नाना पाटेकर : पर्दा गिर गया, लेकिन वह आवाज अब भी गूंजती रहेगी
जिसने किरदार जिए, वह कलाकार कभी नहीं मरता!!
NEWS1UP
शिरीष शर्मा (फिल्म लेखक)
मुंबई। कुछ कलाकार पर्दे पर आते हैं और किरदार निभाकर चले जाते हैं। कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जो किरदार में इस तरह उतरते हैं कि पर्दा गिरने के बाद भी उनका चेहरा, उनकी आंखें और उनकी आवाज दर्शक के भीतर बनी रहती है। नाना पाटेकर उन्हीं विरले कलाकारों में थे।

8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने केवल एक अभिनेता नहीं खोया, बल्कि अभिनय की उस परंपरा का एक बड़ा अध्याय खो दिया, जिसमें संवाद शब्दों से नहीं, भीतर की आग से निकलते थे।
नाना पाटेकर का अभिनय कभी बनावटी नहीं लगा। वह मुस्कुराते थे तो किरदार मुस्कुराता था, गुस्सा करते थे तो लगता था जैसे व्यवस्था के किसी अन्याय पर पूरा समाज भीतर से उबल पड़ा हो। उनकी आवाज में एक ऐसी खुरदुराहट थी, जो कानों से होकर सीधे चेतना पर दस्तक देती थी।
और शायद यही वजह है कि नाना पाटेकर की देशभक्ति वाली भूमिकाएं भारतीय सिनेमा की स्मृति में अलग स्थान रखती हैं।
देशभक्ति के कई रंग थे नाना के अभिनय में
देशभक्ति को अक्सर फिल्मों में एक ही रंग में दिखाया गया, तिरंगा, सीमा, सैनिक और दुश्मन। लेकिन नाना पाटेकर ने इसे कहीं ज्यादा व्यापक बनाया।
‘क्रांतिवीर’ में देशभक्ति एक बेचैन नागरिक के आक्रोश में दिखाई दी। वह देशभक्ति जो केवल राष्ट्रगान के समय खड़े होने तक सीमित नहीं, बल्कि देश की व्यवस्था को भीतर से खोखला करने वाली ताकतों के खिलाफ खड़े होने का साहस मांगती है।
‘तिरंगा’ में राष्ट्र और कर्तव्य का रंग अलग था। यहां वर्दी और राष्ट्रधर्म के बीच एक सीधा संबंध दिखाई दिया। नाना के अभिनय ने यह एहसास कराया कि देश की रक्षा केवल सीमा पर खड़े सैनिक की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जिसके हाथ में कोई भी काम, कोई भी पद या कोई भी अधिकार है।
फिर ‘प्रहार’ आया। यहां देशभक्ति का चेहरा और कठोर था। सैनिक केवल युद्धभूमि में नहीं लड़ता; वह अनुशासन, कर्तव्य और अपने भीतर के संघर्ष से भी लड़ता है। नाना ने सैनिक को किसी पोस्टर का नायक नहीं बनाया, बल्कि उसकी पीड़ा, कठोरता और जिम्मेदारी को मनुष्य की तरह जिया।
यही नाना पाटेकर की खासियत थी-
उन्होंने देशभक्ति को भाषण से निकालकर इंसान के चरित्र में रख दिया।
उनकी आवाज में सिर्फ संवाद नहीं, सवाल होते थे
नाना पाटेकर के संवाद याद रह जाते हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत केवल संवाद अदायगी नहीं थी। उनकी आंखें भी संवाद करती थीं। कई बार वह बिना कुछ कहे भी दर्शक को बेचैन कर देते थे। उनके अभिनय में एक अजीब-सी सच्चाई थी। वह नायक को चमकदार बनाने की कोशिश नहीं करते थे। उनके किरदारों में कमियां थीं, गुस्सा था, टूटन थी, कमजोरी थी, लेकिन उन्हीं कमजोरियों के बीच एक मजबूत नैतिक आधार भी था।
शायद इसलिए उनके किरदारों को देखकर दर्शक केवल तालियां नहीं बजाता था, वह अपने भीतर झांकने लगता था।

‘क्रांतिवीर’ का आक्रोश आज भी क्यों याद आता है ?
