राजनगर एक्सटेंशन रामलीला में भावुक हुए दर्शक, राम-केवट संवाद से शबरी मिलन तक का हुआ सजीव मंचन
भरत मिलाप में छलके भाव, शबरी के प्रेम और प्रभु श्रीराम की भक्ति ने मोहा मन
पंचवटी में शूर्पणखा प्रसंग और सीता हरण का भी हुआ मंचन
NEWS1UP
संवाददाता
गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन रामलीला में भगवान श्रीराम के वनवास से लेकर भरत मिलाप, पंचवटी में शूर्पणखा प्रसंग, माता सीता के हरण और भक्त शबरी से मिलन तक की रामकथा का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से त्याग, प्रेम, भाईचारे, भक्ति और मर्यादा के प्रसंगों को जीवंत कर दिया। राम-केवट संवाद और भरत मिलाप के दृश्यों ने जहां दर्शकों को भावुक किया, वहीं शबरी के निष्कपट प्रेम ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।
केवट ने पखारे प्रभु के चरण, राम-लक्ष्मण और सीता को कराया गंगा पार
रामलीला के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के क्रम में निषादराज केवट के पास पहुंचे। केवट ने प्रभु श्रीराम के चरण पखारे और तीनों को गंगा के पार पहुंचाया। इस प्रसंग के माध्यम से कलाकारों ने प्रभु के प्रति निष्कपट प्रेम, समर्पण और भक्ति की भावना को प्रस्तुत किया।

दशरथ के निधन के बाद अयोध्या लौटे भरत, राम की चरण पादुकाएं लेकर लौटे
माता कैकेयी की आज्ञा का पालन करते हुए श्रीराम के वन चले जाने के बाद उनके वियोग में राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिए। उस समय ननिहाल में रह रहे भरत और शत्रुघ्न को जब पिता के निधन और श्रीराम के वनवास की जानकारी मिली, तो वे तत्काल अयोध्या लौटे।
भरत ने माता कैकेयी के निर्णय पर गहरा रोष व्यक्त किया और गुरुजनों से श्रीराम को वापस लाने के लिए वन जाने की अनुमति मांगी। इसके बाद भरत, शत्रुघ्न, तीनों माताएं और गुरुजन श्रीराम से मिलने चित्रकूट पहुंचे। वहां भरत ने श्रीराम से अयोध्या लौटकर राजपाट संभालने का आग्रह किया, लेकिन पिता को दिए वचन और वनवास की मर्यादा का पालन करते हुए श्रीराम ने लौटने से इनकार कर दिया।
अंततः श्रीराम ने अपनी चरण पादुकाएं भरत को सौंपते हुए अयोध्या के सिंहासन की जिम्मेदारी संभालने का निर्देश दिया। भरत मिलाप का यह दृश्य देखकर दर्शक भाव-विभोर हो उठे। इस प्रसंग ने भाईचारे, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश दिया।
पंचवटी में कुटिया, शूर्पणखा प्रसंग से सीता हरण तक की लीला
आगे की लीला में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण पंचवटी पहुंचे, जहां उनके रहने के लिए कुटिया बनाई गई। इसी दौरान रावण की बहन शूर्पणखा वहां पहुंची। लक्ष्मण द्वारा उसकी नाक काटे जाने के बाद वह खर-दूषण के पास पहुंची। इसके बाद भगवान श्रीराम और खर-दूषण के बीच युद्ध हुआ, जिसमें खर और दूषण दोनों मारे गए।
शूर्पणखा ने रावण के दरबार में पहुंचकर पूरी घटना बताई। इसके बाद रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण कर लिया और उन्हें लंका ले गया। इस प्रसंग के मंचन ने रामलीला में रोमांच और उत्सुकता का माहौल पैदा कर दिया।
शबरी के प्रेम में दिखी भक्ति की शक्ति, प्रभु ने प्रेम से स्वीकार किए झूठे बेर
माता सीता की खोज में जंगल-जंगल भटकते हुए भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को एक कुटिया से ‘जय श्रीराम’ की ध्वनि सुनाई दी। पास पहुंचने पर उन्होंने देखा कि एक वृद्ध महिला प्रभु के नाम का जप कर रही थीं। वह भगवान श्रीराम की परम भक्त शबरी थीं।
प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को सामने देखकर शबरी भाव-विभोर हो गईं। उन्होंने दोनों भाइयों के चरण धोए, उन्हें आसन पर बैठाया और कंद-मूल-फल अर्पित किए। शबरी ने प्रेमपूर्वक अपने झूठे बेर भी प्रभु को खिलाए, जिन्हें श्रीराम ने सहर्ष स्वीकार किया। इसके बाद भगवान ने उन्हें नवधा भक्ति का उपदेश दिया।
शबरी मिलन के इस प्रसंग ने दर्शकों को यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति में आडंबर नहीं, बल्कि प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का महत्व होता है।
इस अवसर पर रामलीला ट्रस्ट के राकेश त्यागी, अनिल तोमर, अनिल शर्मा, दीपक सहलोत, अंकित गुप्ता, नरेश सिरोही, मनोज अग्रवाल, रूपक चौधरी, राहुल ढाका, अभिषेक शर्मा, अरविंद भारद्वाज, कैप्टन सचिन शर्मा, रवींद्र कुमार गर्ग और एनके शर्मा, डॉ. अनिल सिंह समेत ट्रस्ट के सभी पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।
