गाजियाबाद की साँसें ‘गंभीर’: ज़हरीली हवा के पीछे प्रशासन की नाकामी का काला धुआँ!

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नवंबर में पूरे भारत का सबसे प्रदूषित शहर

रात के अँधेरे में जलता प्लास्टिक

सुबह हवा में मौत घुली मिलती है

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। यह वही शहर है जो कभी NCR की उभरती हुई आधुनिक पहचान का प्रतीक माना जाता था। ऊँचे मकान, व्यस्त सड़कें, तेज़ी से बढ़ता उद्योग,यह सब गाज़ियाबाद को विकास का चेहरा बनाते थे। लेकिन आज नवंबर की हवा ने इस शहर की तस्वीर को धुएँ से ढक दिया है।
CREA की ताज़ा रिपोर्ट की सबसे काली पंक्ति यही है, “गाजियाबाद नवंबर में भारत का सबसे प्रदूषित शहर रहा।”

यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि दो करोड़ से अधिक लोगों की साँसों पर मंडराता खतरा है।

जहरीली हवा: नवंबर का एक भी दिन सुरक्षित नहीं

रिपोर्ट कहती है कि नवंबर के पूरे 30 दिनों तक गाजियाबाद की हवा में पीएम 2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से ऊपर रहा। औसत 224 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर, यह वही हवा है जिसे दुनिया के किसी भी विकसित शहर में “आपातकाल स्तर” माना जाता है। लेकिन गाजियाबाद में यह अब “सामान्य” होता जा रहा है। कितनी विडंबना है कि एक भी दिन की राहत नहीं, एक भी दिन साफ़ आसमान नहीं, एक भी दिन साँसों को चैन नहीं।

फैक्ट्रियों का धुआँ शहर की मौत लिख रहा

प्रदूषण के इस अंधकारमय अध्याय में सबसे शर्मनाक तथ्य यह है कि प्रदूषण विभाग और स्थानीय प्रशासन अवैध कचरा जलाने पर नियंत्रण लगाने में बुरी तरह विफल रहे हैं। प्लास्टिक, टायर, रबर, केमिकल मिश्रित कचरा, ये सब रात के अँधेरे में जलाया जाता है। काले, तीखे और जहरीले धुएँ का यह सैलाब रात से सुबह तक हवा में घुलता है, और अगले दिन शहर सांस लेने के लिए संघर्ष करता है।

स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं के रिकॉर्ड बताते हैं-

  • कई औद्योगिक इलाकों में कचरा खुलेआम जलता है

  • निरीक्षण कभी–कभार होता है, कार्रवाई नगण्य

  • जुर्माने या सीलिंग की प्रक्रिया अक्सर सिर्फ कागज़ों तक सीमित

यह खामोश अपराध सिर्फ प्रकृति के खिलाफ नहीं, बल्कि शहर के हर परिवार, हर बच्चे, हर बुजुर्ग के खिलाफ अपराध है।

पराली नहीं, असली दोषी सालभर चलने वाले स्रोत

CREA का बयान साफ है कि इस साल पराली का योगदान बेहद कम रहा, औसतन 7%। फिर भी प्रदूषण बढ़ा है, यानी ज़हर स्थानीय स्रोतों से आया। ट्रांसपोर्ट का धुआँ, इंडस्ट्री का उत्सर्जन, पावर प्लांट्स, निर्माण धूल, और सबसे घातक, प्लास्टिक-टायर जलाने का अवैध कारोबार।

गाज़ियाबाद में प्रदूषण का संकट “मौसमी समस्या” नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता का स्थायी परिणाम बन चुका है।

 पूरे NCR में बिगड़ी हवा: गाजियाबाद बना ‘हॉटस्पॉट’

नोएडा, दिल्ली, हापुड़, मेरठ, सोनीपत, रोहतक, ये सभी शहर टॉप 10 में रहे। दिल्ली भी चौथे स्थान पर रही, लेकिन गाज़ियाबाद ने सबसे ऊपर की, यानी सबसे अभिशप्त, जगह हासिल की। NCR के 29 में से 20 शहरों में प्रदूषण बढ़ा है। कई जगह एक भी दिन राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS) सीमा के भीतर नहीं रहा। इसका अर्थ यह है कि समस्या गहरी है, जड़ें व्यापक हैं, और समाधान अब “एक्शन प्लान” की घोषणाओं से नहीं बल्कि जमीन पर कठोर नियंत्रण से होगा।

 एक ओर धुआँ, दूसरी ओर शिलांग की साफ हवा

यह विभाजन चौंकाने वाला है, जहाँ गाज़ियाबाद में पीएम 2.5 स्तर 224 है, वहीं मेघालय के शिलांग में मात्र 7सबसे साफ 10 शहरों में कर्नाटक के 6 शहर शामिल हैं। यानी साफ हवा कोई चमत्कार नहीं, बल्कि सख्त प्रबंधन का परिणाम है।

समय अब भी है, लेकिन बहुत कम

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को अपनी सेवाएं दे चुके वरिष्ठ डॉक्टर अलोक कुमार कहते हैं कि लंबे समय तक इतनी जहरीली हवा- 

डॉ अलोक कुमार
  • दिल की बीमारियाँ बढ़ाती है

  • फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुँचाती है

  • बच्चों में अस्थमा और ग्रोथ संबंधी दिक्कतें बढ़ाती है

  • गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए गंभीर खतरा बनती है

सवाल यह है कि कब तक यह शहर अपनी ही लापरवाही के धुएँ में घुटता रहेगा ? कब तक निरीक्षण और कार्रवाई सिर्फ कागज़ों पर चलती रहेगी ?  कब तक अवैध कचरा दहन उद्योग को रात में खुली छूट मिलती रहेगी ?

गाज़ियाबाद को बचाना है तो प्रशासन को “सर्वे–रिपोर्ट–बैठक” की राजनीति से बाहर आकर वास्तविक नियंत्रण, रात में गश्त, फैक्ट्रियों की निगरानी और कठोर कार्रवाई लागू करनी होगी। क्योंकि सच यही है कि अगर अभी भी नहीं संभले, तो गाज़ियाबाद का आसमान स्थायी रूप से धुएँ की एक मोटी परत के नीचे दफन हो जाएगा।

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