September 23, 2026
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हैंडओवर का खेल: बिल्डर ने जिम्मेदारी उतारी, RWA ने पहनी और खरीदार 12 साल से अधिकार तलाश रहे हैं!

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अंतरिक्ष ग्रीन अपार्टमेंट्स का मामला सिर्फ अधूरे हैंडओवर का नहीं!!

दस्तावेजों ने बिल्डर, तत्कालीन RWA और नियामक तंत्र की भूमिका पर खड़े किए सवाल

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। फ्लैट खरीदार ने पैसा दिया, घर खरीदा और भरोसा किया कि नियमों के मुताबिक उसके अधिकार सुरक्षित रहेंगे। लेकिन कौशांबी की अंतरिक्ष ग्रीन अपार्टमेंट्स की कहानी कुछ और ही तस्वीर सामने रखती है। उपलब्ध दस्तावेजों और मौजूदा घटनाक्रम को जोड़ें तो सवाल उठता है, क्या 1 जुलाई 2014 को बिल्डर ने अपनी जिम्मेदारियों का बोझ तत्कालीन RWA के कंधों पर डाल दिया और नियामक तंत्र इसे रोकने में नाकाम रहा ?

सबसे दिलचस्प दस्तावेज खुद बिल्डर का बताया जा रहा पत्र है। इसमें 1 जुलाई 2014 से रोज़मर्रा के कामकाज (day-to-day running affairs) RWA को सौंपने की बात कही गई और निवासियों से RWA को सहयोग करने का अनुरोध किया गया। यानी बिल्डर के पत्र के अनुसार जो तारीख हैंडओवर लंबित होने की मानी रही है, उसी तारीख के दस्तावेज में पूर्ण हैंडओवर के बजाय Day-to-Day Affairs सौंपे जाने की बात सामने आती है।

यहीं से कहानी में असली पेच शुरू होता है!!

क्या day-to-day affairs का हस्तांतरण ही पूर्ण हैंडओवर मान लिया गया ?

अगर नहीं, तो फिर बिल्डर की शेष जिम्मेदारियां कौन पूरी कराता ?

और यदि जिम्मेदारियां पूरी नहीं हुईं, तो नियामक प्राधिकरण ने 12 साल तक क्या किया ?

घर खरीदार ने फ्लैट खरीदा था, जिम्मेदारियां नहीं

अंतरिक्ष ग्रीन AOA ने अब इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर बिल्डर से पूर्ण मेंटेनेंस, IFMS, कानूनी एवं वित्तीय दस्तावेजों और अन्य देयों का हस्तांतरण कराने की मांग की है। फायरफाइटिंग सिस्टम की कमियों का मुद्दा भी अदालत के सामने रखा गया।

28 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुनाल रवि सिंह की खंडपीठ ने याचिका संख्या 28931/2026 पर, AOA को दो सप्ताह में नया अभ्यावेदन (fresh representation) देने और संबंधित प्राधिकारी को कोर्ट ने बिल्डर को भी सुनवाई का अवसर देते हुए उस पर छह सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार निर्णय लेने के निर्देश दिए। यहां सवाल फिर वही है, एक फ्लैट मालिक को अपने घर के अधिकारों के लिए हाईकोर्ट तक क्यों पहुंचना पड़ा ?

कटघरे में सिर्फ बिल्डर क्यों ?

बिल्डर की जवाबदेही सबसे पहले तय होनी चाहिए। लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं होती। GDA जैसी नियामक संस्था की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खरीदार यह भरोसा करके घर खरीदता है कि परियोजना नियमों के तहत विकसित हो रही है और उसके हितों की रक्षा के लिए नियामक व्यवस्था मौजूद है। 

ऐसे में यदि बिल्डर अपने दायित्वों से पीछे हटता है, पुराना विवाद वर्षों तक चलता है और अंततः AOA को अदालत जाना पड़ता है, तो GDA की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। और यदि शुरुआती दौर में RWA की भूमिका भी विवादित दस्तावेजों के कारण सवालों में आती है, तो जांच का दायरा केवल बिल्डर तक सीमित क्यों रहे ?

सवाल मिलीभगत का नहीं, जवाबदेही का है

उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि बिल्डर, तत्कालीन RWA और प्राधिकरण के बीच मिलीभगत थी। लेकिन घटनाक्रम इतना जरूर पूछता है कि क्या तीन अलग-अलग स्तरों की जिम्मेदारियों के बीच ऐसा समझौता हुआ, जिसमें अंततः नुकसान फ्लैट खरीदार का हुआ ? 

क्योंकि परिणाम सामने है: 

बिल्डर पर दायित्वों को लेकर सवाल

RWA के पुराने फैसलों पर सवाल

और नियामक व्यवस्था की निगरानी पर सवाल

लेकिन सबसे ज्यादा परेशान कौन है ? वही निवासी जिसने अपनी जिंदगी की कमाई लगाकर फ्लैट खरीदा।

हमें उम्मीद है कि अब हमारे अधिकार मिलेंगे: सुधा चौधरी

सुधा चौधरी, एओए सचिव

अंतरिक्ष ग्रीन AOA की सचिव सुधा चौधरी के अनुसार, हैंडओवर 1 जुलाई 2014 से लंबित है। उनका कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश ने AOA को अपनी समस्या एक बार फिर GDA के सामने रखने का अवसर दिया है।

“हमारा हैंडओवर 1 जुलाई 2014 से लंबित पड़ा है। हाईकोर्ट ने हमें फिर से अवसर प्रदान किया है कि गाजियाबाद विकास प्राधिकरण हमारी समस्या सुने और छह सप्ताह के अंदर हमें विधिवत हैंडओवर मिले। हम आशान्वित हैं कि हमें हमारे अधिकार मिलेंगे। फायर सिस्टम तक बिल्डर ने दुरुस्त हालत में नहीं दिया था।”

अब असली सवाल GDA से

हाईकोर्ट ने मामले के गुणदोष (merits) पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। उसने नया अभ्यावेदन देने और उसके बाद कानून के अनुसार निर्णय का रास्ता दिया है।

अब देखना यह है कि GDA इस मामले को सिर्फ एक और नया अभ्यावेदन मानकर निपटाता है या 1 जुलाई 2014 से चली आ रही पूरी हैंडओवर प्रक्रिया की जांच कर यह तय करता है कि किसकी क्या जिम्मेदारी थी और किस स्तर पर खरीदारों के अधिकार प्रभावित हुए।

क्योंकि असली सवाल सिर्फ यह नहीं कि अंतरिक्ष ग्रीन को विधिवत हैंडओवर कब मिलेगा।

असली सवाल है कि-

जिस प्राधिकरण का काम विकास और नियमों की निगरानी करना है, क्या उसके रहते घर खरीदार को अपने ही अधिकारों के लिए हाईकोर्ट जाना पड़ेगा ?

और अगर जवाब हां है, तो फिर हैंडओवर की समस्या से ज्यादा गंभीर समस्या नियामक व्यवस्था की है।

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