“चुनाव नहीं कराओ, कुर्सी पर बैठे रहो!” हाईराइज सोसायटियों की व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने उठाया बड़ा सवाल
नोएडा की Eldeco Aamantran Apartment Owners Association मामले में हाईकोर्ट के बड़े सवाल: एक साल की कुर्सी वर्षों तक कैसे ?
10 सितंबर की सुनवाई पर टिकी नजरें
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
प्रयागराज। आपकी सोसायटी में चुनाव समय पर नहीं हुआ तो क्या मौजूदा बोर्ड हमेशा कुर्सी पर बना रह सकता है ? क्या मेंटेनेंस का बकाया होने पर आपका वोटिंग राइट खत्म किया जा सकता है ? और अगर चुनाव कराने की जिम्मेदारी उसी बोर्ड की हो जो खुद सत्ता में है, तो चुनाव टालने की स्थिति में उसे हटाएगा कौन ?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अहम आदेश ने उत्तर प्रदेश की हाईराइज सोसायटियों की इसी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
12 अगस्त 2026 के आदेश में हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि चुनाव कराने की जिम्मेदारी मौजूदा प्रबंधन की ही है और वह चुनाव कराने में निष्क्रिय रहता है, तो यह निष्क्रियता उसके अपने कार्यकाल को लंबा करने का जरिया बन सकती है। अदालत ने ऐसी स्थिति में मनमाने अधिकार के इस्तेमाल, जवाबदेही के अभाव और वित्तीय अथवा अन्य अनियमितताओं की संभावना पर चिंता जताई है।

न्यायमूर्ति विनोद दीवाकर की एकल पीठ ने यह आदेश नोएडा स्थित एल्डिको आमंत्रण अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन के मामले की सुनवाई करते हुए दिया है। इस मामले में गाजियाबाद के डिप्टी रजिस्ट्रार द्वारा 20 अप्रैल 2026 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश के जरिए नई बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट के गठन तक सोसायटी के पदाधिकारियों की वित्तीय शक्तियों पर रोक लगाई गई थी, हालांकि रोजमर्रा के खर्च की अनुमति रखी गई थी।
एक साल का कार्यकाल, फिर वर्षों तक कुर्सी पर कौन ?
मामले में हाईकोर्ट ने यूपी अपार्टमेंट रूल्स, 2011 के मॉडल बायलॉज के बायलॉ 26(ii) और 26(iii) को विशेष रूप से जांच के केंद्र में रखा।
बायलॉ 26(ii) के अनुसार बोर्ड पदाधिकारी का कार्यकाल एक वर्ष है और कोई व्यक्ति एक ही पद पर लगातार दो वर्ष से अधिक नहीं रह सकता।
लेकिन बायलॉ 26(iii) में कहा गया है कि मौजूदा पदाधिकारी तब तक पद पर बने रहेंगे, जब तक उनके उत्तराधिकारी निर्वाचित होकर अपनी पहली बैठक नहीं कर लेते।
यहीं अदालत ने मूल सवाल उठाया कि-
अगर चुनाव ही समय पर न हो तो क्या “उत्तराधिकारी के आने तक” पद पर बने रहने का प्रावधान किसी बोर्ड को वर्षों तक सत्ता में बने रहने का रास्ता दे सकता है ?
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि चुनाव कराने की प्रक्रिया शुरू करने की जिम्मेदारी मौजूदा प्रबंधन की है, तो उसकी निष्क्रियता उसके अपने कार्यकाल को बढ़ाने का माध्यम बन सकती है। अदालत ने ऐसी लंबी निरंतरता को मनमाने अधिकार, जवाबदेही के अभाव तथा वित्तीय या अन्य अनियमितताओं के लिए संभावित अवसर से जोड़ा है।
और बड़ा सवाल, वोट किसका ?
सोसायटी का मेंटेनेंस, बिजली या अन्य शुल्क बकाया है तो क्या सदस्य का वोट भी रोक दिया जाए ? हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत के सामने यह बात आई कि बकाये के आधार पर सदस्यों को वोट से वंचित करने की व्यवस्था का इस्तेमाल इस तरह हो सकता है कि बोर्ड अपनी पसंद के लोगों को चुनाव में रखे और बाकी सदस्यों को बाहर कर दे।
अदालत ने इसे “Selective electoral college” बनने की संभावित स्थिति बताया है और सरकार से पूछा है कि कानून या बायलॉ में आखिर ऐसी रोक का स्पष्ट आधार क्या है।
हाईकोर्ट ने सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया, लेकिन सवाल जरूर खड़े कर दिए

अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि क्या पदाधिकारियों की सूची को “Provisional approval” देने की कानूनी शक्ति है ? चुनाव समय पर नहीं कराने वाले मौजूदा बोर्ड के खिलाफ व्यवस्था क्या है ? बकाया होने पर वोट काटने का अधिकार किस कानून में है ?
और तेजी से बढ़ती हजारों फ्लैट वाली सोसायटियों के विवादों के लिए क्या मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था पर्याप्त है ?
गाजियाबाद से नोएडा और लखनऊ तक असर
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से गौतमबुद्ध नगर, गाजियाबाद, कानपुर और लखनऊ में पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों का उल्लेख किया है। अदालत ने यह भी पूछा है कि क्या इन बढ़ते विवादों को देखते हुए मौजूदा व्यवस्था के बजाय अलग या Dedicated forum बनाया जाना चाहिए।
अब आदेश हर ग्रुप हाउसिंग सोसायटी के नोटिस बोर्ड पर
मामले को और महत्वपूर्ण बनाते हुए हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के डिप्टी रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि आदेश की प्रति उनके क्षेत्राधिकार की सभी ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों में भेजी जाए और नोटिस बोर्ड पर चस्पा कराई जाए।
यानी अब यह मामला सिर्फ एक सोसायटी का विवाद नहीं रह गया। अदालत ने खुद अपार्टमेंट मालिकों, निर्वाचित सदस्यों और अन्य संबंधित लोगों से सुझाव मांगे हैं।
अब असली नजर 10 सितंबर पर
मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को दोपहर 2 बजे होगी। हाईकोर्ट ने राज्य के संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है और विवादित डिप्टी रजिस्ट्रार आदेश के संचालन को फिलहाल अगली सुनवाई तक रोक दिया है।

