February 15, 2026

रेरा: उम्मीदों का कानून, लेकिन जमीनी सच्चाई ?

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NEWS1UP

भूमेश शर्मा

नई दिल्ली। हिमाचल प्रदेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने रियल एस्टेट नियमन की असलियत उजागर कर दी। अदालत ने साफ कहा कि रेरा डिफॉल्टर बिल्डरों को सुविधाएं देने के अलावा कोई ठोस भूमिका निभाने में विफल रहा है और यहां तक कह दिया कि इसे बंद कर देने से भी अदालत को कोई आपत्ति नहीं होगी। यह टिप्पणी महज तल्ख शब्द नहीं, बल्कि एक पूरे तंत्र पर गंभीर आरोप है।

रेरा को 2016 में घर खरीदारों के अधिकारों की रक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही के वादे के साथ लागू किया गया था। 70 प्रतिशत फंड को अलग खाते में रखने, परियोजनाओं के अनिवार्य पंजीकरण और समयसीमा तय करने जैसे प्रावधान खरीदारों के लिए उम्मीद बने। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि आज भी लाखों लोग कब्जा, रिफंड और गुणवत्ता को लेकर दर-दर भटक रहे हैं। शिकायतों का अंबार इस बात का सबूत है कि कानून की भावना कागज़ों से आगे नहीं बढ़ पाई।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पहली नहीं है। पहले भी अदालत रेरा को “पूर्व नौकरशाहों का पुनर्वास केंद्र” बता चुकी है। इसका अर्थ साफ है, नियामक संस्था खुद ही उस बीमारी का हिस्सा बन चुकी है, जिसे ठीक करने के लिए उसका गठन हुआ था।

सिर्फ रेरा नहीं…

मामला केवल रेरा तक सीमित नहीं है। विकास प्राधिकरण, जल निगम, अग्निशमन और पर्यावरण विभाग जैसे जिम्मेदार संस्थान भी बिल्डरों के रसूख के आगे नियमों की अनदेखी करते दिखते हैं। अधूरी सीवर व्यवस्था, बिना ठोस अग्नि सुरक्षा और पर्यावरणीय शर्तों के बावजूद परियोजनाओं को मंजूरी मिल जाना आम बात हो चुकी है। जब शुरुआती स्वीकृतियां ही संदिग्ध हों, तो बाद में रेरा की कार्रवाई भी औपचारिक बनकर रह जाती है।

आज स्थिति यह है कि रेरा के आदेशों के पालन के लिए भी खरीदारों को उच्च न्यायालयों का सहारा लेना पड़ता है। इससे बड़ा प्रश्न उठता है कि यदि रेरा प्रभावी नहीं है, तो उसका अस्तित्व किसके लिए है ?

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी दरअसल एक चेतावनी है। या तो रेरा और उससे जुड़े सभी नियामक विभागों को वास्तविक अधिकार, विशेषज्ञता और इच्छाशक्ति दी जाए, या फिर यह स्वीकार किया जाए कि मौजूदा व्यवस्था घर खरीदारों के साथ न्याय करने में असफल रही है।

घर किसी भी परिवार का सबसे बड़ा निवेश होता है। यदि उसकी सुरक्षा के लिए बनी संस्थाएं ही निष्क्रिय रहें, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संगठित अन्याय है। सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है कि अब दिखावटी नियमन नहीं, जवाबदेही का वक्त है।

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