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हाईराइज यूपी में कानून पुराना, विवाद नए: अब अपार्टमेंट एक्ट की ‘सर्जरी’ की तैयारी

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गाजियाबाद से नोएडा और लखनऊ तक लाखों फ्लैट मालिकों की निगाहें पांच सदस्यीय समिति पर

AOA का गठन-चुनाव, बिल्डर से हैंडओवर, कॉमन एरिया और मेंटेनेंस से लेकर विवाद निस्तारण तक व्यवस्था कठघरे में

NEWS1UP

 भूमेश शर्मा

लखनऊ/गाजियाबाद। शहर ऊपर उठ रहे हैं। इमारतें ऊंची हो रही हैं। एक-एक टावर में सैकड़ों परिवार बस रहे हैं। गाजियाबाद से नोएडा और लखनऊ तक हाईराइज सोसायटियां अब शहरों के विस्तार का सबसे दिखाई देने वाला रूप है। लेकिन इन ऊंची इमारतों के साथ एक दूसरी चीज भी लगातार ऊपर आती दिखाई दे रही है, विवाद।

कहीं बिल्डर से हैंडओवर का सवाल है। कहीं कॉमन एरिया पर अधिकार का। कहीं मेंटेनेंस चार्ज को लेकर टकराव है। कहीं AOA का गठन विवादित है तो कहीं चुनाव। और जब सोसायटी के भीतर मामला नहीं सुलझता तो सवाल उठता है कि  जाएं तो जाएं कहां ? यही सवाल अब उत्तर प्रदेश सरकार के सामने भी है।

उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व एवं रखरखाव प्रोत्साहन) अधिनियम, 2010 में संशोधन की दिशा में एक बार फिर गंभीर कवायद शुरू हुई है। 25 सितंबर को प्रमुख सचिव, शहरी एवं आवास नियोजन की अध्यक्षता में बैठक हुई। इसके बाद पांच सदस्यीय समिति गठित की गई है, जिसे कानून के प्रावधानों की समीक्षा कर आवश्यक संशोधनों पर अपने सुझाव देने हैं। रिपोर्ट 5 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध कराई जानी है। समिति में डिप्टी रजिस्ट्रार मुख्यालय लखनऊ, डिप्टी रजिस्ट्रार मंडल लखनऊ, डिप्टी रजिस्ट्रार गाजियाबाद, मुख्यालय के वरिष्ठ ऑडिटर और एक अन्य अधिकारी शामिल हैं।

कागज पर यह एक समिति के गठन का आदेश है। लेकिन इसके पीछे की कहानी कहीं बड़ी है। क्योंकि जिस कानून को अब फिर से देखा जा रहा है, उसके सामने आज की हाईराइज सोसायटियां 2010 की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल सवाल खड़े कर चुकी हैं।

समस्या यह है कि जिम्मेदारी किसकी है

एक फ्लैट मालिक के लिए कानून की सबसे पहली जरूरत यह नहीं होती कि उसमें कितनी धाराएं हैं। उसकी पहली जरूरत यह होती है कि समस्या होने पर वह किस दरवाजे पर जाए। 

बिल्डर हैंडओवर नहीं कर रहा, कहां जाए ?

कॉमन एरिया पर कब्जा है, कौन कार्रवाई करेगा ?

मेंटेनेंस को लेकर विवाद है, किसकी भूमिका है ?

AOA का गठन नहीं हो रहा, कौन सुनिश्चित करेगा ?

चुनाव विवादित है, कौन फैसला करेगा ?

और यदि विवाद पहले ही कई स्तरों से गुजर चुका है, तो अंतिम प्रशासनिक जिम्मेदारी किसकी है ? यही वह बिंदु है जहां मौजूदा व्यवस्था की जटिलता सामने आती है।

एक ओर विकास प्राधिकरण है, जिसकी भूमिका परियोजना के विकास, स्वीकृतियों, निर्माण और उससे जुड़े नियामकीय पहलुओं से जुड़ती है। दूसरी ओर डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय है, जहां सोसायटी के पंजीकरण, वैधानिक अभिलेख और चुनाव जैसे प्रश्न पहुंचते हैं। लेकिन फ्लैट मालिक को इन दोनों व्यवस्थाओं के बीच घूमना क्यों पड़े ? और अगर किसी विवाद की जड़ विकास परियोजना में है, लेकिन उसका अगला सिरा AOA के चुनाव में निकलता है, तो जिम्मेदारी की यह सीमा कहां खिंचेगी ?

