BJP का मिशन 2027 शुरू: यूपी अध्यक्ष पद पर महा-टक्कर, किस पर टिकेगा पार्टी का भरोसा ?
NEWS1UP December 2, 2025 0
यूपी बीजेपी अध्यक्ष चुनाव सिर्फ एक पद का चयन नहीं
बल्कि 2027 की लड़ाई का ‘सोशल इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट’ है
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पॉलिटिकल डेस्क
लखनऊ। उत्तर प्रदेश बीजेपी अपने नए प्रदेश अध्यक्ष के चयन के निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। 98 में से 84 जिला अध्यक्षों का चुनाव पूरा होने के बाद अब संकेत साफ हैं कि अगला प्रदेश अध्यक्ष अगले कुछ ही दिनों में घोषित हो सकता है। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष चुने जाने के बाद ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया शुरू होगी,और उसी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय परिषद सदस्य के तौर पर औपचारिक चयन का रास्ता भी खुल जाएगा। पार्टी अपने सबसे अहम निर्णय की कगार पर है। नई प्रदेश इकाई की कमान सामाजिक संतुलन, चुनावी गणित, सपा के PDA मॉडल की काट और संगठन–सरकार के शक्ति-विन्यास, सबको ध्यान में रखकर तय होगी। आने वाले कुछ दिन सिर्फ अध्यक्ष के नाम का ऐलान नहीं, बल्कि 2027 के राजनीतिक समीकरण का पहला निर्णायक संकेत देने वाले होंगे।
अध्यक्ष पद की रेस में छह नाम: ब्राह्मण–ओबीसी–दलित संतुलन पर मंथन
बीजेपी सूत्रों के अनुसार अध्यक्ष पद की दौड़ में छह नाम सबसे आगे चल रहे हैं, और ये तीन प्रमुख जातीय वर्गों में बंटे हुए हैं-
ब्राह्मण चेहरे
दिनेश शर्मा (पूर्व डिप्टी सीएम, राज्यसभा सांसद): संगठन व शासन का गहरा अनुभव, मोदी के बेहद विश्वस्त। सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं।

हरीश द्विवेदी (पूर्व सांसद): संगठनात्मक जिम्मेदारियों में निपुण, ब्राह्मण समीकरण संभालने के लिए मजबूत विकल्प।

ओबीसी (खासतौर पर लोध) चेहरे
धर्मपाल सिंह (कैबिनेट मंत्री): लोध समुदाय से आते हैं, गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक साधने की क्षमता रखते हैं।

बी.एल. वर्मा (केंद्रीय राज्य मंत्री): संगठन और सरकार दोनों में अनुभव, केंद्र और प्रदेश, दोनों स्तरों पर पकड़।

दलित चेहरे
रामशंकर कठेरिया (पूर्व केंद्रीय मंत्री): आगरा-बुंदेलखंड क्षेत्र में मजबूत पकड़; बसपा के जाटव आधार में सेंध का सामर्थ्य।

विद्यासागर सोनकर (एमएलसी): पूर्वांचल में प्रभावी, संगठन में लम्बा अनुभव।

सूत्रों के अनुसार यदि ब्राह्मण बनाम ओबीसी फार्मूला उलझता है, तो बीजेपी “सरप्राइज़ कार्ड” के रूप में दलित अध्यक्ष पर भी दांव खेल सकती है, ताकि सपा के PDA नैरेटिव (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) का सीधा जवाब दिया जा सके।
2026 पंचायत और 2027 विधानसभा चुनावों का कैलकुलस
बीजेपी ने यह चुनाव लगभग एक साल तक रोके रखा क्योंकि पार्टी की राजनीतिक गणित बेहद सूक्ष्म है। 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी को स्पष्ट संदेश मिला जिसमें पासी और कुर्मी वोट का बड़ा हिस्सा खिसक गया, जाटव वोट का उल्लेखनीय भाग सपा की ओर चला गया और कई सीटों पर गैर-यादव ओबीसी में भी हलचल दिखी।
अब 2026 पंचायत और 2027 विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी जातीय प्रतिनिधित्व का ऐसा संतुलन बनाना चाहती है जो उसके कोर सामाजिक गठबंधन को फिर से मजबूत कर सके।
सपा के PDA मॉडल से मुकाबला: बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग 2.0
सपा ने 2024 में टिकट वितरण में सोशल इंजीनियरिंग का आक्रामक प्रयोग किया, जिसके तहत कई सीटों पर जाटव उम्मीदवार उतरे गए। यादव–मुस्लिम से बाहर निकलकर नई जातियों पर जोर दिया गया। इसका सीधा नुकसान बसपा और बीजेपी दोनों को हुआ। बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि सपा विधानसभा में 130–140 में से आधी सीटें गैर-यादव ओबीसी, दलित और छोटी जातियों को दे देती है, तो मुकाबला बेहद कठिन हो जाएगा। इसीलिए बीजेपी अध्यक्ष पद के लिए लोध, कुर्मी, निषाद, बिंद, मौर्य, शाक्य जैसे वर्गों के नाम गंभीरता से परख रही है।
सत्ता-संतुलन का समीकरण: अध्यक्ष किस जाति का हो ?
यूपी सरकार में वर्तमान शक्ति-संतुलन इस प्रकार है-
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ – ठाकुर
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डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक – ब्राह्मण
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डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य – ओबीसी
इसमें नया प्रदेश अध्यक्ष किस जाति का हो, यही मुख्य राजनीतिक पहेली है।
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ओबीसी अध्यक्ष से पार्टी “पिछड़ा नेतृत्व” का नैरेटिव मजबूत कर सकती है।
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ब्राह्मण अध्यक्ष परंपरागत सवर्ण आधार को भरोसे का संकेत देगा।
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दलित अध्यक्ष बने तो बसपा-सपा के दलित गठजोड़ को बड़ा संदेश जाएगा और पार्टी का ‘सबका साथ’ कैम्पेन नई दिशा पाएगा।
अध्यक्ष चयन के बाद बड़ा फेरबदल तय
सूत्र बताते हैं कि अध्यक्ष घोषित होते ही सरकार और संगठन दोनों में बड़े बदलाव होंगे। कैबिनेट विस्तार में पासी–कुर्मी को प्रमुखता दी जा सकती है। प्रतापगढ़, अम्बेडकरनगर, प्रयागराज क्षेत्र में सैनी, मौर्य, शाक्य प्रतिनिधित्व, ब्रज क्षेत्र में शाक्य और काशी व पूर्वांचल में बिंद–कुर्मी समुदाय को बढ़ी हुई हिस्सेदारी मिलेगी। यह अंतिम बड़े फेरबदल 2027 के चुनाव से पहले का अंतिम मेगा राजनीतिक री-पैकेजिंग होगा।
