कौशाम्बी–आनंद विहार बॉर्डर पर खुले में जलता कूड़ा बना ज़हरीली हवा का सबसे बड़ा सबूत!!
एनसीआर सांस चाहता है, बहाने नहीं!
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। बीते रविवार को कौशाम्बी रोडवेज बस अड्डे के पास, जिसे प्रशासनिक सुविधा के हिसाब से आनंद विहार, दिल्ली-यूपी बॉर्डर भी कहा जाता है, खींची गई एक तस्वीर और वीडियो ने यूपी और दिल्ली, दोनों सरकारों व उनके प्रशासनिक दावों की परतें उधेड़ कर रख दी हैं। यह कोई साधारण दृश्य नहीं, बल्कि उस सिस्टम का जीवंत सबूत है जो काग़ज़ों में सख़्त और ज़मीन पर पूरी तरह नाकाम है।
जब पूरा एनसीआर ज़हरीली हवा के कारण सांस लेने के लिए जूझ रहा है, तब बॉर्डर के ठीक पास खुले में जलता कूड़े का ढेर न सिर्फ़ हैरान करता है, बल्कि विचलित भी करता है। सवाल सीधा है, अगर प्रदूषण की असली जड़ पर कार्रवाई हो रही होती, तो क्या यह दृश्य संभव था ?
प्रदूषण के नाम पर दिखावटी सख़्ती, असल ज़िम्मेदार बेदाग़
हर साल वही रटी-रटाई स्क्रिप्ट दोहराई जाती है, कभी पराली दोषी, कभी दिवाली की आतिशबाज़ी, कभी BS-4 और BS-5 वाहन। आम नागरिकों पर पाबंदियाँ, चालान, जुर्माने और आदेशों की झड़ी लगा दी जाती है। NGT प्राधिकरणों और नगर निगमों पर कुछ आर्थिक दंड लगाकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी मान लेता है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त ? वह प्रशासनिक फाइलों से कोसों दूर है।
कौशाम्बी–आनंद विहार बॉर्डर पर जलता कूड़ा चीख-चीख कर बता रहा है कि कचरा प्रबंधन पूरी तरह ध्वस्त है। कूड़े के ढेर इकट्ठा करना, उन्हें खुले में छोड़ देना और फिर आग के हवाले कर देना, यह न तो दुर्घटना है, न अपवाद; यह सिस्टम की नियमित विफलता है।

गाजियाबाद: बदहाल सड़कों से उड़ती धूल, फैक्ट्रियों से उगलता ज़हर
गाजियाबाद में हालात और भी चिंताजनक हैं। जगह-जगह पड़े कूड़े के ढेर, खुलेआम ज़हर उगलती फैक्ट्रियां, सड़कों और फुटपाथों से उड़ती धूल, गड्ढों से भरी सड़कों की बदहाली, ये सब मिलकर हवा को ज़हर बना रहे हैं। इसके बावजूद नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण विभाग की सक्रियता केवल फोटो-ऑप और प्रेस नोट तक सीमित दिखती है।
यूटिलिटी चार्ज़ वसूली तो तेज़, निगरानी गायब
नगर निगम अधिकारी यूटिलिटी चार्ज़ के नाम पर टैक्स वसूली में पूरी मुस्तैदी दिखाते हैं, लेकिन कचरा उठान, वैज्ञानिक निस्तारण और खुले में जलाने पर रोक, इन बुनियादी ज़िम्मेदारियों पर सन्नाटा पसरा है। प्रदूषण विभाग का हाल और भी दयनीय है, नियमित निरीक्षण, त्वरित कार्रवाई और पारदर्शी रिपोर्टिंग का दावा ज़मीन पर खोखला साबित हो रहा है।
सीमा पर ज़हर, ज़िम्मेदारी किसकी ?
दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर यह प्रदूषण किसके खाते में जाएगा? दिल्ली कहेगी यूपी की ज़मीन, यूपी कहेगा दिल्ली की हवा। इस “नो-मैनज़-लैंड” की राजनीति में जनता की सेहत पिस रही है। जब बॉर्डर पर समन्वित कार्रवाई चाहिए, तब दोनों ओर का प्रशासन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर बच निकलता है।
यह तस्वीर और वीडियो किसी एक दिन की कहानी नहीं, यह वर्षों की लापरवाही का परिणाम है। अगर कचरा प्रबंधन, सड़क रखरखाव, औद्योगिक उत्सर्जन और धूल नियंत्रण पर ईमानदार कार्रवाई होती, तो एनसीआर आज गैस चैंबर न बनता।
