गाजियाबाद में हाउस टैक्स विवाद: इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित!

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भूमेश शर्मा

गाजियाबाद/प्रयागराज। नगर निगम द्वारा गृह कर में की गई भारी बढ़ोतरी को लेकर दायर जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में बुधवार को सुनवाई पूरी हो गई। कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला गाजियाबाद के हजारों करदाताओं से सीधे जुड़ा होने के कारण खासा अहम माना जा रहा है।

नगर निगम द्वारा गृह कर में 300 से 400 प्रतिशत तक की कथित बढ़ोतरी के खिलाफ पूर्व पार्षद राजेंद्र त्यागी, अनिल स्वामी और हिमांशु मित्तल के नेतृत्व में हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निगम के शीर्ष अधिकारियों और नेतृत्व ने सदन के निर्णय को दरकिनार करते हुए मनमाने तरीके से गृह कर की दरों में असामान्य वृद्धि कर दी, जो न केवल असंवैधानिक है बल्कि आम जनता पर अनावश्यक आर्थिक बोझ भी डालती है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया गया कि संविधान और कानून के तहत टैक्स बढ़ाने या घटाने का अधिकार नगर निगम सदन को है, न कि किसी अधिकारी या व्यक्ति विशेष को। ऐसे में बिना विधिवत सदन की मंजूरी के कर दरों में भारी इजाफा करना कानून की मूल भावना के खिलाफ है।

वहीं, निगम की ओर से पेश वकीलों ने नगर निगम के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि गृह कर में संशोधन नियमानुसार किया गया है और इसका उद्देश्य निगम की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना है।

दूसरी तरफ करदाताओं को राहत देने के लिए महापौर द्वारा 20 प्रतिशत की छूट की समय-सीमा बढ़ाकर 15 फरवरी तक की हुई है। हालांकि, यही छूट अब करदाताओं के लिए असमंजस का कारण बन गई है। लोग यह स्पष्ट नहीं समझ पा रहे हैं कि 20 प्रतिशत की छूट बढ़ी हुई नई दरों पर लागू होगी या पुरानी दरों पर। इस अस्पष्टता के चलते बड़ी संख्या में लोग यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गृह कर का भुगतान किया जाए या नहीं।

गौरतलब है कि गृह कर में प्रस्तावित भारी बढ़ोतरी के विरोध में पहले भी शहर में व्यापक आंदोलन हो चुके हैं। नगर निगम सदन से लेकर सड़कों तक इस फैसले के खिलाफ जोरदार विरोध देखने को मिला था, जिसमें विभिन्न सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने हिस्सा लिया।

याचिकाकर्ता टीम के सदस्य हिमांशु मित्तल ने सुनवाई पूरी होने के बाद कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि हाई कोर्ट का फैसला आम जनता के हित में आएगा। उनका कहना है कि “टैक्स बढ़ाने की संवैधानिक शक्ति निर्वाचित सदन के पास है, न कि अधिकारियों के पास। हमें विश्वास है कि कोर्ट इस बुनियादी सिद्धांत को ध्यान में रखकर निर्णय देगा।”

हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी होने के बाद अब लोगों को उम्मीद है कि जल्द आने वाले फैसले से गृह कर को लेकर चल रहा भ्रम और असमंजस समाप्त होगा। फैसला चाहे जो भी हो, यह तय माना जा रहा है कि इसका असर गाजियाबाद के हर करदाता पर पड़ेगा और नगर निगम की आगे की कर नीति की दिशा भी इसी से तय होगी।

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