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बिना कंप्लीशन सर्टिफिकेट कब्जे: जब नियम टूट रहे थे तब GDA कहां था ?

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गुलमोहर ग्रीन्स पर हाईकोर्ट की सख्ती के बाद 100 से ज्यादा बिल्डर रडार पर

FIR की तैयारी के बीच GDA की निगरानी व्यवस्था भी सवालों में

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। बिना कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) के फ्लैटों का कब्जा देने वाले बिल्डरों पर अब गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) शिकंजा कसने की तैयारी कर रहा है। प्राधिकरण ने ऐसे 100 से अधिक बिल्डरों को चिन्हित किया है और उनके खिलाफ FIR दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। यह कार्रवाई ऐसे समय में हो रही है, जब गुलमोहर ग्रीन्स मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने GDA की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।

लेकिन GDA की इस कार्रवाई ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, अगर बिना कंप्लीशन सर्टिफिकेट कब्जा देना नियमों का गंभीर उल्लंघन था, तो जब बिल्डर वर्षों से यह करते रहे, तब प्राधिकरण ने उन्हें रोकने के लिए क्या किया ?

यही सवाल इस पूरी कार्रवाई को महज बिल्डरों के खिलाफ अभियान से आगे ले जाता है।

GDA के आदेश पहले से मौजूद थे

यहां मामला सिर्फ नियमों की जानकारी का नहीं है। GDA पहले ही बिल्डरों को निर्देश दे चुका है कि सक्षम प्राधिकारी से पूर्णता प्रमाणपत्र हासिल किए बिना फ्लैटों की बिक्री, हस्तांतरण या खरीदारों को कब्जा न दिया जाए।

इतना ही नहीं, Completion Certificate के बिना फ्लैटों की रजिस्ट्री पर रोक लगाने के लिए भी प्राधिकरण की ओर से कदम उठाए जाने की बात सामने आती रही है। 2013 में GDA की ओर से राजस्व विभाग को निर्देश दिए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई थी कि कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना फ्लैटों की रजिस्ट्री न की जाए।

GDA की तहरीर में भी बिना CC गतिविधियों का जिक्र

GDA के प्रवर्तन जोन-1 की 26 सितंबर 2026 की तहरीर में एक बिल्डर के खिलाफ FIR दर्ज कराने का अनुरोध किया गया है। दस्तावेज में कहा गया है कि संबंधित भवन के लिए पूर्णता प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ था, इसके बावजूद भवन के भूतल की कई दुकानों की बिक्री हो चुकी थी और वहां व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थीं। GDA ने इसे संबंधित कानून और प्राधिकरण की शर्तों के उल्लंघन से जोड़ते हुए पुलिस कार्रवाई की मांग की है। 

यहां सवाल सीधा है, जिस स्थिति को GDA आज FIR योग्य मान रहा है, उसे उस वक्त क्यों नहीं रोका गया, जब परियोजनाओं में कब्जे दिए जा रहे थे ?

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद क्यों तेज हुई कार्रवाई ?

गुलमोहर ग्रीन्स मामले में हाईकोर्ट के सामने भी यही सवाल उठा था कि बिना सीसी कब्जा कैसे दिया गया और प्राधिकरण ने इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए। अब GDA 100 से अधिक ऐसी परियोजनाओं की पहचान कर रहा है, तो मामला किसी एक बिल्डर या एक सोसायटी तक सीमित नहीं रह जाता।

सवाल यह है कि क्या इन परियोजनाओं की स्थिति GDA को पहले से पता थी ? अगर पता थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? और अगर पता नहीं थी, तो फिर इतनी बड़ी संख्या में ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं की निगरानी कैसे होती रही ?

100 से ज्यादा मामले, तो जिम्मेदारी भी बड़ी

एक-दो परियोजनाओं में नियमों का उल्लंघन अलग बात है। लेकिन जब ऐसे मामलों की संख्या 100 से ज्यादा बताई जा रही हो, तो सवाल केवल बिल्डरों पर नहीं टिकता। यह पूरे निगरानी तंत्र का सवाल बन जाता है। किसने परियोजनाओं का निरीक्षण किया ? कब्जा दिए जाने की जानकारी कब मिली ? कितने मामलों में नोटिस जारी हुए ?  कितनों में कार्रवाई हुई ? और जहां कार्रवाई नहीं हुई, वहां क्यों नहीं हुई ?

कानून तोड़ने वाले की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन कानून लागू कराने वाले तंत्र की भूमिका भी जांच के दायरे से बाहर नहीं रह सकती।

CAG की रिपोर्ट भी GDA की प्रवर्तन व्यवस्था पर सवाल उठा चुकी है

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि GDA की कार्यप्रणाली पर CAG की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट में पहले ही गंभीर टिप्पणियां दर्ज की जा चुकी हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चिन्हित अनधिकृत निर्माण के मामलों में GDA ने केवल 19 से 65 प्रतिशत मामलों में कार्रवाई की। ऑडिट में यह भी दर्ज है कि 2017 से 2022 के दौरान निर्माण पूरा होने वाले 1,303 स्वीकृत नक्शों में से केवल 125 के Completion Certificate जारी किए गए, जबकि बाकी 1,178 भवनों की स्थिति ऑडिट को उपलब्ध नहीं कराई गई।

ऐसे में मौजूदा कार्रवाई एक और सवाल खड़ा करती है, क्या GDA अब केवल बिल्डरों की जवाबदेही तय करेगा या अपनी निगरानी व्यवस्था की भी पड़ताल करेगा ?

बिल्डर के साथ अधिकारियों की भूमिका भी जांची जाएगी ?

जब बिना CC कब्जा देना नियमों का उल्लंघन है, तो बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी देखना होगा कि उस समय परियोजना की निगरानी करने वाले अधिकारियों ने क्या किया। किसने निरीक्षण किया ? किसने आपत्ति की ? किसे जानकारी थी ? और अगर जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई ?

क्या उन अधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय होगी, जिनके कार्यकाल में कथित तौर पर ये उल्लंघन होते रहे ?

यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि जिस कानून का हवाला देकर आज FIR कराई जा रही है, उसका पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी भी प्राधिकरण की ही थी।

सबसे बड़ा सवाल खरीदारों का

इस पूरी कार्रवाई के बीच सबसे ज्यादा चिंता उन लोगों की है जिन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई और बैंक लोन से फ्लैट खरीदे हैं। अगर किसी परियोजना के पास कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं है और भविष्य में बैंक वहां नए ऋण देने से पीछे हटते हैं, तो पुराने खरीदारों की स्थिति क्या होगी ? क्या उनकी संपत्ति की खरीद-बिक्री प्रभावित होगी ? क्या बैंक उन्हें दोबारा ऋण देने से इनकार करेंगे ? और सबसे अहम, जिस समय ये लोग फ्लैट खरीद रहे थे, उस समय परियोजना की वास्तविक नियामकीय स्थिति उन्हें क्यों नहीं बताई गई ?

GDA को अब ऐसे सभी प्रोजेक्टों की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि खरीदारों को यह पता हो कि उनकी संपत्ति किस कानूनी स्थिति में है।

अब प्राधिकरण की असली परीक्षा है

बिना सीसी कब्जा देने वाले बिल्डरों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है। लेकिन यह कार्रवाई तभी पूरी मानी जाएगी, जब इसके साथ यह भी सामने आए कि इतने वर्षों तक नियमों के उल्लंघन को रोका क्यों नहीं गया।

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