पहचान का खेल और हमारी सामूहिक विफलता!

जब ‘मैं कौन हूँ’ का सवाल, ‘तू कौन है’ की नफ़रत में बदल जाए
NEWS1UP
EDITORIAL
कानून, संविधान और सभ्यता की तमाम प्रगतियों के बावजूद भारत में पहचान का सवाल अब भी सुलझा नहीं। कभी जाति, कभी भाषा, कभी धर्म, किसी न किसी पहचान के नाम पर इंसान इंसान से टकराता है। सरकारें कानून बनाती हैं, अदालतें फैसले सुनाती हैं, पर समाज अब भी भीतर से नहीं बदल पाया। यह विफलता किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है, हमारी सामूहिक नैतिक पराजय।
पहचान का भय और भीड़ की राजनीति
एक अरसे से कुछ लोग, कुछ अन्य लोगों को यह बताते आए हैं कि उनके अस्तित्व पर किसी तीसरे समूह से खतरा है। इस काल्पनिक भय से घिरे लोग जुट तो जाते हैं, लेकिन एक नहीं हो पाते। हर बार जब कोई नया संकट दिखता है, भीड़ बनती है; संकट बीतते ही वही भीड़ भाषा, क्षेत्र, जाति या आर्थिक स्तर के नाम पर फिर बिखर जाती है। संविधान ने सबको समान अधिकार दिए, सरकारों ने अनेक कानून बनाए, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अब भी उस आदर्श से बहुत दूर है।

जब पुलिस को पुलिस ने शोषित किया
सभ्यता, सत्ता और संविधान के केंद्र से बहुत दूर नहीं, उसी भारत में, हाल ही में एक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी ने कथित जातीय उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या कर ली। आरोप यह कि उत्पीड़न करने वाले कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि उनके ही विभागीय वरिष्ठ थे। यानी पुलिस को पुलिस ने ही प्रताड़ित किया। सोचिए! जो अधिकारी राजधानी के निकट तैनात था, जिसकी जीवनसंगिनी स्वयं एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं, अगर वह भी जातीय भेदभाव का शिकार हो सकता है, तो उन लोगों का क्या होता होगा जो न सत्ता के करीब हैं, न सुरक्षित दायरे में। इस कल्पना मात्र से सिहरन होती है।
समस्या कानून की नहीं, सोच की है
सरकारों ने अपने हिस्से का काम किया, कानून बनाए, नीतियाँ बनाईं, अभियोजन चलाए। पर असली दोष उन लोगों का है जिन्होंने पहचान को राजनीतिक हथियार बना रखा है। वे अपनी पहचान पर खतरा दिखाकर आपको जुटाते हैं, भीड़ बनाते हैं, और जैसे ही लक्ष्य पूरा होता है, उसी भीड़ को छोटी-छोटी पहचानों में बाँट देते हैं। और फिर इंतजार करते हैं अगले अवसर का, जब उन्हें पहचान के नाम पर किसी नई भीड़ की ज़रूरत पड़े। पर यह दोष केवल उनका भी नहीं। यह हम सबके भीतर बसी उस अदृश्य परंतु गहरी धारणा का भी है, जो अब भी किसी इंसान को उसकी जाति, धर्म या लिंग के आधार पर ऊँचा या नीचा मानती है। तकनीक ने भौतिक दूरियाँ मिटा दीं, पर दिलों की दूरी जस की तस बनी रही।
आध्यात्मिकता की भूमि पर असमानता का कलंक
हम उस भूमि पर खड़े हैं जहाँ “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया गया, जहाँ कबीर ने कहा “जाति न पूछो साधु की” और बुद्ध ने करुणा का मार्ग दिखाया। फिर भी 2025 में कोई व्यक्ति अपनी पहचान के कारण प्रताड़ित होकर जान दे देता है। यह उस समाज के मुँह पर करारा तमाचा है जो खुद को “आधुनिक”, “डिजिटल” और “प्रगतिशील” कहता है।
आधुनिकता का छलावा और हमारी असल परीक्षा
अब प्रश्न यह नहीं कि कानून क्या कहते हैं- प्रश्न यह है कि हम क्या सोचते हैं। क्योंकि जब तक मनुष्य अपने भीतर के अहंकार और श्रेष्ठता के भ्रम को नहीं त्यागेगा, तब तक कोई भी संविधान या शासन इस समस्या का समाधान नहीं कर पाएगा। तकनीकी रूप से जुड़ी हुई दुनिया, सामाजिक रूप से टूटी हुई है, और यह हमारे समाज की सामूहिक विफलता है। यह विफलता केवल उस अधिकारी की नहीं जिसने जान दी, बल्कि उस समाज की है जिसने उसे ऐसा महसूस कराया कि उसकी पहचान, उसके जीवन से बड़ी है।
यह हमारी आधुनिकता पर प्रश्नचिह्न है !! और हमारी उसी पहचान पर एक स्थायी धब्बा है, जिसकी रक्षा के नाम पर हम बार-बार इंसानियत को खो देते हैं।
