February 9, 2026

महागुनपुरम: एक सोसायटी, हज़ार शिकायतें और एक नाकाम व्यवस्था!

0
42
0

हर घूंट में डर, हर सांस में सवाल: महागुनपुरम का दर्द

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

गाजियाबाद। एनएच-9 पर स्थित महागुनपुरम सोसायटी, जहाँ करीब दस हज़ार लोग रहते हैं, गुरुवार, 16 अक्टूबर को भय और अफरातफरी का केंद्र बन गई। अचानक 80 से अधिक लोगों के बीमार पड़ने की खबर ने पूरे परिसर में हड़कंप मचा दिया। शुरुआत में इसे अफवाह समझा गया, लेकिन जल्द ही स्थिति की गंभीरता सामने आने लगी, व्हाट्सएप ग्रुपों पर बीमार लोगों की तस्वीरें, अस्पताल के वीडियो और परेशान परिजनों के संदेश वायरल होने लगे।

बुजुर्ग हों या महिलाएं, हर किसी के चेहरे पर गुस्सा और चिंता साफ झलक रही थी। जब NEWS1UP ने मामले की जानकारी स्थानीय स्वास्थ्य विभाग को दी, तब जाकर प्रशासन हरकत में आया। देर शाम तक मेडिकल टीम ने सोसायटी के क्लब हाउस में कैंप लगाया, मरीजों की जांच की और दवाइयाँ वितरित कीं। लेकिन सवाल यह उठता है, क्या सिर्फ दवाइयां बाँट देना और पानी के नमूने लेना ही समाधान है ?

मार्च 2021 में सोसायटी में जाँच करती प्रशासनिक टीम (फाइल फोटो)

पुराना ज़ख्म, नई पीड़ा

यह कोई पहली घटना नहीं है। 20 मार्च 2021 को भी इसी सोसायटी में एसटीपी (सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट) का पानी पीने के पानी में मिल जाने से सैकड़ों लोग बीमार पड़े थे। उस वक्त तत्कालीन कमिश्नर ने मामले का संज्ञान लिया था और तब के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ.न.के. गर्ग ने 100 से अधिक बच्चों के दूषित जल से बीमार होने की पुष्टि की थी। मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुँचा था, लेकिन साढ़े चार साल बाद भी वही समस्या फिर से सिर उठा रही है। प्रश्न है, आखिर इस बीच क्या हुआ ? कौन जिम्मेदार था और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई ? रिकॉर्ड्स खंगालने पर कुछ नहीं मिला। शायद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 

सोसायटी के पीछे जमा एसटीपी का गन्दा पानी

 दिल्ली से सटे क्षेत्र में भी स्वच्छ पानी नहीं:  शर्मनाक हकीकत!

21वीं सदी के तीसरे दशक में भी अगर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के नागरिकों को स्वच्छ पेयजल नहीं मिल पा रहा है, तो यह प्रशासनिक नाकामी की पराकाष्ठा है। जानकारी के मुताबिक, महागुनपुरम का एसटीपी फिलहाल चोक पड़ा हुआ है। अपशिष्ट जल की निकासी या तो अनधिकृत तरीके से की जा रही है, या फिर टैंकरों के ज़रिए कहीं और डलवाई जा रही है। अगर यह सच है, तो सवाल उठता है-

“तीन गुना टैक्स वसूलने वाला नगर निगम आखिर कर क्या रहा है ?”

