हाईकोर्ट ने दिखाया आईना: डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय महज पोस्ट ऑफिस नहीं!!
क्लासिक रेजिडेंसी प्रकरण में इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी, सोसायटी नियामक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
कहा, वैधानिक शक्तियों का प्रयोग न्याय के लिए होना चाहिए!

NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। क्या उत्तर प्रदेश की हाउसिंग सोसायटियों में कानून का राज है या सिर्फ कागजी औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं ? क्या डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय केवल आदेश जारी करने तक सीमित हो गया है ? और क्या इसी वजह से बार-बार सोसायटी के चुनाव अदालतों की चौखट तक पहुंच रहे हैं ?
इन सवालों की वजह बना है राजनगर एक्सटेंशन की क्लासिक रेजिडेंसी का मामला, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसी टिप्पणी की है, जिसने पूरी सोसायटी नियामक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय महज पोस्ट ऑफिस नहीं

यही वह टिप्पणी है जिसने इस पूरे मामले को सामान्य चुनावी विवाद से कहीं बड़ा बना दिया। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि डिप्टी रजिस्ट्रार का कार्यालय केवल पत्राचार करने या औपचारिक आदेश पारित करने वाला दफ्तर नहीं है। कानून ने उसे वैधानिक शक्तियां इसलिए दी हैं कि उनका प्रयोग न्यायपूर्ण और विवेकपूर्ण तरीके से किया जाए।
यानी अदालत ने साफ संदेश दिया कि सिर्फ प्रक्रिया नहीं, न्याय भी दिखना चाहिए।
क्या था पूरा मामला ?

क्लासिक रेजिडेंसी में 5 अप्रैल 2026 को चुनाव हुए। करीब 45 दिन की देरी का हवाला देते हुए गाजियाबाद के डिप्टी रजिस्ट्रार ने चुनाव निरस्त कर दोबारा चुनाव कराने का आदेश दे दिया। यह आदेश तब दिया जबकि एओए बोर्ड चुनाव में देरी का पर्याप्त कारण (बोर्ड परीक्षाओं का उस दरम्यान होना) डिप्टी रजिस्ट्रार के समक्ष दे चुका था। इसके बाद नियुक्त निर्वाचन अधिकारी ने नए चुनाव के लिए 80 हजार रुपये जमा कराने का निर्देश जारी किया।
यहीं से विवाद हाईकोर्ट पहुंच गया।
क्या सिर्फ देरी से चुनाव रद्द हो सकता है ?
यही सबसे बड़ा कानूनी सवाल था। हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव संबंधी नियमों का उद्देश्य लोकतांत्रिक व्यवस्था को बचाना है, उसे खत्म करना नहीं। सिर्फ तकनीकी आधार पर पूरी चुनाव प्रक्रिया को निरस्त करना कानून की मंशा नहीं हो सकती।
लेकिन असली बात अभी बाकी थी…
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एक और अहम तथ्य दर्ज किया। अदालत ने कहा कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनमें चुनावों को “टाइम बार्ड” घोषित किए जाने को चुनौती दी जा रही है। यानी मामला केवल क्लासिक रेजिडेंसी तक सीमित नहीं है।
यहीं से व्यवस्था पर उठे सवाल
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कई मामलों में रजिस्ट्रार कार्यालयों की कार्यप्रणाली उत्तर प्रदेश सोसायटी पंजीकरण नियमावली, 1976 के अनुरूप दिखाई नहीं देती। यही वजह है कि अदालत ने लखनऊ और गाजियाबाद के डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालयों का निरीक्षण कराने और पिछले वर्षों के मामलों की समीक्षा कराने का निर्देश दिया।
यह टिप्पणी बताती है कि अदालत की चिंता केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि पूरी नियामक व्यवस्था को लेकर थी।
इसका असर केवल एक सोसायटी तक सीमित नहीं
उत्तर प्रदेश में हजारों हाउसिंग सोसायटियां हैं। हर सोसायटी में चुनाव होते हैं। हर चुनाव के पीछे निवासियों का लोकतांत्रिक अधिकार जुड़ा होता है। ऐसे में यदि नियामक व्यवस्था पर ही सवाल उठने लगें, तो उसका असर लाखों फ्लैट खरीदारों पर पड़ता है।
यह फैसला किसी एक फाइल का फैसला नहीं है। यह फैसला किसी एक अधिकारी का फैसला भी नहीं है। यह फैसला उस व्यवस्था पर न्यायपालिका की टिप्पणी है, जिस पर सोसायटियों में लोकतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी है।
अब सबसे बड़ा सवाल अदालत ने नहीं, समय ने खड़ा किया है।
क्या इस आदेश के बाद डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव करेगा ?
क्या सोसायटी चुनावों में पारदर्शिता और वैधानिक जवाबदेही मजबूत होगी ?
या फिर अगला मामला भी किसी दूसरी सोसायटी से होते हुए एक बार फिर हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंचेगा ?
