस्वीर का हिस्सा है, जो धीरे-धीरे हमारे समाज को अपनी गिरफ्त में ले रही है। आज अवसाद (डिप्रेशन) किसी उम्र, पेशे या सामाजिक हैसियत को देखकर नहीं आता। डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, पुलिस अधिकारी, छात्र, व्यवसायी, हर वर्ग के लोग मानसिक दबाव से जूझ रहे हैं। कई बार बाहर से सामान्य दिखने वाला व्यक्ति भीतर गहरे संघर्ष से गुजर रहा होता है, लेकिन उसकी खामोशी को कोई पढ़ नहीं पाता।

सबसे बड़ा भ्रम: वह तो मजबूत है
अक्सर हम मान लेते हैं कि जो दूसरों को सलाह देता है, वह स्वयं कभी नहीं टूट सकता। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि मदद करने वाले लोगों को भी कभी-कभी मदद की जरूरत होती है।
कई लोग अपनी पीड़ा इसलिए साझा नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें लगता है कि समाज उन्हें कमजोर समझेगा। यही चुप्पी धीरे-धीरे एक गहरे मानसिक संघर्ष का रूप ले सकती है।
समाज को बदलनी होगी अपनी सोच
मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुका है। जिस तरह बुखार या ब्लड प्रेशर का इलाज सामान्य माना जाता है, उसी तरह मानसिक तनाव या अवसाद पर भी बिना झिझक बातचीत और उपचार को सामान्य बनाना होगा।
किसी परिचित का अचानक लोगों से दूरी बनाना, लगातार उदास रहना, पहले पसंद आने वाली गतिविधियों से किनारा करना या बार-बार निराशा व्यक्त करना, ये संकेत हो सकते हैं कि उसे केवल सलाह नहीं, बल्कि साथ और पेशेवर मदद की जरूरत है।
एक घटना, जो समाज के लिए आईना है
यह घटना केवल पुलिस जांच का विषय नहीं है। यह पूरे समाज के लिए एक आईना है। यह हमें याद दिलाती है कि हर मुस्कुराता चेहरा भीतर से खुश हो, यह जरूरी नहीं। शायद अब समय आ गया है कि हम अपने परिवार, मित्रों और सहकर्मियों से केवल यह न पूछें कि “सब ठीक है ?” बल्कि इतना समय भी दें कि यदि कुछ ठीक न हो, तो वे बिना डर और संकोच के अपनी बात कह सकें।
कई बार एक संवेदनशील बातचीत, कुछ पल का साथ और बिना किसी निर्णय के किसी की बात सुन लेना, किसी के जीवन में उम्मीद की नई किरण बन सकता है।