यही वह स्पष्टता है जिसकी अब सबसे ज्यादा जरूरत दिखाई देती है।

हाईकोर्ट पहुंचते विवाद भी एक संकेत हैं

यह केवल अनुमान नहीं है कि अपार्टमेंट सोसायटियों के प्रशासनिक विवाद न्यायालयों तक पहुंच रहे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट को ही देखें। गाजियाबाद की विंडसर पार्क सोसायटी से जुड़े 20 जुलाई 2023 के फैसले में अदालत के सामने AOA/RWA के बोर्ड के चुनाव, डिप्टी रजिस्ट्रार की भूमिका और अपार्टमेंट एक्ट, 2010 तथा मॉडल बायलॉज के तहत चुनावी व्यवस्था का सवाल आया। विवाद इतना आगे गया कि अदालत को बोर्ड के सभी 10 पदों पर चुनाव कराने के निर्देश देने पड़े।

इस मामले में हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि सोसायटी में 2021 और 2022 के दौरान केवल रिक्त हुए कुछ पदों के लिए चुनाव कराए गए थे, जबकि अदालत ने कानून और मॉडल बायलॉज की व्यवस्था के आधार पर सभी पदों के वार्षिक चुनाव की आवश्यकता पर जोर दिया।

यानी एक सोसायटी का चुनाव विवाद केवल सोसायटी के भीतर का विवाद नहीं रहा। वह डिप्टी रजिस्ट्रार से निर्धारित प्राधिकारी और फिर हाईकोर्ट तक पहुंचा। और यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अगर AOA के चुनाव जैसे बुनियादी सवाल को तय करने में भी प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर इतनी लंबी प्रक्रिया खड़ी हो सकती है, तो क्या कानून में अब जिम्मेदारियों और प्रक्रियाओं को और स्पष्ट करने की जरूरत नहीं है ?

विंडसर पार्क अकेला उदाहरण नहीं

गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित SPS Residency से जुड़े एक मामले में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने डिप्टी रजिस्ट्रार के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें सोसायटी के अध्यक्ष को हटाने संबंधी बोर्ड के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था। अदालत के रिकॉर्ड में सोसायटी की संरचना, उसके बायलॉज और पदाधिकारियों को हटाने की प्रक्रिया पर विस्तृत चर्चा दर्ज है।

इस तरह के मामले एक महत्वपूर्ण बात सामने रखते हैं- 

AOA बनाना एक बात है, उसे लोकतांत्रिक और वैधानिक ढंग से चलाना दूसरी।

और यही वजह है कि सरकार की मौजूदा कवायद में AOA के गठन और चुनाव को अलग से समीक्षा के दायरे में रखा गया है।

अब सवाल सिर्फ AOA का नहीं, पूरी व्यवस्था का है

किसी सोसायटी में AOA बन गई। चुनाव भी हो गए। लेकिन बिल्डर ने हैंडओवर नहीं किया। तो क्या AOA पूरी तरह जिम्मेदार हो जाएगी ? अगर बिल्डर कॉमन एरिया अपने नियंत्रण में रखता है तो AOA क्या कर सकती है ? मेंटेनेंस चार्ज को लेकर विवाद है तो किस संस्था के पास जाना होगा ? यदि बिल्डर और फ्लैट मालिकों के बीच विवाद का कारण परियोजना के विकास या हैंडओवर से जुड़ा है, तो क्या उसका समाधान सोसायटी पंजीकरण कार्यालय से अपेक्षित किया जा सकता है ?

यहीं पर विकास प्राधिकरण और डिप्टी रजिस्ट्रार की भूमिकाओं को अलग-अलग और साफ-साफ परिभाषित करने की जरूरत सबसे ज्यादा दिखाई देती है।

किसकी जिम्मेदारी कहां तक ?

प्रस्तावित संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही हो सकता है कि कानून फ्लैट मालिक को यह स्पष्ट कर दे कि किस विषय के लिए कौन-सा विभाग जिम्मेदार है।

विकास प्राधिकरण की भूमिका स्पष्ट हो

बिल्डर से परियोजना के हैंडओवर की प्रक्रिया स्वीकृत योजना और परियोजना से जुड़े विकास संबंधी अनुपालन। कॉमन एरिया से संबंधित परियोजना स्तर के विवाद। निर्माण, स्वीकृति और परियोजना के नियामकीय पहलुओं से जुड़े प्रश्न। बिल्डर द्वारा परियोजना से संबंधित दायित्वों के अनुपालन की निगरानी।

