September 8, 2026
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रजिस्ट्री हाथ में, CC-OC गायब: आखिर किस भरोसे पर खड़े हैं हाईराइज ?

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बिल्डर ने कब्जा दे दिया, रजिस्ट्री हो गई, परिवार बस गए! लेकिन भवन की वैधता, सुरक्षा और CC-OC पर अब भी गंभीर सवाल

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। हाईराइज इमारत में फ्लैट खरीदने वाले परिवार के लिए सबसे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि जिस इमारत में वह अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी पूंजी लगा रहा है, उसके कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC), ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) और अन्य जरूरी वैधानिक दस्तावेज मौजूद हैं या नहीं। लेकिन गाजियाबाद में कई हाईराइज परियोजनाओं को लेकर यही बुनियादी सवाल अब गंभीर चिंता का विषय बन गया है कि क्या CC-OC के बिना भी परिवारों को फ्लैटों का कब्जा दिया जा रहा है ?

प्रतीकात्मक इमेज

इलाहाबाद हाई कोर्ट के 1 सितंबर 2026 के आदेश ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। गाजियाबाद से जुड़े एक मामले में कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि बिल्डर ने कंप्लीशन सर्टिफिकेट प्राप्त किए बिना फ्लैटों का कब्जा दिया, जिसे कोर्ट ने उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट एक्ट, 2010 की धारा 4(5) का उल्लंघन माना। कोर्ट ने यह भी पूछा कि इन प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने वाला सक्षम प्राधिकारी आखिर कौन है और बिल्डर ने बिना कंप्लीशन सर्टिफिकेट के कब्जा कैसे दिया। यह सवाल केवल एक बिल्डर या एक परियोजना का नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था से जुड़ा सवाल है जो किसी नागरिक को यह भरोसा दिलाती है कि उसका खरीदा हुआ घर सुरक्षित और नियमसम्मत है।

बीती 6 सितंबर को दक्षिणी दिल्ली के सत्यनिकेतन में इमारत गिरने से सात छात्रों की मौत ने इस चिंता को और भयावह बना दिया है। ऐसी त्रासदियां बताती हैं कि भवन नियमों की अनदेखी कागज पर हुई गलती नहीं होती, कभी-कभी उसकी कीमत सीधे इंसानी जिंदगी चुकाती है।

CC-OC के बिना कब्जा कैसे और किसकी अनुमति से ?

यहीं से गाजियाबाद की असली तस्वीर सामने आती है। कुछ स्थानीय मामलों में ऐसी परियोजनाओं को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं जहां मूलभूत सुविधाओं की स्थिति संदिग्ध होने के बावजूद OC जारी होने और रजिस्ट्रियां होने की बात सामने आई है।

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एक मामले में दावा है कि बिजली कनेक्शन और अपने STP जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं पूरी नहीं थीं, फिर भी OC जारी हुआ और करीब 400 परिवारों के वहां रहने की बात कही जा रही है। यदि यह तथ्य सही है तो सवाल केवल यह नहीं कि बिल्डर ने क्या किया।

सवाल यह है कि OC जारी करने से पहले निरीक्षण किसने किया ? क्या जांच हुई ? किस अधिकारी ने रिपोर्ट दी ? क्या कमियां दर्ज हुईं ? और यदि कमियां थीं तो उन्हें दूर किए बिना प्रमाणपत्र कैसे आगे बढ़ा ?

दूसरे मामले में RTI के जरिए CC-OC की जानकारी मांगे जाने पर प्राधिकरण के कथित जवाब में संबंधित नाम से रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की बात कही गई। यह स्थिति अपने आप में विचलित करने वाली है। सरकारी रिकॉर्ड में स्थिति स्पष्ट नहीं और जमीन पर परिवार रह रहे हैं, तो आखिर किस व्यवस्था के भरोसे ?

यहां सवाल सिर्फ बिल्डर का नहीं, पूरी व्यवस्था का है

बिल्डर अकेले पूरी व्यवस्था नहीं चला सकता। नक्शा सरकारी प्राधिकरण से स्वीकृत होता है। निर्माण नियमों के अनुरूप है या नहीं, इसकी निगरानी के लिए सरकारी तंत्र मौजूद है। फायर सुरक्षा अलग व्यवस्था का विषय है। बिजली कनेक्शन और अन्य जरूरी अनुमतियां अलग विभागों से जुड़ी हैं। अंततः CC-OC भी किसी नियामक प्रक्रिया का परिणाम है।

तो फिर सवाल स्वाभाविक है कि अगर हर स्तर पर व्यवस्था मौजूद है, तो गड़बड़ी आखिर होती कैसे है ? क्या निरीक्षण सिर्फ फाइलों में होते हैं ? क्या कमियां देखकर भी अनदेखी कर दी जाती हैं ? क्या शिकायतें इसलिए दब जाती हैं क्योंकि सामने बड़ा बिल्डर है ? और क्या कभी-कभी सरकारी प्रक्रिया इतनी सुविधाजनक हो जाती है कि उसका लाभ बिल्डर को मिलता है और जोखिम खरीदार उठाता है ?

