8 लेन फिर भी 15 KM जाम! रक्षाबंधन पर सिस्टम ने क्यों टेक दिए घुटने ?
दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर घंटों रेंगी गाड़ियां, बच्चे-बुजुर्ग बेहाल
कांवड़ में दिखी व्यवस्था रक्षाबंधन पर कहां गायब हो गई ?
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। जिस एनएच 9, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे को विकास, रफ्तार और आधुनिक कनेक्टिविटी की मिसाल बताया जाता है, रक्षाबंधन की पूर्व संध्या पर उसी एक्सप्रेसवे ने सिस्टम के दावों की ऐसी परीक्षा ली कि आठ लेन की सड़क भी 15 किलोमीटर लंबे जाम के आगे छोटी पड़ गई। यूपी गेट से डासना तक वाहन घंटों रेंगते रहे। गाड़ियों में बैठे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग परेशान होते रहे और व्यवस्था सड़क पर कहीं दिखाई नहीं दी।
यह महज ट्रैफिक जाम नहीं था। यह उस सिस्टम की तस्वीर थी जो सड़कें तो चौड़ी कर सकता है, लेकिन उन सड़कों पर बढ़ने वाले ट्रैफिक को संभालने की तैयारी में अब भी पिछड़ जाता है।
त्योहार तय था, भीड़ तय थी! फिर तैयारी क्यों नहीं ?
रक्षाबंधन कोई अचानक आया संकट नहीं था। तारीख पहले से तय थी। यह भी तय था कि त्योहार से पहले दिल्ली-एनसीआर से बड़ी संख्या में लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मेरठ की ओर जाएंगे। फिर सवाल बेहद सीधा है कि क्या सिस्टम को यह पता नहीं था ?
अगर पता था तो ट्रैफिक प्लान कहां था ?
अगर प्लान था तो लागू क्यों नहीं हुआ ?
अगर पुलिस और ट्रैफिककर्मी तैनात थे तो जाम 15 किलोमीटर तक कैसे पहुंचा ?
और अगर सब कुछ नियंत्रण में था तो लोग घंटों सड़क पर क्यों फंसे रहे ?
कांवड़ में ‘चाक-चौबंद’, रक्षाबंधन पर ‘चौपट’ क्यों ?
कुछ दिन पहले इसी क्षेत्र में कांवड़ यात्रा के दौरान ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर प्रशासन की सक्रियता दिखाई दे रही थी। रूट डायवर्जन, पुलिस तैनाती और ट्रैफिक मैनेजमेंट पर पूरा जोर था। लेकिन रक्षाबंधन पर वही सड़क, वही सिस्टम और लगभग पहले से अनुमानित भीड़, फिर इतना बड़ा जाम क्यों ?
क्या सिस्टम सिर्फ उन आयोजनों के लिए तैयार होता है जिन पर उसकी नजर और निगरानी ऊपर तक होती है ?
आम परिवार त्योहार मनाने निकले तो उसकी यात्रा को सुरक्षित और सुगम बनाना किसकी जिम्मेदारी है ?
क्या विकास सिर्फ सड़क बनाने का नाम है ?
सरकारें एक्सप्रेसवे बनाती हैं। उद्घाटन होते हैं। विकास के आंकड़े गिनाए जाते हैं। तस्वीरें सामने आती हैं। लेकिन विकास की असली परीक्षा उद्घाटन के मंच पर नहीं, उस दिन होती है जब आम आदमी उस सड़क पर हजारों-लाखों की संख्या में सफर करता है। और रक्षाबंधन पर दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे ने यही सवाल सामने रख दिया-
अगर आठ लेन का एक्सप्रेसवे भी त्योहार की भीड़ नहीं संभाल सकता, तो आखिर किस चीज को हम ‘स्मार्ट’ और ‘आधुनिक’ व्यवस्था कह रहे हैं ?
क्या सिर्फ एक्सप्रेसवे बना देने से ट्रैफिक की समस्या खत्म हो जाती है ? क्या सड़क के साथ ट्रैफिक मैनेजमेंट की क्षमता विकसित करना जरूरी नहीं ? और क्या हर बड़े त्योहार के बाद सिस्टम यही कहकर बच जाएगा कि जाम अचानक बढ़ गया था ?
15 KM की कतार सिर्फ गाड़ियों की नहीं थी

गुरुवार दोपहर से देर रात तक कछुए की तरह रेंगने वाले सिर्फ वाहन नहीं थे। उनमें बैठे किसी भाई को अपनी बहन तक पहुंचना था। किसी बहन को भाई से मिलने की जल्दी थी। किसी बुजुर्ग को परिवार के साथ त्योहार मनाना था। किसी बच्चे को घर पहुंचने का इंतजार था। लेकिन इन भावनाओं के बीच सिस्टम की रफ्तार कहीं दिखाई नहीं दी।
“विकास की सड़क पर जनता खड़ी थी और व्यवस्था बेबस”
यही तस्वीर सबसे बड़ा सवाल पूछती है कि-
जब सरकारें भविष्य की रफ्तार की बात करती हैं, तो क्या उन्हें वर्तमान की इस रेंगती हुई रफ्तार का भी जवाब देना होग ?
रक्षाबंधन की पूर्व संध्या पर दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे का जाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ कुछ घंटों की परेशानी नहीं है। यह चेतावनी है कि इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर देना और उसे प्रभावी ढंग से संचालित करना, दो अलग-अलग चीजें हैं।
अब देखना यह है कि सिस्टम इस जाम को सिर्फ एक और ट्रैफिक घटना मानकर भूल जाता है या इससे कोई सबक भी लेता है।
