शहर के विकास का पहरेदार ही सवालों के घेरे में, गुलमोहर ग्रीन्स मामले में GDA की साख पर चोट!
गुलमोहर ग्रीन्स मामले में हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणियों ने खोली निगरानी व्यवस्था की परतें
सवाल: जब नियमों के उल्लंघन की जानकारी थी, तो कार्रवाई करने वाले हाथ आखिर क्यों रुके रहे ?
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। फ्लैट खरीदार अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर घर खरीदता है। उसे भरोसा होता है कि निर्माण की मंजूरी देने वाला विकास प्राधिकरण कानून का पालन भी सुनिश्चित करेगा। लेकिन गुलमोहर ग्रीन्स मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणियों ने इसी भरोसे के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अदालत के सामने जब नियमों के उल्लंघन, जरूरी मंजूरियों की कमी और कंपाउंडिंग के जरिए राहत दिए जाने का मामला आया, तो जीडीए के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई।

यहां सवाल सिर्फ इतना नहीं कि बिल्डर ने नियमों का उल्लंघन किया! बड़ा सवाल यह है कि जिस प्राधिकरण के पास निगरानी और कार्रवाई का अधिकार था, उसने समय रहते अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाई ?
अगर नोटिस जारी होने के बावजूद उल्लंघन नहीं रुके, तो जवाबदेही केवल उस व्यक्ति की क्यों हो जो नियम तोड़ता है, उस तंत्र की क्यों नहीं, जिसकी जिम्मेदारी नियमों को लागू कराना है ?
नोटिस जारी हुए, लेकिन कार्रवाई कहां रुकी ?
हाईकोर्ट के सामने रखे गए तथ्यों के मुताबिक, GDA ने मार्च 2018 में नोटिस जारी किया था और जून 2019 में पत्राचार भी किया। इसके बावजूद, प्राधिकरण के हलफनामे के अनुसार, 28 जून 2019 के बाद कोई प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आई। अदालत ने इस निष्क्रियता पर गंभीर सवाल उठाए और माना कि प्राधिकरण के अधिकारियों ने अपने दायित्व का निर्वहन नहीं किया।
यहीं से मामला केवल प्रशासनिक देरी का नहीं रह जाता। जब किसी परियोजना में नियमों के उल्लंघन की जानकारी प्राधिकरण के संज्ञान में आ चुकी हो, तो यह जानना जरूरी है कि कार्रवाई आगे क्यों नहीं बढ़ी। क्या विभागीय स्तर पर कोई बाधा थी ? क्या निर्णय लेने में लापरवाही हुई ? या निगरानी की व्यवस्था ही प्रभावहीन साबित हुई ? इन सवालों के जवाब जांच और कार्रवाई से ही सामने आ सकते हैं।

कंपाउंडिंग की राहत और वायुसेना की जमीन का सवाल
अदालत ने बिल्डर को दूसरी और तीसरी बार कंपाउंडिंग की राहत दिए जाने पर भी गंभीर टिप्पणी की। मामले में भारतीय वायुसेना के स्वामित्व वाले आठ खसरों की कुल 4,560 वर्गमीटर जमीन को फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की गणना में शामिल किए जाने का मुद्दा सामने आया। हाईकोर्ट ने इस गणना को गलत मानते हुए 18 दिसंबर 2024 के तीसरे कंपाउंडिंग आदेश को निरस्त कर दिया।
यह तथ्य प्राधिकरण की निर्णय प्रक्रिया पर सीधा सवाल खड़ा करता है। यदि जमीन के स्वामित्व और निर्माण संबंधी नियमों की जांच में गंभीर खामियां थीं, तो मंजूरी देने से पहले उनका परीक्षण किस स्तर पर हुआ ? और यदि बाद में ये खामियां सामने आईं, तो उन्हें सुधारने के लिए समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए गए ?
हाईकोर्ट ने तत्कालीन GDA उपाध्यक्ष के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया है, जिसने प्राधिकरण की कार्यप्रणाली और फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर जवाबदेही का सवाल और गंभीर कर दिया है।
खरीदारों का भरोसा कौन लौटाएगा ?
किसी भी हाईराइज सोसाइटी में रहने वाले लोग केवल फ्लैट की चारदीवारी नहीं खरीदते। वे सुरक्षित घर, बुनियादी सुविधाओं और कानूनसम्मत निर्माण का भरोसा भी खरीदते हैं। जब निर्माण की वैधता और जरूरी मंजूरियों पर अदालत में गंभीर सवाल उठें, तो उस भरोसे को चोट पहुंचना स्वाभाविक है।

गुलमोहर ग्रीन्स मामले में हाईकोर्ट ने बिल्डर पर आर्थिक जिम्मेदारी तय करने के साथ GDA को भी प्रत्येक याची को 50 हजार रुपये देने का निर्देश दिया। यह आदेश प्राधिकरण की भूमिका पर अदालत की गंभीर नाराजगी को दर्शाता है। लेकिन आर्थिक राहत से आगे बड़ा सवाल यह है कि क्या उन कमियों की पहचान होगी, जिनके कारण मामला इस स्थिति तक पहुंचा? और क्या भविष्य में ऐसी परियोजनाओं की निगरानी के लिए जवाबदेही का स्पष्ट तंत्र बनाया जाएगा ?
अब फाइलों से बाहर दिखनी चाहिए कार्रवाई
गुलमोहर ग्रीन्स प्रकरण में अदालत अपना फैसला सुना चुकी है। अब GDA के सामने असली चुनौती है, निर्देशों का समयबद्ध पालन, विभागीय जांच को निष्पक्ष ढंग से आगे बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना कि जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए।
यह मामला एक सोसाइटी से जुड़ा जरूर है, लेकिन इसका संदेश व्यापक है। यदि नियमों का पालन कराने वाली संस्था ही अपने दायित्वों के निर्वहन को लेकर सवालों के घेरे में आती है, तो जवाबदेही तय होना और भी जरूरी हो जाता है।
आखिर बिल्डर की मनमानी रोकने की जिम्मेदारी जिस प्राधिकरण की थी, उसकी भूमिका पर उठे सवालों का जवाब कौन देगा ?
यही गुलमोहर ग्रीन्स मामले का सबसे बड़ा सवाल है। हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बाद अब GDA की साख केवल उसके बयानों से नहीं, बल्कि उसकी कार्रवाई से तय होगी।

GDA concerned officials must compel developer M/S SVP Builder Pvt ltd to complete all pending works and rectify defective works of earlier two compoundings and obtain CC.
Thereafter transfer completed assets with financial liabilities towards builder to elected RWA for further management of completed assets .