“आपन तेज सम्हारो आपै” : सौ वर्ष का संघ, आत्मज्योति से प्रकाशित एक युगयात्रा
सेवा, संस्कार और स्वाभिमान के सौ वर्ष

NEWS1UP
संपादकीय
हनुमान चालीसा की एक पंक्ति, “आपन तेज सम्हारो आपै”, यूं तो प्रभु हनुमान की आत्मशक्ति और तेजस्विता के आत्म-नियंत्रण का वर्णन करती है, पर यह पंक्ति आज एक और कथा को सजीव कर देती है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) की कहानी।
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी के उपलक्ष्य में विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किए, तो गोस्वामी तुलसीदास के ये शब्द मानो संघ के शताब्दी-वृत्तांत को प्रतिध्वनित करने लगे, एक ऐसा संगठन जो स्वयं अपनी ज्योति से पोषित, स्वयं अपने अनुशासन से संचालित और स्वयं अपने तेज से आलोकित* है।
डॉ. हेडगेवार का स्वप्न: संगठन से स्वाधीनता, अनुशासन से आत्मनिर्भरता
1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर की मिट्टी में जिस बीज को रोपा था, वह कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं था। वह आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का बीज था। डॉ. हेडगेवार समझते थे, भारत केवल राजनीतिक स्वाधीनता से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता से जीवित रहेगा।
उनका उपाय अत्यंत सरल और भारतीय था, “शाखा”। न कोई मंच, न कोई घोषणापत्र, न कोई नारा। बस कुछ युवा, एक दंड, एक भगवा ध्वज और एक प्रार्थना। इसी साधारण व्यवस्था ने आने वाले शताब्दी में संघ को विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बना दिया।
सेवा ही साधना, अनुशासन ही पहचान
संघ का दर्शन न तो ग्रंथों में बंधा है और न ही किसी सिद्धांत की दीवारों में कैद। यह आचरण में बसता है। सेवा इसकी आत्मा है। देश में जब भी कोई आपदा आती है, बाढ़, भूकंप, महामारी, दंगे या विभाजन का क्षण, संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचते हैं और सबसे अंत में लौटते हैं। वे प्रशंसा की अपेक्षा नहीं रखते, क्योंकि उनके लिए सेवा ही पुरस्कार है। जैसे तुलसीदास ने कहा था, “आपन तेज सम्हारो आपै”, संघ की ज्योति भी अपनी आंतरिक ऊर्जा से ही उज्ज्वल रहती है।

एक शाखा से विराट परिवार तक
नागपुर की उन प्रारंभिक शाखाओं से आज संघ का विस्तार भारत के हर कोने तक पहुंच चुका है। “संघ परिवार” की छत्रछाया में हजारों संस्थाएं कार्यरत हैं, ग्रामीण शिक्षा संस्थान, सेवा बस्तियां, आदिवासी कल्याण परियोजनाएं, महिला सशक्तिकरण समूह, चिकित्सा केंद्र, पर्यावरण संरक्षण अभियान और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के आंदोलन। यह विस्तार केवल संख्या में नहीं, बल्कि समाज के हर स्तर पर संस्कार और शांति के परिवर्तन में दिखता है।
राजनीति से परे, राष्ट्र के भीतर
आज प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और अनेक मुख्यमंत्री स्वयं संघ की शाखाओं से दीक्षित हैं। फिर भी, संघ ने कभी अपनी मौलिकता को सत्ता की चमक में विलीन नहीं होने दिया। उसकी मूल इकाई आज भी वैसी ही है, मैदान में शाखा, हवा में लहराता भगवा ध्वज और सादगी भरे वस्त्रों में युवा स्वयंसेवकों की सायंकालीन प्रार्थना। यह दृश्य आज भी वही है जो सौ वर्ष पहले था, निस्तब्ध, अनुशासित, उद्देश्यपूर्ण।
झंझावातों में अडिग, आलोचनाओं में प्रखर
अक्सर पूछा जाता है, संघ कैसे टिका रहा ? कैसे यह प्रतिबंधों, आरोपों और मिथ्या प्रचार की आंधियों में भी अडिग बना रहा ? उत्तर फिर वही है, “आपन तेज सम्हारो आपै”। संघ की शक्ति बाहरी समर्थन से नहीं, भीतर की साधना से आती है। सेवा, अनुशासन और धर्म में अटूट विश्वास इसका आधार है।
सौ वर्ष का उजाला: आत्मज्योति की अमर कहानी
सौ वर्ष के इस पड़ाव पर संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक संस्कृति-स्रोत है, यह उस विचार का जीवंत प्रमाण है कि जब कोई समाज अपनी लौ की रक्षा करना सीख लेता है, तो कोई भी तूफान उसे बुझा नहीं सकता। “आपन तेज सम्हारो आपै”, यही हनुमान की कथा है, और यही संघ की भी अविचल, प्रकाशमान, शाश्वत ज्योति।
लेखक हरिद्वार और मेरठ जिले में आरएसएस जिला प्रचारक रहे, और गाज़ियाबाद भारतीय जनता पार्टी में विभाग के संगठन मंत्री रह चुके हैं।