डिप्टी रजिस्ट्रार की भूमिका स्पष्ट हो

AOA के पंजीकरण से संबंधित वैधानिक प्रक्रिया। AOA के अभिलेख और वैधानिक दस्तावेज। लागू कानून और बायलॉज के तहत चुनाव से जुड़े वैधानिक दायित्व। पदाधिकारियों तथा संस्था के वैधानिक रिकॉर्ड से जुड़े विषय। और जहां कानून निर्धारित प्राधिकारी को अधिकार देता है, वहां विवाद के लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया।

विंडसर पार्क मामले में हाईकोर्ट ने स्वयं इस बात पर विस्तार से विचार किया कि चुनाव विवाद के लिए किस वैधानिक मंच की भूमिका है और डिप्टी रजिस्ट्रार किस सीमा तक कार्य करता है। यानी नई व्यवस्था में अधिकारों का बंटवारा सिर्फ सरकारी विभागों के बीच नहीं, बल्कि नागरिक की सुविधा के हिसाब से भी साफ होना चाहिए। सरकार के सामने समस्या दिखाई दे रही है।  अब देखना यह है कि उसका समाधान कितनी स्पष्टता से कानून में उतारा जाता है।

2010 का कानून, 2026 का हाईराइज शहर

यहां एक और सवाल महत्वपूर्ण है। 2010 में जब अपार्टमेंट एक्ट आया, तब उत्तर प्रदेश का हाईराइज परिदृश्य आज जैसा नहीं था। आज एक ही परियोजना में सैकड़ों नहीं, कई जगह हजारों लोग रह रहे हैं। AOA के चुनाव, पदाधिकारियों की वैधता, कॉमन सुविधाओं का संचालन, बिल्डर हैंडओवर और सामुदायिक संपत्तियों का प्रबंधन अब ऐसे विषय हैं जिनका असर सीधे हजारों परिवारों पर पड़ता है।

इसलिए कानून की समीक्षा का मतलब केवल कुछ नई धाराएं जोड़ देना नहीं हो सकता।

पुराने नियमों की भी छंटाई करनी होगी।

28 सितंबर के आदेश में समिति को ऐसे प्रावधानों की पहचान करने को कहा गया है जो वर्तमान परिस्थितियों में अस्पष्ट या अप्रासंगिक हो गए हैं। साथ ही समस्याओं के निराकरण के लिए आवश्यक संशोधनों पर प्रस्ताव तैयार करने को कहा गया है।

यानी इस बार सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि क्या नया जोड़ा जाए। सवाल यह भी होना चाहिए कि क्या हटाया जाए ? क्या बदला जाए ? और क्या पहली बार जोड़ा जाए ?

कानून में समयसीमा नहीं होगी तो विवाद फिर लौटेंगे

किसी भी कानून की असली ताकत उसके अधिकारों में नहीं, उनके इस्तेमाल की प्रक्रिया में दिखाई देती है। मान लीजिए बिल्डर को हैंडओवर करना है। लेकिन समयसीमा क्या है ? हैंडओवर के लिए कौन-से दस्तावेज अनिवार्य हैं ?

कौन-सा अधिकारी यह प्रमाणित करेगा कि प्रक्रिया पूरी हुई ? यदि बिल्डर अनुपालन नहीं करता तो क्या होगा ? AOA का चुनाव होना है। कितने समय में ? चुनाव नहीं होते तो कौन हस्तक्षेप करेगा ? और यदि चुनाव पर विवाद है तो उसका निस्तारण कितने समय में होगा ?

यही वे सवाल हैं जिनके जवाब यदि कानून में समयसीमा और दंडात्मक व्यवस्था के साथ तय नहीं हुए तो संशोधन के बाद भी विवादों की अगली खेप अदालतों तक पंहुचेगी ही।

कानून में अधिकार जरूरी हैं। लेकिन अधिकार से ज्यादा जरूरी है, उस अधिकार को लागू कराने की समयबद्ध व्यवस्था।

हाईराइज सोसायटी में रहने वाला नागरिक विभागों के बीच क्यों घूमे ?

यही इस पूरी कहानी का शायद सबसे सीधा सवाल है। एक फ्लैट खरीदार ने घर खरीदा था। उसे विभागों की जिम्मेदारियां याद रखने के लिए घर नहीं खरीदना था। उसे यह पता होना चाहिए कि उसकी समस्या का जिम्मेदार कौन है।

लेकिन यदि हैंडओवर का मामला एक विभाग में है, AOA का मामला दूसरे में, चुनाव विवाद तीसरे स्तर पर पहुंचता है और अंततः न्यायालय रास्ता बनता है, तो कानून नागरिक के लिए सरल होने के बजाय प्रक्रिया का जंजाल बन जाता है।

संशोधन की सबसे बड़ी कसौटी यही होनी चाहिए कि वह इस जंजाल को कितना काट पाता है।

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