September 12, 2026
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गुलमोहर ग्रीन्स: 11 निवासियों की बुलंद आवाज ने खोलीं बिल्डर-GDA गठजोड़ की परतें!!

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सालों से नियमों की अनदेखी का आरोप, हाईकोर्ट की सख्ती से GDA के जवाबदेही तंत्र पर उठे सवाल

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। गुलमोहर ग्रीन्स सोसाइटी के 11 निवासियों की लड़ाई अब उस मुकाम पर पहुंच गई है, जहां सवाल सिर्फ बिल्डर की कथित मनमानी का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जवाबदेही का भी है, जिसे नियमों का पालन सुनिश्चित करना था। लगातार शिकायतों और प्रशासनिक स्तर पर सुनवाई की कोशिशों के बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा और अब अदालत की सख्ती ने GDA की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामले में हाईकोर्ट ने GDA के उपाध्यक्ष नंद किशोर कलाल को तलब किया है। साथ ही वर्ष 2011 में पद पर रहे उपाध्यक्ष का विवरण प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हाउसिंग एंड टाउन प्लानिंग से मांगा गया है और यह भी निर्देश दिया गया है कि जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई तो प्रधान सचिव को भी तलब किया जा सकता है। यानी जिस मामले में निवासी वर्षों से दर-दर भटक रहे थे, उसमें अब अदालत ने सीधे प्राधिकरण के शीर्ष स्तर की जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

हाईकोर्ट जाने से पहले GDA के सैकड़ों चक्कर काटे

याचिकाकर्ता सुभाष चंदर कहते हैं कि हाईकोर्ट जाने से पहले उन्होंने न्याय और अपने अधिकारों के लिए GDA के सैकड़ों चक्कर लगाए। अधिकारियों से बार-बार गुहार लगाई, शिकायतें दीं और समाधान की उम्मीद की, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई।

उनका आरोप है कि-

सुरेश चंदर, याचिकाकर्ता

कई बार उन्हें घंटों खड़ा रखा गया, एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के पास भेजा गया और लगातार परेशान किया गया। आखिरकार जब प्रशासनिक स्तर पर कोई रास्ता नहीं निकला तो मजबूर होकर न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

यह शिकायत केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं है। यह उस सवाल को जन्म देती है कि क्या अपने घर और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे नागरिक को न्याय पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के सैकड़ों चक्कर लगाना ही व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है ?

कई बार लगा कि कानून हार रहा है

दूसरे याचिकाकर्ता मोहन लाल शर्मा इसे एक लम्बा संघर्ष बताते हैं। उनका कहना है कि प्राधिकरण और बिल्डर के कथित गठजोड़ ने शहर में नियमों को कुचलकर रख दिया है।

मोहन लाल शर्मा, याचिकाकर्ता

मोहन लाल शर्मा कहते हैं-

इस लंबी लड़ाई में कई ऐसे मोड़ आए जब लगा कि कानून हार रहा है, लेकिन निवासियों ने संघर्ष नहीं छोड़ा। उनका कहना है कि हाईकोर्ट ने आखिर उनकी आवाज सुनी है और अब न्याय की उम्मीद जगी है।

2006 में मंजूरी, फिर बदला नक्शा और शुरू हुआ विवाद

 

गुलमोहर ग्रीन्स के दस्तावेज भी इस संघर्ष की लंबी पृष्ठभूमि सामने रखते हैं। परियोजना को 29 मई 2006 को GDA ने 87,330 वर्गमीटर भूमि पर 904 आवासीय इकाइयों के लिए मंजूरी दी थी। दस्तावेज के अनुसार बाद में बिल्डर ने बदले हुए कॉन्फ़िगरेशन और लेआउट के आधार पर निर्माण किया और प्रारंभिक स्वीकृति 15 फरवरी 2010 को निरस्त कर दी गई।

इसके बाद वर्ष 2011 में पहली कंपाउंडिंग के जरिए 23 टावरों और 720 आवासीय इकाइयों को मंजूरी/कंपाउंडिंग में शामिल किया गया। वर्ष 2015 में दूसरी कंपाउंडिंग के जरिए 264 अतिरिक्त इकाइयां और चार नए टावर शामिल किए गए, जिससे परियोजना 984 इकाइयों और 27 टावरों तक पहुंच गई।

कंपाउंडिंग बढ़ती गई, लेकिन सवाल खत्म नहीं हुए

दस्तावेज में आरोप है कि 2011 और 2015 की कंपाउंडिंग के बाद भी बिल्डर ने अतिरिक्त निर्माण जारी रखा। प्रवेश-निकास द्वार और बाउंड्री वॉल, सेंट्रल पार्क, बेसमेंट से जुड़े कार्य, रिटेनिंग वॉल, कचरा उपचार संयंत्र, एसटीपी, जल वितरण, इलेक्ट्रिकल पैनल सहित कई कॉमन सेवाएं अधूरी बताई गई हैं।

