गाजियाबाद में प्रदूषण की मार: घुटकू होती हवा, दिल्ली की हवा फिर ज़हरीली, लागू हुआ GRAP-1
धुएं के जाल में फंसी गाजियाबाद की ज़िंदगी!
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भूमेश शर्मा
नई दिल्ली/गाजियाबाद। दिल्ली-एनसीआर में ठंड की दस्तक के साथ ही प्रदूषण ने एक बार फिर कहर बरपाना शुरू कर दिया है। राजधानी की हवा में ज़हर घुलने लगा है, जिससे सांस लेना मुश्किल होता जा रहा है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने बढ़ते प्रदूषण स्तर को देखते हुए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP-1) को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मुताबिक, दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) आज 211 दर्ज किया गया, जो ‘खराब’ श्रेणी में आता है। इंडिया गेट, कनॉट प्लेस और आईटीओ जैसे क्षेत्रों में घना धुंधलका छाया हुआ है। विजिबिलिटी में भारी गिरावट आई है और डॉक्टरों ने सांस से जुड़ी बीमारियों को लेकर लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है।

क्या है GRAP-1 और किन चीज़ों पर लगी रोक
CAQM के निर्देशानुसार, GRAP-1 के तहत प्रदूषण पर शुरुआती नियंत्रण के लिए कई सख्त कदम उठाए गए हैं:
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सड़क किनारे ढाबों और रेस्टोरेंट में कोयले और तंदूर के इस्तेमाल पर रोक।
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खुले में कचरा जलाने पर पूरी तरह प्रतिबंध।
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वाहनों और निर्माण स्थलों से होने वाले उत्सर्जन की सख्त निगरानी।
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धूल नियंत्रण और सफाई अभियान तेज करने के निर्देश।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर मौसम की स्थिति ऐसी ही बनी रही तो अगले कुछ दिनों में AQI ‘बहुत खराब’ स्तर तक पहुंच सकता है।

दिल्ली से सटे गाजियाबाद में प्रदूषण की स्थिति दिल्ली से भी ज्यादा भयावह है। NH-24 के किनारे बसी हाईराइज सोसायटियों में रहने वाले लोग ज़हरीली हवा में कैद ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं।

सकार्डि ग्रीन सोसायटी के निवासी प्रीत मोहन सिंह बताते हैं-
“बुलंदशहर इंडस्ट्रियल एरिया की फैक्ट्रियां दिन-रात धुआं उगलती रहती हैं। रात में पूरा आसमान गैस चेंबर में बदल जाता है। हम दरवाजे-खिड़कियां तक नहीं खोल सकते, क्योंकि हवा में ज़हर घुला हुआ है।”

गगन एन्क्लेव RWA के अध्यक्ष रघुनंदन भारद्वाज कहते हैं-
“हमारी कॉलोनी चारों तरफ से फैक्ट्रियों से घिरी है। एनएच-24 पर बनी कार्बन फैक्ट्री और मिल्क प्लांट से निकलने वाला काला धुआं इतना जहरीला है कि घरों की दीवारों तक पर उसकी परत जम जाती है। कई लोग अस्थमा और कैंसर जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं।”

लैंडक्राफ्ट सोसायटी AOA के पूर्व अध्यक्ष सुरेश भटनागर ने भी हालात पर चिंता जताई। उन्होंने कहा,
“यह ज़हरीला धुआं अब केवल वातावरण नहीं बिगाड़ रहा, बल्कि लोगों की उम्र तक घटा रहा है। हमारे इलाके में कई बुजुर्ग समय से पहले मौत का शिकार हो रहे हैं, और अब यह प्रदूषण बच्चों तक को गंभीर बीमारियों से ग्रसित कर रहा है। प्रशासन को अब सिर्फ नोटिस नहीं, कार्रवाई करनी चाहिए।”
शिकायतें बेअसर, फैक्ट्रियों पर कार्रवाई नहीं
स्थानीय निवासियों ने बताया कि उन्होंने कई बार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला प्रशासन, और यहां तक कि राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) से भी शिकायतें कीं,
लेकिन फैक्ट्री मालिकों के रसूख और प्रभाव के आगे प्रशासनिक कार्रवाई ठंडी पड़ जाती है। लोगों का कहना है कि रात के वक्त, जब मॉनिटरिंग कम होती है, फैक्ट्रियां पूरे जोर से धुआं छोड़ती हैं।
हर सुबह धुंध की चादर, हर सांस में ज़हर
गाजियाबाद के कई हिस्सों में सुबह सूरज तक दिखाई नहीं देता। हवा में धुएं और धूल के कण इतने अधिक हैं कि बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा रोगियों के लिए बाहर निकलना जानलेवा बन गया है। डॉक्टरों के अनुसार, अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले हफ्तों में साँस, एलर्जी और हृदय रोगों के मामलों में तेज़ी आएगी।
स्थानीय लोगों की मांगें
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प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर तुरंत कार्रवाई की जाए।
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रात के समय उत्सर्जन की निगरानी और दंडात्मक व्यवस्था लागू हो।
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स्थायी AQI मॉनिटरिंग स्टेशन की स्थापना और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
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ग्रीन बेल्ट और एंटी-स्मॉग टावर लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
सवाल वही — कब सुधरेगी हवा?
हर साल की तरह इस बार भी दिल्ली-एनसीआर के लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं-
“क्या हमें हर सर्दी में ज़हरीली हवा ही नसीब होगी?”
जब तक प्रशासनिक इच्छाशक्ति और औद्योगिक जवाबदेही एक साथ नहीं आती, तब तक दिल्ली-गाजियाबाद की हवा हर सर्दी में मौत का धुंधलका बनी रहेगी।