बिल्डर और प्रशासन के रवैये पर निवासियों के सवाल

निवासियों का आरोप है कि बिल्डर और प्रशासनिक एजेंसियाँ (नगर निगम, विकास प्राधिकरण और पर्यावरण विभाग) इस गड़बड़ी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। महागुनपुरम निवासी सुमित अग्रवाल ने 19 सितंबर 2025 को महागुन रियल एस्टेट प्रा. लि. के मैनेजिंग डायरेक्टर को मेल भेजकर एसटीपी की मरम्मत और एक अतिरिक्त एसटीपी लगाने की मांग उठाई थी। अब तक बिल्डर ने कोई जवाब नहीं दिया हैनिवासियों ने सोसायटी के स्ट्रक्चरल ऑडिट, रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को दुरुस्त करने और बेसमेंट में एसटीपी के पानी भरने जैसी गंभीर समस्यायों से छुटकारा दिलाने  की भी मांग की है, लेकिन बिल्डर एक नहीं सुन रहा है। और प्राधिकरण अपने द्वारा ही NOC की ज़मीनी हकीकत जानने की कोशिश ही नहीं करता है। 

तमाम तरह की व्यवस्थाओं से संबंधित एनओसी (NOC) जारी करने के बाद प्रशासन द्वारा दोबारा कोई सुध न लेना, और निवासियों की ओर से चुनी गई एओए (AOA) का अपने ही लोगों की समस्याओं के प्रति उदासीन और संवेदनहीन रवैया अपनाना, क्या यह नागरिकों और उनकी चुनी हुई संस्थाओं के बीच बढ़ती गैर-गंभीरता, अविश्वास और छल का प्रतीक नहीं माना जाना चाहिए ?

बेसमेंट में जमा एसटीपी का गन्दा पानी
क्या एओए भी दोषमुक्त है ?

यह सवाल भी अहम है, जब बिल्डर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर सोसायटी को एओए (एसोसिएशन ऑफ ओनर्स) को हैंडओवर करता है, तो क्या यह प्रक्रिया कानूनन वैध तरीके से होती है ? अगर नहीं, तो ऐसी एओए भी दोषी हैं, जिन्होंने बिना नियमों के हैंडओवर लिया। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि हैंडओवर प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो एओए और बिल्डर दोनों के खिलाफ कार्रवाई बनती है।

निवासियों की पुकार: हमें सुरक्षित पानी चाहिए, बहाने नहीं

महागुनपुरम के कई निवासी अब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन से सार्वजनिक सुनवाई की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि

“हर बार जांच होती है, नमूने भरे जाते हैं, रिपोर्ट आती है और मामला दबा दिया जाता है।
हमें सिस्टम नहीं, समाधान चाहिए।” 

ग्रीन बेल्ट बनी सीवेज डंपिंग ग्राउंड

रेजिडेंट आई सी जिंदल के अनुसार  एनजीटी ने प्रदूषण क्लीयरेंस प्रमाणपत्र में सोसायटी के आदेशित ग्रीन बेल्ट क्षेत्र को संरक्षित रखने और उसके रखरखाव की जिम्मेदारी गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) व बिल्डर को सौंपी थी। निर्देशों के अनुपालन में जीडीए ने यहां लगभग 1300 वृक्ष लगाकर ग्रीन बेल्ट विकसित की थी, ताकि क्षेत्र का पर्यावरण संतुलन बनाए रखा जा सके और स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित हो। ग्रीन बेल्ट को सीवेज डंपिंग ग्राउंड में तब्दील कर दिया गया है। लगातार सीवेज और गंदे पानी के फेंके जाने से यहां की मिट्टी और भूमिगत जल गंभीर रूप से प्रदूषित हो गया है।

अब जवाबदेही तय करने का समय है

महागुनपुरम में घटित यह घटना सिर्फ एक सोसायटी की नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता की एक झलक है। अगर 2021 जैसी त्रासदी के बाद भी कोई सबक नहीं लिया गया, तो यह केवल जल प्रदूषण नहीं, बल्कि नीतिगत भ्रष्टाचार और व्यवस्था की सड़ांध का प्रतीक है।

आज सवाल सिर्फ इतना है, कितनी बार बीमार पड़ने के बाद मिलेगी स्वच्छ पानी की गारंटी ? कब तक “जांच जारी है” का बहाना प्रशासन के गुनाहों पर पर्दा डालता रहेगा ?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!