दस्तावेज के मुताबिक बिल्डर ने वर्ष 2010 से ही पूर्णता प्रमाणपत्र प्राप्त किए बिना हैबिटेट टावर्स में फ्लैटों का कब्जा देना शुरू कर दिया था। यानी एक तरफ निवासी अधूरी सुविधाओं और निर्माण से जुड़े सवालों को लेकर शिकायत करते रहे, दूसरी तरफ परियोजना में अतिरिक्त निर्माण और उसे कंपाउंड कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ती रही।

तीसरी कंपाउंडिंग और फिर हाईकोर्ट की रोक

25 नवंबर 2024 को तीसरी कंपाउंडिंग की गई। दस्तावेज के अनुसार इसमें टावर 16 से 19 में अतिरिक्त 9वीं और 10वीं मंजिलों तथा टावर 27 और 28 से जुड़ी अतिरिक्त इकाइयों को शामिल किया गया। इसके खिलाफ 2025 में Civil Misc. Writ Petition No. 21821 दायर हुई। हाईकोर्ट ने 18 जुलाई 2025 को तीसरी कंपाउंडिंग पर यथास्थिति (STATUS QUO) का आदेश दिया। मामला विचाराधीन है और दस्तावेज में 10 सितंबर 2026 के हालिया हाईकोर्ट आदेश का भी उल्लेख है।

यानी जिस तीसरी कंपाउंडिंग को लेकर निवासी सवाल उठा रहे थे, उस पर अदालत ने फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। अब अदालत की सख्ती के बीच GDA के शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही भी न्यायिक जांच के दायरे में आती दिख रही है।

कॉमन एरिया से लेकर अवैध निर्माण तक, शिकायतों की लंबी फेहरिस्त

दस्तावेज में यह भी आरोप है कि बिना GDA की स्वीकृति के कॉमन/सेटबैक एरिया को लॉन के रूप में विकसित कर ग्राउंड फ्लोर खरीदारों को बेचा गया और कब्जा दिया गया। GDA की प्रवर्तन टीम ने 2017, 2018 और 2023 में कुछ लॉन पर कार्रवाई की। 

दस्तावेज के मुताबिक टावर 16 से 19 में 9वीं और 10वीं मंजिल के निर्माण को GDA प्रवर्तन टीम ने 6 अप्रैल 2018 को सील किया था। बाद में इसी प्रकार के अतिरिक्त निर्माण को लेकर तीसरी कंपाउंडिंग पर विवाद सामने आया।

GDA की FIR, फिर एफआर, अब हाईकोर्ट की नजर

प्रतीकात्मक इमेज

कॉमन एरिया विवाद में GDA के जेई ने 1 अप्रैल 2018 को Friends Land Developer के MD विजय जिंदल के खिलाफ FIR संख्या 0749 दर्ज कराई थी। FIR में IPC की धाराएं 420, 467, 468 और 471 लगाई गई थीं।

लेकिन FIR की जांच के बाद पुलिस की Final/Closure Report अब खुद सवालों के घेरे में है। हाईकोर्ट ने Final Report दाखिल करने वाले जांच अधिकारी दारोगा सुरेंद्र सिंह को तलब किया है, वहीं इसे मंजूरी देने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से भी जवाब मांगा है।

यानी जिस मामले में GDA ने खुद FIR दर्ज कराई, उसी की पुलिस जांच और Final Report अब हाईकोर्ट की निगरानी में है। मूल विवाद में बिना CC/OC कब्जा और कॉमन/सेटबैक एरिया की बिक्री जैसे गंभीर सवाल पहले से मौजूद हैं।

अग्निशमन विभाग ने भी माना असुरक्षित!

गुलमोहर सोसाइटी की मुश्किलें केवल निर्माण और कॉमन एरिया विवाद तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 2025 में अग्निशमन विभाग ने सोसाइटी में अग्निशमन सुरक्षा व्यवस्था अधूरी और अकार्यशील पाए जाने के बाद अग्नि सुरक्षा के लिहाज से इसे असुरक्षित घोषित किया था। इस मामले में विभाग की ओर से जिला न्यायालय में वाद भी दर्ज कराया गया है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जिस सोसाइटी में वर्षों से लोग रह रहे हैं, वहां एक ओर Completion Certificate को लेकर सवाल हैं और दूसरी ओर अग्नि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकारी विभाग ने असुरक्षा जताई है, तो आखिर वहां रहने वाले सैकड़ों परिवारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है ?

अब असली सवाल: किसकी जिम्मेदारी तय होगी ?

गुलमोहर ग्रीन्स की कहानी में वर्ष 2006 से 2025 तक निर्माण, कंपाउंडिंग और शिकायतों का लंबा सिलसिला दिखाई देता है। दस्तावेज में यह आरोप भी दर्ज है कि पिछली कंपाउंडिंग की शर्तों और जमीनी स्थिति का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किए बिना आगे की कंपाउंडिंग होती रही।

अब 11 निवासियों की लड़ाई एक निर्णायक सवाल बन चुकी है, यदि बिल्डर ने नियमों का उल्लंघन किया तो उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी ? और यदि प्राधिकरण ने उसे रोकना था, तो वर्षों तक शिकायतों के बावजूद समाधान क्यों नहीं हुआ ??

 

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