क्योंकि वह केवल एक फिल्मी किरदार का गुस्सा नहीं था। वह उस आम आदमी की बेचैनी थी जो देखता है कि देश के नाम पर राजनीति हो रही है, व्यवस्था के नाम पर अन्याय हो रहा है और लोकतंत्र के नाम पर जनता की आवाज दबाई जा रही है।
नाना ने उस बेचैनी को चेहरा दिया। उनके अभिनय में देशभक्ति का मतलब किसी दूसरे से नफरत करना नहीं था। उसका अर्थ था, अपने देश की कमियों को देखकर चुप न रहना।यही वह अंतर था जिसने नाना पाटेकर को देशभक्ति के तमाम फिल्मी चेहरों के बीच अलग खड़ा किया।
सिनेमा से आगे का नाना
नाना पाटेकर केवल अभिनेता नहीं थे। रंगमंच से शुरू होकर हिंदी और मराठी सिनेमा तक पहुंचने वाले उनके लंबे सफर में गंभीर भूमिकाओं से लेकर हास्य तक अनेक रंग दिखाई दिए। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय की विविधता को अलग-अलग रूपों में सामने रखा।
एक तरफ वह ‘क्रांतिवीर’ का आक्रोश थे, तो दूसरी तरफ ‘वेलकम’ जैसी फिल्म में वही अभिनेता दर्शकों को खुलकर हंसाता था।
यही नाना थे-
एक चेहरा, लेकिन अभिनय के अनगिनत रंग।
उन्होंने अभिनय को कभी केवल ग्लैमर नहीं बनने दिया। उनका सिनेमा हमें बार-बार यह याद दिलाता रहा कि अभिनेता का असली काम केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज के सामने उसके अपने चेहरे का आईना रखना भी है।
नाना चले गए, लेकिन उनकी आवाज नहीं जाएगी
आज जब उनके निधन की खबर से सिनेमा जगत स्तब्ध है, तब उनकी फिल्मों के दृश्य एक-एक कर आंखों के सामने आते हैं। कहीं सैनिक खड़ा है, कहीं व्यवस्था से लड़ता हुआ नागरिक, कहीं देश के लिए बेचैन एक आवाज, कहीं टूटे हुए आदमी की आंखों में गुस्सा है, और कहीं वही गंभीर चेहरा दर्शकों को हंसा रहा है। नाना पाटेकर ने अभिनय नहीं किया, उन्होंने किरदारों को जिया।
इसीलिए उनका जाना किसी एक कलाकार का जाना नहीं है। यह उस अभिनय शैली का जाना है जिसमें आवाज में वजन था, संवाद में विचार था और चेहरे पर जीवन के अनुभवों की गहरी लकीरें थीं।
उनकी फिल्मों ने देशभक्ति को कई चेहरों में दिखाया-
सैनिक के अनुशासन में, नागरिक के आक्रोश में, कर्तव्य की कठोरता में, अन्याय के विरोध में और देश के लिए कुछ कर गुजरने की बेचैनी में।
शायद नाना पाटेकर को इससे बेहतर श्रद्धांजलि और क्या होगी कि उनकी फिल्मों को सिर्फ याद न किया जाए, बल्कि उनके सवालों को भी याद रखा जाए।
क्योंकि नाना की आवाज का असली अर्थ शायद यही था-
देश से प्रेम केवल कहने की चीज नहीं, निभाने की जिम्मेदारी है।
आज भारतीय सिनेमा का पर्दा एक महान अभिनेता के लिए कुछ क्षणों को ठहर गया है। नाना पाटेकर नहीं रहे, लेकिन उनके किरदार रहेंगे। उनकी आवाज रहेगी, उनका आक्रोश रहेगा। और सबसे बढ़कर, उनका वह सिनेमा रहेगा, जो हमें बार-बार अपने देश, अपने समाज और अपने भीतर झांकने के लिए मजबूर करता रहेगा।
नाना पाटेकर को विनम्र श्रद्धांजलि।
शत-शत नमन।।
