डीजे की दहाड़ और कानून की खामोशी!!
प्रतीकात्मक इमेज
वैष्णवी की मौत का कारण जांच बताएगी, लेकिन बलरामपुर की घटना ने उस शोर पर सवाल खड़ा कर दिया है जिसे आस्था, उत्सव और मनोरंजन के नाम पर समाज वर्षों से सहता आ रहा है
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में बीती 21 सितंबर की सुबह डिवाइन पब्लिक स्कूल में कक्षा दो की सात वर्षीय वैष्णवी तिवारी अपनी सीट पर बैठी थी। बाहर गणेश प्रतिमा विसर्जन का जुलूस गुजर रहा था। डीजे की तेज आवाज स्कूल के भीतर तक पहुंच रही थी। करीब 10:58 बजे वैष्णवी अचानक गिर पड़ी। कुछ देर बाद संभली, फिर गिरी और इस बार कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
स्कूल की शिक्षिका के मुताबिक, बच्ची की हालत बिगड़ने के दौरान डीजे की आवाज और तेज हुई थी और कक्षा में कंपन महसूस किया गया। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित किए, डीजे वाहन और साउंड सिस्टम जब्त किए तथा संचालक और ऑपरेटर के खिलाफ कार्रवाई की।
चिकित्सकीय रूप से अभी यह स्थापित नहीं है कि वैष्णवी की मौत डीजे के शोर से हुई। पोस्टमार्टम नहीं हुआ और मौत का अंतिम कारण जांच का विषय है। फिर भी घटना ने ध्वनि प्रदूषण को लेकर उस पुरानी समस्या को फिर सामने ला दिया है, नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन सड़क पर कितना होता है ?

उत्सव की आवाज कब सार्वजनिक परेशानी बन जाती है ?
धार्मिक जुलूस हों, गणेश विसर्जन हो, बारात या शादी-उत्सव और आस्था सामाजिक जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन इनके नाम पर ऐसी ध्वनि पैदा करना, जिससे आसपास के लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हो, किसी भी आयोजन का अनिवार्य हिस्सा नहीं हो सकता।
कई जगह विशाल साउंड सिस्टम और भारी बास के साथ डीजे चलते हैं। पास से गुजरते वाहनों में कंपन महसूस होता है, घरों की खिड़कियां हिलती हैं और स्कूलों, अस्पतालों तथा रिहायशी इलाकों में रहने वाले लोगों तक इसका असर पहुंचता है। बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की नींद और मरीजों की परेशानी को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि सड़क पर कोई आयोजन चल रहा है।
उत्सव सामूहिक हो सकता है, लेकिन उसकी परेशानी भी सामूहिक रूप से क्यों बांटी जाए ?

नियम किताब में नहीं, सड़क पर चाहिए
ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 के तहत अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ध्वनि की सीमा निर्धारित है। आवासीय क्षेत्रों में दिन के समय 55 और रात में 45 डेसिबल, जबकि साइलेंस जोन में 50 और 40 डेसिबल की सीमा है। वाणिज्यिक क्षेत्रों में यह सीमा 65 और 55 डेसिबल तथा औद्योगिक क्षेत्रों में 75 और 70 डेसिबल है। लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल के लिए अनुमति का भी प्रावधान है।
इसका मतलब साफ है कि उत्सव पर रोक नहीं, अनियंत्रित ध्वनि पर नियंत्रण।
लेकिन किसी जुलूस के दौरान वास्तव में कितनी आवाज हो रही है, इसकी निगरानी कितनी बार होती है ? क्या संवेदनशील स्थानों के आसपास डेसिबल मीटर से मापन किया जाता है ? क्या अनुमति की शर्तें मौके पर जांची जाती हैं ? इन व्यवस्थाओं के बिना केवल कागज पर दर्ज सीमा नागरिकों को शोर से सुरक्षा नहीं दे सकती।
बलरामपुर में घटना के बाद डीजे संचालकों की बैठक हुई और नियमों का पालन करने के निर्देश दिए गए। पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी कार्रवाई हुई। लेकिन प्रशासन की असली परीक्षा घटना के बाद की कार्रवाई नहीं, उससे पहले की रोकथाम है।
बार-बार सामने आते मामले, फिर भी सबक अधूरा
सुल्तानपुर में अप्रैल 2026 में बारात के दौरान तेज डीजे के बाद एक पोल्ट्री फार्म में 140 मुर्गियों की मौत का मामला सामने आया। पुलिस ने शिकायत के आधार पर कार्रवाई की। मुजफ्फरनगर में दिसंबर 2025 में एक किशोरी की डीजे के दौरान तबीयत बिगड़ने के बाद मौत की खबर आई। अगस्त 2026 में बरेली में भी एक बुजुर्ग महिला की डीजे के पास तबीयत बिगड़ने के बाद मौत की खबर सामने आई।
इन मामलों में डीजे को मौत का चिकित्सकीय रूप से स्थापित कारण कहना उचित नहीं होगा। लेकिन ऐसी घटनाएं यह जरूर बताती हैं कि अत्यधिक ध्वनि को केवल मनोरंजन का विषय मानकर छोड़ देना ठीक नहीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन पर्यावरणीय शोर को नींद में बाधा, तनाव, सुनने की क्षमता पर असर और हृदय संबंधी जोखिमों से जोड़ता है। इसलिए ध्वनि प्रदूषण का सवाल केवल कानों तक सीमित नहीं है।

जिम्मेदारी सिर्फ डीजे संचालक की नहीं
डीजे सड़क पर अपने आप नहीं पहुंचता। उसके पीछे आयोजक होता है, अनुमति की प्रक्रिया होती है और मौके पर कानून-व्यवस्था संभालने वाला प्रशासन भी होता है। इसलिए व्यवस्था को केवल संचालक पर कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय यह देखना होगा कि आयोजन की अनुमति किन शर्तों पर दी गई, रूट कैसे तय हुआ, संवेदनशील स्थानों की पहचान हुई या नहीं और मौके पर नियमों की निगरानी किसने की।
किसी घटना के बाद उपकरण जब्त करना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि अगली घटना होने ही न दी जाए।
इसके लिए जुलूस के रूट की पूर्व समीक्षा, स्कूल-अस्पताल जैसे स्थानों की पहचान, वास्तविक ध्वनि मापन और उल्लंघन पर तत्काल कार्रवाई को नियमित व्यवस्था बनाना होगा।
आस्था रहे, लेकिन कानून की कीमत पर नहीं
धर्म का सम्मान होना चाहिए। त्योहार और शादियां पूरे उत्साह से मननी चाहिए। मगर किसी आयोजन की खुशी दूसरे नागरिक के लिए परेशानी या जोखिम में बदल जाए, तो वहां प्रशासन का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।
वैष्णवी की मौत का अंतिम सच जांच बताएगी। लेकिन डीजे के शोर का सवाल किसी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार नहीं कर सकता। कानून पहले से मौजूद है। ध्वनि की सीमा तय है। अनुमति की व्यवस्था है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि अगली बार जुलूस निकले तो आस्था और उत्सव के साथ कानून भी सड़क पर दिखाई दे। क्योंकि खुशी मनाने का अधिकार सबको है, लेकिन किसी दूसरे की शांति की कीमत पर नहीं।
