अधिकारी हैं, पैनल है, फिर भी एओए चुनाव क्यों अटक रहे हैं ?
एसजी ग्रैंड से सेवियर ग्रीनाइल तक चुनाव प्रक्रिया में देरी और विवाद
कहीं निर्वाचन अधिकारी बदले तो कहीं मतदान से एक दिन पहले चुनाव रोकना पड़ा
सोसाइटियों के कामकाज पर असर
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। हाईराइज सोसाइटियों में एओए चुनाव अब सिर्फ सोसाइटी के भीतर की खींचतान नहीं रह गए हैं। कहीं निर्वाचन अधिकारी बदल रहा है, कहीं अधिकारी नियुक्त होने के बाद भी चुनाव शुरू नहीं हुआ और कहीं मतदान से ठीक पहले अदालत के आदेश से चुनाव रोकना पड़ा। सवाल इसलिए बड़ा है कि चुनाव कराने के लिए प्रशासनिक पैनल भी है, निर्वाचन अधिकारी भी हैं और नियम भी स्पष्ट हैं, फिर चुनाव प्रक्रिया बार-बार विवाद और देरी में क्यों फंस रही है ?

30 अगस्त 2023 को तत्कालीन जिलाधिकारी ने प्रशासनिक अधिकारियों का एक पैनल गठित किया था, जिसमें से सोसाइटियों के लिए नामित निर्वाचन अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। व्यवस्था का मकसद चुनाव को प्रशासनिक निगरानी में निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से कराना था। लेकिन गाजियाबाद की कई हाईराइज सोसाइटियों के हालिया घटनाक्रम इस व्यवस्था की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
अधिकारी नियुक्त, फिर भी चुनाव का इंतजार
एसजी ग्रैंड में 14 अप्रैल को सहायक मत्स्य निदेशक रिचा चौधरी को निर्वाचन अधिकारी नियुक्त किया गया। 14 जुलाई को उन्होंने चुनाव प्रक्रिया शुरू करते हुए वोटर लिस्ट और 80 हजार रुपये चुनाव खर्च जमा कराने को कहा, लेकिन इसके बाद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। 12 अगस्त को उन्होंने चार जिलों की जिम्मेदारी का हवाला देकर चुनाव कराने में असमर्थता जता दी। सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि 21 जून को उन्होंने ही रिवर हाइट्स का चुनाव कराया था। ऐसे में सवाल है कि 14 जुलाई को शुरू हुई एसजी ग्रैंड की चुनाव प्रक्रिया आखिर कहां अटक गई ?

इस बीच एसजी ग्रैंड में निर्वाचन अधिकारी बदलना पड़ा। इसी तस्वीर का दूसरा पहलू एसजी इम्प्रेशन प्लस और केडब्ल्यू सृष्टि में दिखाई देता है, जहां निर्वाचन अधिकारी नामित होने के बावजूद चुनाव प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं हुई है।
देरी की कीमत पूरी सोसाइटी चुकाती है
एओए चुनाव में देरी सिर्फ उम्मीदवारों का इंतजार नहीं बढ़ाती। चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद मौजूदा प्रबंधन के लिए बड़े वित्तीय खर्च, नए अनुबंध और महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले विवाद का कारण बन सकते हैं। नतीजा, जरूरी फैसले अटकते हैं और उसका असर अंततः निवासियों की सुविधाओं और पैसे पर पड़ता है। इस देरी का कुछ सोसाइटियों में कुछ पदाधिकारी भी अनुचित लाभ उठाने से नहीं चूकते हैं।
हाईराइज सोसाइटियों में सुरक्षा, लिफ्ट, फायर सेफ्टी, मरम्मत और रखरखाव जैसे काम लगातार चलते हैं। इसलिए चुनावी अनिश्चितता को केवल राजनीतिक विवाद मानना पूरी तस्वीर को छोटा करना होगा।
मतदान से एक दिन पहले रुक गया चुनाव

क्रॉसिंग रिपब्लिक की सेवियर ग्रीनाइल सोसाइटी का मामला इस व्यवस्था की दूसरी बड़ी कमजोरी सामने लाता है। यहां चुनाव से ठीक एक दिन पहले सिविल कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव रोकना पड़ा।
विवाद 2024 में तत्कालीन नामित निर्वाचन अधिकारी द्वारा तत्कालीन एओए अध्यक्ष को जारी शेयर सर्टिफिकेट से जुड़ा था। बाद में वर्तमान नामित निर्वाचन अधिकारी ने उस सर्टिफिकेट को मानने से इनकार करते हुए संबंधित व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया। मामला अदालत पहुंचा और मतदान से ठीक पहले चुनाव रोकना पड़ा।
यहां सवाल किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि निर्वाचन प्रक्रिया में फैसलों की निरंतरता और पहले लिए गए निर्णयों की वैधता की स्पष्टता का है। यदि एक अधिकारी का फैसला दूसरे अधिकारी के सामने टिकता नहीं है तो उसका सीधा असर मतदाता सूची और चुनाव की विश्वसनीयता पर पड़ता है।
सवाल नियमों का नहीं, अमल का है
एओए चुनाव के लिए नियमों की कमी नहीं है। मॉडल बायलॉज में चुनाव प्रक्रिया और एओए के कामकाज से जुड़े प्रावधान स्पष्ट हैं। समस्या नियमों के अभाव की नहीं, बल्कि उनके सख्त और निष्पक्ष क्रियान्वयन की है।
जब प्रशासनिक अधिकारियों का पैनल मौजूद है, निर्वाचन अधिकारी नियुक्त किए जा रहे हैं और नियम पहले से तय हैं, तब चुनाव में अनावश्यक देरी, अंतिम समय में चुनाव रुकना या अधिकारियों के फैसलों में असंगति व्यवस्था की निगरानी पर सवाल जरूर खड़े करती है।
निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय करता है। इसलिए देरी का असर केवल सोसाइटी पर नहीं,डिप्टी रजिस्ट्रार की कार्यशैली और जवाबदेही पर भी पड़ता है।