इन सवालों का जवाब केवल विभागीय खानापूर्ति से नहीं, स्वतंत्र जांच और सार्वजनिक जवाबदेही से मिलना चाहिए।

मिलीभगत साबित हो तो बिल्डर अकेला दोषी क्यों ?

यहां सरकार को सबसे कठोर रुख अपनाने की जरूरत है। यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी बिल्डर को नियमों से छूट दिलाने, कमियों को नजरअंदाज करने, गलत रिपोर्ट तैयार करने या आवश्यक प्रमाणपत्रों की प्रक्रिया में अनुचित मदद करने में किसी सरकारी अधिकारी की भूमिका रही, तो कार्रवाई केवल बिल्डर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

प्राधिकरण का अधिकारी हो, विद्युत विभाग का अधिकारी हो या फायर विभाग का जिम्मेदार अधिकारी, यदि जांच में जानबूझकर की गई लापरवाही, मिलीभगत या नियमों के उल्लंघन में भूमिका साबित होती है तो उसके खिलाफ भी कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

क्योंकि भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक रूप वह है जिसमें किसी गलत निर्णय का परिणाम सिर्फ सरकारी फाइल नहीं, किसी इंसान की जिंदगी बन जाता है। एक गलत रिपोर्ट, एक गलत प्रमाणपत्र या जानबूझकर नजरअंदाज की गई एक कमी सैकड़ों परिवारों को मौत के जोखिम में डाल सकती है।

रजिस्ट्री हुई, बैंक लोन मिला, तो क्या घर सुरक्षित भी है ?

प्रतीकात्मक इमेज

यही वह भ्रम है जिसे तोड़ना जरूरी है। रजिस्ट्री हो गई, बैंक ने लोन दे दिया, परिवार रहने लगा, तो खरीदार स्वाभाविक रूप से मान लेता है कि घर कानूनी और सुरक्षित होगा। लेकिन 7 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति के दस्तावेज का पंजीकरण अपने आप स्वामित्व (Title) की अंतिम या निर्णायक गारंटी नहीं है। रजिस्ट्री लेन-देन का सार्वजनिक रिकॉर्ड और उसका साक्ष्य हो सकती है, लेकिन वह अपने आप स्वामित्व का निर्णायक प्रमाण नहीं बनती।

और हाईराइज के मामले में इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि रजिस्ट्री होना किसी भवन के CC-OC, फायर सेफ्टी या अन्य तकनीकी और नियामकीय मानकों के अनुपालन का प्रमाणपत्र नहीं है। इसलिए खरीदार के सामने सवाल फिर वही है कि जिस घर के लिए उसने जिंदगीभर की कमाई लगा दी, क्या वह वास्तव में उस स्तर की जांच से गुजर चुका है जिसकी कानून अपेक्षा करता है ?

लखनऊ की त्रासदी से सबक क्यों नहीं ?

लखनऊ के अलीगंज में कोचिंग सेंटर की आग में सात विद्यार्थियों की मौत के बाद भवन के नियमों के अनुरूप होने पर सवाल उठे और संबंधित विभागों के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई। लेकिन शासन की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि हादसे के बाद कितने अधिकारी निलंबित हुए।

सफल शासन का पैमाना यह होना चाहिए कि हादसा होने से पहले कितनी खतरनाक इमारतों की पहचान की गई।

अब पूरे गाजियाबाद का CC-OC ऑडिट क्यों नहीं ?

यह समय किसी एक सोसायटी या किसी एक बिल्डर की जांच तक सीमित रहने का नहीं है। गाजियाबाद की सभी हाईराइज परियोजनाओं में पारदर्शी जांच होनी चाहिए- 

CC और OC की वास्तविक स्थिति

स्वीकृत नक्शा और वास्तविक निर्माण

फायर सेफ्टी अनुपालन

बिजली और अन्य अनिवार्य सुविधाएं

STP तथा अन्य मूलभूत व्यवस्थाएं

कब्जा दिए जाने की तारीख और उसका आधार

और सबसे महत्वपूर्ण, जिस अधिकारी या विभाग ने इन अनुमतियों और प्रमाणपत्रों की प्रक्रिया पूरी की, उसकी जवाबदेही भी रिकॉर्ड पर तय हो।

घर कोई विलासिता नहीं, नागरिक की मूलभूत जरूरत है

एक आम नागरिक अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी बचत घर खरीदने में लगा देता है। वह किसी सरकारी तंत्र से एहसान नहीं मांगता। वह सिर्फ यह भरोसा चाहता है कि जिस घर में उसका परिवार रहने जा रहा है, वह सुरक्षित और नियमसम्मत है। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ बिल्डर को निर्माण की अनुमति देने तक खत्म नहीं हो सकती।

घर बेचना बिल्डर का कारोबार है, लेकिन नागरिक को सुरक्षित घर दिलाना शासन की जिम्मेदारी है। और यदि इस जिम्मेदारी के रास्ते में कहीं बिल्डर और सरकारी तंत्र का कथित गठजोड़ खड़ा है, तो उसे बेनकाब करना और तोड़ना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

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