भावनाओं की थाली: जहाँ स्वाद से बढ़कर होती है श्रद्धा
संध्या का सौंदर्य: पूजा, कथा और चाँद का इंतज़ार
NEWS1UP
करवा चौथ विशेष रिपोर्ट
गाजियाबाद। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी करवा चौथ का दिन भावों और आस्थाओं से परिपूर्ण रहेगा, लेकिन इस वर्ष का सरगी, वह पहला अल्पाहार जो करवा चौथ के व्रत की शुरुआत करती है, अपने संग कई भावनाएँ, आशीष और बंधन लेकर आएगी। इस पौराणिक एवं पारिवारिक रस्म में माँ-सास अपने बहू के लिए सिर्फ भोजन नहीं बनाती, बल्कि अपना आशीर्वाद, स्नेह और परंपरा भी भेजती है।
करवा चौथ का सार: व्रत, भक्ति और नारी शक्ति
करवा चौथ की कथा, व्रत और पूजा सिर्फ आध्यात्मिक उद्गम नहीं हैं, ये शक्ति, समर्पण और नारी की दृढ़ता की प्रतीक हैं। जहाँ एक ओर व्रत से शरीर पर नियंत्रण की कसौटी होती है, वहीं दूसरी ओर यह परिवार और भावनात्मक संबंधों की एक अद्भुत फ़्रेमिंग है। इस व्रत के पीछे वह विश्वास है कि यदि पत्नी श्रद्धा से चाँद को देखकर अपना व्रत तोड़े, तो पति को दीर्घायु और सुख-समृद्धि मिलेंगी।
सरगी की रस्म भी इसी विश्वास और लगाव का हिस्सा है, व्रत की अमृत बेला में परिवार की कोमलता और स्नेह से तैयार किया गया भोजन, जो एक तरह से रिश्तों की खाद बन जाता है।
सरगी: प्रेम, पोषण और परंपरा का संगम 
रसोई की हल्की सी रौनक में सजी यह थाली, जिसमें फल, मेवे, हलवा, फेनी, नारियल या दूध आदि शामिल होते हैं, सिर्फ ऊर्जा का स्रोत नहीं होती, बल्कि एक संवाद है, माँ-सास की शुभकामनाओं का।
रोज़मर्रा के समय में प्रतिरूपित होती ऊर्जा की सुरक्षा की तरह, सरगी में पोषण को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि दिनभर निर्जल व्रत की थकावट से शरीर थक न जाए। इसीलिए इसमें फल, सूखे मेवे, हल्का व्यंजन और पौष्टिकता का संतुलन महत्वपूर्ण है।
साथ ही, पारंपरिक रूप से इस थाली को सुशोभित करना, दीप, श्रृंगार, लाल कपड़ा, रख-रखाव, इन सबका अपना महत्व है। यह एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है उस प्रेम, समर्पण और पवित्रता की जिसकी ढाल व्रतधारिणी अपने भीतर धारण करती हैं।
नारी शक्ति, समर्पण और आधुनिकता
समय के साथ ये परंपराएँ और अधिक संवेदनशील हुई हैं, कई आधुनिक महिलाएँ, जो माता-सास से दूर रहती हैं, स्वयं अपना सरगी तैयार करती हैं, वीडियो कॉल पर आशीर्वाद स्वीकार करती हैं, और कभी-कभी यह प्रसार सोशल मीडिया पर भी देखने को मिलता है।
यह बदलाव यह संकेत देता है कि परंपरा जड़ नहीं, बल्कि जीवन की शैली के अनुरूप विकसित हो सकती है, वह नारी शक्ति, श्रद्धा और परिवार के बंधन को आज भी वैसा ही जीवंत रखती है जैसा सदियों से करती आई है।
सार्जी के भावनात्मक और सामाजिक अर्थ पर डॉ. भावना गर्ग और शिखा वत्स की गूंजती हुई बातें”
इस वर्ष, हमने कुछ सामाजिक और मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण पाने के लिए दो नामों डॉ. भावना गर्ग और शिखा वत्स से बातचीत की।

साहिबाबाद के ‘एलआरसी कॉलेज’ में कॉमर्स डिपार्टमेंट की एचओडी डॉ भावना गर्ग ने कहा:
“सरगी सिर्फ भोजन नहीं, यह भावनात्मक सुरक्षा की वह परत है जो विवाह और संबंधों को समय की कसौटी पर टिकाए रखने में मदद करती है। एक थाली में पोषण हो, स्वाद हो और साथ ही आशीर्वाद की अनुभूति हो, वही सरगी की आत्मा है।”
भावना ने आगे यह भी जोड़ा कि आज के समय में यह आवश्यक है कि पोषण एवं स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिया जाए, विशेषकर जब महिलाएँ निर्जल व्रत करती हैं, तो उन्हें हल्के, सुपाच्य और उर्जा देने वाले भोजन की आवश्यकता अधिक होती है।
‘गुरुकुल द स्कूल’ की डायरेक्टर एडमिन शिखा वत्स ने अपना नजरिया साझा करते हुए कहा:

“सरगी की रस्म में एक अनकही भाषा होती है, वह भाषा जो सास आगे बढ़ाती है बहू की ओर, और बहू उसे स्वीकार करती है। यह सिर्फ संबंधों की परंपरा नहीं, बल्कि संवाद और विश्वास की निशानी है। जब वह थाली बहू तक पहुँचती है, वहाँ सिर्फ भोजन नहीं, एक हिंडोला (झूला) झूलता है स्नेह और आशा का।”
शिखा वत्स ने यह भी बताया कि आधुनिक समय में महिलाएँ इस रस्म को सामाजिक समारोहों, ब्लॉग, और महिला समूहों में साझा करती हैं, ताकि वह भावना और परंपरा, दोनों, आगे बढ़ती रहें।
10 अक्टूबर 2025: एक दिन, अनेक दिल
आज पूरे भारत में करवा चौथ मनायी जा रही है, जैसे ही तड़के सवेरे की हल्की रोशनी छाई, हजारों-लाखों महिलाएँ धीरे-धीरे जगीं , स्नान किया, श्रृंगार किया और अपनी सजीव विश्वास की थाली सार्जी को लेंगी।
….लेकिन उस भरोसे की एक डोरी हमेशा जमी रहे:
– माँ-सास की दुआएँ पलकों पर सजेंगी।
– बहूओं की श्रद्धा व्रत को एक पावन आकार देगी।
– इस अनुष्ठान में न केवल पवित्रता है, बल्कि एक सामूहिक भावना है, एकता, स्नेह और परंपरा का।
और जब रात का चाँद अपनी चाँदनी बिखेरता है, उस दृश्य को निहार कर, छन्नी से चाँद देखें, पति को अर्घ्य दें, और एक घूँट पानी पाकर व्रत खोलें, तब उस क्षण में यह सरगी थाली पीछे छूट जाएगी, लेकिन उसकी खुशबू, उसकी दुआ, उसकी भावना सदा बनी रहेगी।
शुभ करवा चौथ!
(यह लेख श्रद्धा, सादर भाव और परंपरा के सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया।)
