कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना फ्लैटों का कब्जा! हाईकोर्ट ने बिल्डर और GDA से मांगा जवाब
हाईकोर्ट का सीधा सवाल: कानून में रोक है तो फिर किसकी अनुमति से सौंप दिए गए फ्लैट ?
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भूमेश शर्मा
गाजियाबाद/प्रयागराज। गाजियाबाद के मोहन नगर स्थित गुलमोहर ग्रीन्स सोसायटी से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिल्डर और गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सुभाष चंदर एवं 10 अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित बिल्डर ने अब तक कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) हासिल नहीं किया है, इसके बावजूद फ्लैटों का कब्जा दे दिया गया। फ्लैट खरीदारों को कब्जा देने से पहले कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) हासिल करना जरूरी है, लेकिन जब बिल्डर ने यह प्रमाण-पत्र लिया ही नहीं तो फ्लैटों का कब्जा आखिर किस आधार पर दे दिया गया ? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी बेहद गंभीर सवाल पर बिल्डर के साथ-साथ गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) और राज्य सरकार से जवाब मांग लिया है।

न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने याचिका की की सुनवाई करते हुए पाया कि संबंधित बिल्डर ने अब तक पूर्णता प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं किया है, जबकि इसके बावजूद फ्लैटों का कब्जा दिया जा चुका है। कोर्ट ने इसे उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (प्रमोशन ऑफ कंस्ट्रक्शन, ओनरशिप एंड मेंटेनेंस) अधिनियम, 2010 की धारा 4(5) का स्पष्ट उल्लंघन बताया। यही नहीं, कोर्ट ने कहा कि इसी तरह का प्रावधान उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 15-A में भी मौजूद है।
कानून मौजूद, लेकिन पालन कराने वाला कौन ?

इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी का सबसे अहम हिस्सा यही है। अदालत ने कहा कि दोनों कानूनों को पढ़ने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि इन प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित कराने वाला सक्षम प्राधिकारी आखिर कौन है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बिल्डर ने कानून का उल्लंघन किया या नहीं, बल्कि उससे भी बड़ा सवाल यह है कि कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी किस सरकारी संस्था की है ?
इसी का जवाब हासिल करने के लिए हाईकोर्ट ने मुख्य स्थायी अधिवक्ता और GDA के अधिवक्ता को शपथ-पत्र दाखिल कर स्पष्ट रूप से बताने का निर्देश दिया है कि वर्ष 2010 और 1973 के संबंधित कानूनों के तहत सक्षम प्राधिकारी कौन है।
इसका जवाब 7 सितंबर 2026 तक अदालत में दाखिल किया जाना है।
बिल्डर से सीधा सवाल: कब्जा दिया तो किस आधार पर ?
हाईकोर्ट ने बिल्डर को भी राहत नहीं दी। अदालत ने स्पष्ट रूप से बिल्डर-प्रतिवादी संख्या 3 से स्पष्टीकरण मांगा है कि कंप्लीशन सर्टिफिकेट हासिल किए बिना उसने निर्मित फ्लैटों का कब्जा किस प्रकार दे दिया। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि फ्लैट खरीदार अपने जीवन की बड़ी पूंजी लगाकर घर खरीदते हैं। ऐसे में यदि वैधानिक रूप से आवश्यक प्रमाण-पत्र हासिल किए बिना ही कब्जा सौंप दिया गया, तो इसकी जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।
GDA के रिकॉर्ड पर भी अदालत की नजर

सुनवाई के दौरान GDA की ओर से मामले का रिकॉर्ड अदालत के समक्ष पेश किया गया। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि नवंबर 2011 से पहले का रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने GDA से कहा कि मामले का पूरा रिकॉर्ड उस समय से पेश किया जाए, जब विकास प्राधिकरण के समक्ष नक्शे की स्वीकृति के लिए आवेदन किया गया था।
GDA के अधिवक्ता ने अदालत को आश्वासन दिया कि अगली सुनवाई पर पूरा रिकॉर्ड प्रस्तुत किया जाएगा।
7 सितंबर को खुलेगा जवाबदेही का अगला पन्ना
मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर 2026 को नए मामलों की सुनवाई के तुरंत बाद होगी। उस दिन अदालत के सामने दो महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे, पहला यह कि कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना फ्लैटों का कब्जा देने पर बिल्डर क्या स्पष्टीकरण देता है ? और दूसरा यह, कानून में निर्धारित प्रावधानों का पालन कराने के लिए सक्षम प्राधिकारी कौन है, इस पर राज्य सरकार और GDA क्या जवाब देते हैं ?
हाईकोर्ट के आदेश ने उठाया बड़ा सवाल
इस पूरे मामले ने उत्तर प्रदेश की हाईराइज और अपार्टमेंट परियोजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि जब कानून मौजूद है और उसमें प्रावधान स्पष्ट हैं, तो उसका पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी किसकी है ? और अगर कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) के बिना कब्जा देना कानून का उल्लंघन है, तो ऐसे मामलों की निगरानी कौन करेगा और जवाबदेही किसकी तय होगी ?
हाईकोर्ट ने फिलहाल इन सवालों का जवाब संबंधित अधिकारियों से मांगा है। अब निगाहें 7 सितंबर की सुनवाई पर हैं, जहां बिल्डर, राज्य सरकार और GDA के जवाब इस मामले की अगली दिशा तय कर सकते हैं।
